इतिहास की गंगा को प्रदूषण मुक्त करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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इतिहास एक पवित्र गंगा है। इसकी धारा शाश्वत है। सनातन है। इसमें निरंतरता है। इसकी प्रवाहमानता किसी राष्ट्र की संस्कृति और समाज की प्रवाहमानता को प्रमाणित करती है। यदि इतिहास की प्रवाहमानता कहीं बाधित , कुंठित या अवरुद्ध होती है तो समझो वह देश और समाज भी कहीं ना कहीं बाधित, कुंठित और अवरुद्ध होकर खड़ा हो गया है। जिस देश व समाज की इतिहास की गंगा की पवित्र धारा लुप्त हो जाती है वह देश और समाज अपना अस्तित्व खो बैठता है । इसलिए इतिहास की पवित्र धारा को अथवा गंगा को निरंतर प्रवाहमान रखने के लिए इसको प्रदूषण मुक्त किया जाना बहुत आवश्यक है। किसी भी देश का सजग नेतृत्व सावधान और कर्तव्यशील तभी कहा जा सकता है जब वह अपने इतिहास के प्रतीकों, मानदंडों, मूल्यों और मान्यताओं को प्राथमिकता देने के प्रति सावधान हो।
      यह ठीक है कि पीएम मोदी से अलग राम जन्म भूमि के विवाद को सुलझाने में देश की न्यायपालिका का विशेष योगदान रहा है परंतु प्रधानमंत्री के रूप में उनकी स्वयं की सक्रियता भी इस विवाद को सुलझाकर अयोध्या में श्रीराम का भव्य मंदिर बनाने में विशेष रूप से अभिनंदनीय रही है।
    अब अगले पड़ाव की ओर बढ़ते हुए उन्होंने वाराणसी में संकल्प से सिद्धि तक की सफल यात्रा कर अपने कार्यकाल को यादगार बनाने का कीर्तिमान कायम किया है।
      इतिहास को खंगालने से पता चलता है कि श्री काशी विश्वनाथ मंदिर पर वर्ष 1194 से लेकर 1669 ई0 तक कई बार हमले हुए। वास्तव में मुस्लिम आक्रमणकारियों के द्वारा किए गए ये हमले किसी एक मंदिर विशेष को तोड़ने के किए लिए किए गए हमले नहीं थे, बल्कि ये भारत की आत्मा को नष्ट कर भारत के धर्म और संस्कृति को मिटा देने के लिए किए गए हमले थे। जिसके लिए वाराणसी ने अपनी छाती पर अनेकों घाव सहे। उन घावों को सहलाते हुए वाराणसी अपनी यात्रा को आगे बढ़ाती रही। बस, उसे केवल किसी एक ऐसे विशेष नायक की आवश्यकता थी जो उसके घावों पर मरहम लगाकर उसके इतिहास का पुनरुद्धार कर सके और राष्ट्र के भीतर गर्व और गौरव का भाव जागृत कर सके। …और अब यही हो रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी प्रधानमंत्री के साथ इस संकल्प यात्रा में मजबूती से खड़े रहे हैं।
     आज जब वाराणसी को उसका प्राचीन भव्य स्वरूप प्रदान किया गया है तो हमें इसकी अस्मिता और शान के लिए प्राण देने वाले अनेकों वीर योद्धाओं को भी याद करना चाहिए जिन्होंने अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान देकर इसकी रक्षा के संकल्प को बार-बार दोहराया था। वैसे भी प्रधानमंत्री ने वाराणसी से यह संदेश भी दिया है कि जब – जब कोई औरंगजेब पैदा होता है तो उसका प्रतिकार करने के लिए कोई शिवाजी भी उठ खड़ा होता है । हमें अपने उन अनेकों ‘शिवाजियों’ को आज याद करना चाहिए जिनके कारण हमारा धर्म और हमारी संस्कृति आज जीवित है और हम संसार का नेतृत्व करने के लिए तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।    इस अवसर पर हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि 1777 से 1780 के बीच मराठा साम्राज्य की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। उनके अतिरिक्त भी जो लोग इस मंदिर की अस्मिता और शान के लिए किसी भी प्रकार काम आते रहे उनको भी आज हम हृदय से नमन करते हैं।
    महारानी अहिल्याबाई के उस महान योगदान के सही ढाई सौ वर्ष पश्चात पीएम मोदी ने आठ मार्च 2019 को मंदिर के इस भव्य दरबार का शिलान्यास किया था। जब प्रधानमंत्री मोदी ने वह शिलान्यास किया था तब वह भारत के भूले – बिसरे और चोटिल इतिहास के पुनरुद्धार का शिलान्यास था। वह अपने अनेकों वीरों, योद्धाओं और वीरांगनाओं को  दी जाने वाली एक विनम्र श्रद्धांजलि भी था जो अपनी अमर कीर्ति को शेष छोड़ आज हमारे बीच शरीर रूप से तो नहीं है परंतु यश रुपी शरीर के रूप में अवश्य जीवित हैं।
33 महीने में तैयार हुए श्री काशी विश्वनाथ धाम का लोकार्पण रेवती नक्षत्र में संपन्न किया गया है।
   कुछ लोगों के लिए प्रधानमंत्री मोदी का वाराणसी से ‘हर हर महादेव’ का दिया जाने वाला नारा संप्रदायिक नारा हो सकता है और उनके द्वारा किसी मंदिर के कार्यक्रम में पहुंचना भी धर्मनिरपेक्षता के लिए खतरा हो सकता है। ऐसे लोगों से हम पूछ सकते हैं कि जब सपा की सरकार के समय अनेकों मस्जिदों का निर्माण सरकारी कोष से किया जा रहा था तब देश में सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की स्थिति कैसी थी ? अखिलेश सरकार के उन कार्यों के चलते इनमें से कौन सी बीमार होती जा रही थी और कौन सी स्वस्थ होती जा रही थी ? ऐसी आलोचना करने वालों को हम यह बता देना चाहते हैं कि सरकारें भारत के गौरवपूर्ण इतिहास के शोध पर कार्य न करें और भारत की सामासिक संस्कृति को समृद्ध करने की दिशा में कोई निर्णय न लें , ऐसा हमारे संविधान के किसी भी अनुच्छेद या प्रावधान में उल्लेखित नहीं है।
   प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी में खड़े होकर औरंगजेब और शिवाजी दोनों को याद करके भी बहुत गहरा संदेश दे दिया है। उत्तर प्रदेश में इस समय चुनाव का मौसम बन चुका है। इसी समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा है कि अखिलेश यादव औरंगजेब की मानसिकता से ग्रसित हैं।  अखिलेश यादव के आलोचक उन्हें इसलिए भी औरंगजेब कहते हैं कि उन्होंने अपने पिता के साथ वैसा ही बर्ताव किया है जैसा औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां के साथ किया था। मुलायम सिंह यादव इस समय अघोषित रूप से शाहजहां जैसा जीवन व्यतीत कर रहे हैं अर्थात वे अपने बेटे अखिलेश यादव की जेल में हैं।  तब पूरे प्रदेश में औरंगजेब और औरंगजेबी सोच को उजागर करने के लिए प्रधानमंत्री के शब्द बहुत कारगर सिद्ध होंगे।
      वाराणसी के विषय में हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि 1193 ई में मुहम्मद गोरी ने कन्नौज को जीत कर अपने आधीन किया। काशी का प्रदेश उस समय कन्नौज के राठौड़ राजाओं के अधीन था। जिससे वाराणसी पर मोहम्मद गौरी का आधिपत्य स्थापित हो गया। इसके उपरांत भी काशी भारतीय धर्म और संस्कृति का केंद्र बनी रही और यहां से पूरा हिंदू समाज ऊर्जा प्राप्त करता रहा। अनेकों धर्माचार्यों ने अपने पवित्र कार्यों से भारतीय धर्म और संस्कृति की ज्योति को जलाए रखने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उनके इस प्रकार के पवित्र और महान कार्यों के चलते ही भारतीय धर्म की ज्योति बुझने नहीं पायी। यद्यपि देश – काल और परिस्थिति के अनुसार इस धर्म की ज्योति की लौ मद्धम अवश्य पड़ी। इसके अतिरिक्त अनेकों विकृतियां भी इसमें प्रवेश कर गईं। जिसके विरुद्ध समय आने पर महर्षि दयानंद ने क्रांति का आवाहन किया।
   हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि भारतीय धर्म और संस्कृति को मिटाने में किसी भी मुस्लिम शासक ने किसी प्रकार का प्रमाद नहीं किया ना ही किसी प्रकार की शिथिलता दिखाई। सबने अपनी क्षमताओं के अनुसार भारत को मिटाने की दिशा में भरपूर कार्य किया। मुगल सम्राट् अकबर ने भी हिंदू धर्म को मिटाने के अनेकों कार्य किए । मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपनी क्रूरता और निर्दयता का परिचय देते हुए वाराणसी के कई प्राचीन मंदिरों को ध्वस्त करा दिया था। मूल विश्वनाथ के मंदिर को तुड़वाकर उसके स्थान पर एक बड़ी मस्जिद बनवाई जो आज भी विद्यमान है। मुगल साम्राज्य जब पतन की ओर बढ़ा तो उस समय भी वाराणसी पर मुस्लिमों की कोप दृष्टि समाप्त नहीं हुई। इस काल में अवध के नवाब सफ़दरजंग ने काशी पर अधिकार कर लिया था और वाराणसी के सम्मान को चोट पहुंचाने का कार्य करता रहा । उसके पौत्र ने वाराणसी को  ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया था। वर्तमान काशी नरेश के पूर्वज बलवंतसिंह ने अवध के नवाब से अपना संबंध-विच्छेद कर काशी को एक स्वतंत्र रियासत के रूप में स्थापित किया। वास्तव में बलवंत सिंह महाराज का यह कार्य बहुत ही वंदनीय था, जिन्होंने कई सौ वर्षों के पापों को धोने का काम किया था । बाद में महाराजा बलवंत सिंह के पुत्र चेतसिंह ने वारेन हेस्टिंग्ज़ से लोहा लिया था।  स्वतंत्रता मिलने के पश्चात् काशी की रियासत भारत राज्य का अविच्छिन्न अंग बन गई। 1916 में यहां पर पंडित मदन मोहन मालवीय ने काशी विश्वविद्यालय की स्थापना की। यह विश्वविद्यालय आज भी अपने गर्व और गौरव की कहानी कह रहा है।
   इस प्रकार अनेकों उतार-चढ़ाव और घुमावदार घाटियों से निकले और आगे बढ़े वाराणसी के इतिहास को सँवारने का संकल्प लेकर प्रधानमंत्री मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सचमुच एक ऐतिहासिक कार्य किया है। हमें अपने इतिहास पर गर्व हो और साथ ही गौरव बोध भी हो, यह बहुत आवश्यक है । इसके लिए हमें अपने इतिहास के पवित्र स्मारकों को सहेजकर और उनके हिंदू स्वरूप को और भी अधिक निखारकर प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। देश में आजादी के बाद नेहरू काल से ही यह बहुत मूर्खतापूर्ण धारणा रही है कि देश में केवल ‘ताज नगरी’ को इसलिए सजाया और सँवारा जाता रहा कि वहां पर किसी विलासी, व्यभिचारी, कामी मुगल बादशाह ने तथाकथित रूप से अपनी किसी तथाकथित बेगम की याद में तथाकथित ताज ‘महल’ बनवा दिया था। ऐसी सोच के कारण हमने अपने भारत के वास्तविक ‘ताजों’ को विस्मृत कर दिया। जिसका प्रभाव यह पड़ा कि देश की वर्तमान पीढ़ी भारत के वास्तविक ‘ताजों’ को भूलकर तथाकथित ‘ताज और मुमताज’ को सब कुछ मान बैठी है। अब समय आ गया है जब हमें ‘ताज और मुमताज’ की विलासिता और व्यभिचार से ‘मुक्ति’ पाने के लिए इससे बाहर निकलकर बाबा विश्वनाथ की नगरी की ओर चलना है। वैसे भी भारत एक आध्यात्मिक देश है ।वह भौतिकवाद की विलासिता और व्यभिचार को वास्तविक मुक्ति में बाधक मानता है। इसलिए भारत की यात्रा केवल ताज और मुमताज की विलासिता तक सीमित नहीं हो सकती। उसे अनंत की ओर चलना है और अनंत की ओर चलने के लिए मुक्ति की खोज अनिवार्य है अर्थात भारत की आध्यात्मिक धारा से जुड़ना आवश्यक है। इसके लिए निश्चय ही हमें काशी के वैदिक स्वरूप की ओर लौटना होगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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