हिन्‍दू धर्म रक्षकों पर मुगलों की भयानक बर्बरता

धर्मांतरण रुपी अप्राकृतिक व अमानवीय अत्याचार जो चारो और बडे पैमाने पर पूरी दुनिया मे सदियो से चला आ रहा है तो उसपर कोई विवाद नहीं फिर  अपने पूर्वजो के मूल धर्म मे वापिस आने के लिए किये जा रहे समाज सुधार के अभियान पर ढोंगी धर्मनिरपेक्षता वादियो को इतनी अधिक आपत्ति क्यों ?

प्रायःसमाज के पीड़ित व दुर्बल वर्ग की विकट परिस्थितियो का लाभ उठाकर ही धर्मांतरण अधिक किया गया है ।जरा सोचो जो समाज अपने जीवनयापन की ही विषमताओं मे घिरा हुआ हो तो वह इसका विरोध क्यों व कैसे कर पाता ?

हमारे देश मे भी मुगलो व अंग्रेजो के शासन काल मे धर्मांतरण का विरोध प्रायः नहीं हुआ? परंतु जिसने विरोध किया उसका सर कलम कर दिया गया। इतिहास गवाह है की धर्मांतरण के विरोध मे  महान हिन्दू धर्म रक्षको पर मुगलो की बर्बरता का  इतना भयानक रूप न कभी देखा होगा न सुना होगा ….

भाई मतीदास को …लकड़ी के फट्टे पर बांध कर आरे से चीरा गया…

भाई सतीदास को..कढाई मे गर्म गर्म तेल में तब तक तला गया जब तक उनका शरीर कोयले के समान      काला नहीं हो गया…

भाई दयालदास के … शरीर पर रुई लपेट कर आग लगा दी गयी….

गुरु तेगबहादुर का  “शीश ” काटा गया…

गुरु गोविन्दसिंह के. दो बच्चों को जिन्दा दीवार मे चिनवाया गया….

वीर बालक हकीकत राय को..अल्प आयु मे ही जंजीरो से बाँध कर जल्लाद ने सर कलम किया..

ऐसे अनेक बलिदानी इतिहास के गर्त मे समाये हुए है  जिन्होंने धर्म की रक्षार्थ  अपना सर्वत्र न्यौछावर कर दिया ।यहाँ एक बात अवश्य समझनी होगी क़ि समाज मे इस प्रकार दहशत बना कर भयभीत करके सामान्य जनमानस को धर्मान्तरित करने मे सरलता हुईं ।

आज  हम अपने भूले भटके धर्मबंधुओ की सम्मानपूर्वक घर वापसी का जो  कार्य कर रहे है वह  समाज के उन ठेकेदारो व जिहादियो से तो अति उत्तम कार्य है , जिसमे धर्मांतरण के लिए मानसिक व शारीरिक

उत्पीड़न की पराकाष्ठा थी ।

यह सत्य है क़ि हमारी संस्कृति हमें वसुंधैव कुटुम्बकम का पाठ पढ़ाती  है और उसी आचरण से हम बंधे चले आ रहे है । पर यह तो कोई नहीं कहता कि उसके लिए हम अपने आप को मिटने दे या कोई दूसरा हम पर अनुचित आक्रमण करे ? हमें “जैसे को तैसा” का ब्रह्म वाक्य अभी जीवित रखना है और “भय बिन होत न प्रीत” की रीत को भी नहीं भूलना । आखिर हम कब तक सहिष्णु बनकर बाहें पसारे  रहेंगे और वे हमें सदा की भाँति कायर समझ कर  लूटते-पीटते रहेंगे।

हिन्दू समाज मे जाति आधारित बुराईयो का व दलित-पिछडे -आदिवासियों मे  विभाजित करने का षड्यंत्र भी मुख्य रूप से हमारी गुलाम मानसिकता का ही दुष्परिणाम है। आक्रांताओ ने हम पर शासन करके हमें अपनी मूल वर्ण व्यवस्था से दूर करके जाति आधारित नवीन व्यवस्था मे बांध कर हमें अपने ही धर्म बंधुओ से अछूत बना कर विराट हिन्दू समाज का विखराव व विघटन किया। यह एक ऐसा श्राप हमारे समाज पर लगा जिसका दुष्परिणाम हम आज तक भुगत रहे है और इसका लाभ उठा कर ईसाई व मुसलमान द्वारा  रचे गये षडयंत्रो से हमारा समाज व  देश  कमजोर होता  जा रहा  है।

हमारा इतिहास गुलाम मानसिकता को ही बढ़ावा दे और हम अपने  स्वर्णिम काल को स्मरण करके उसका अनुसरण भी न करे तो इससे अधिक  अपने अस्तित्व को मिटाने की आत्मघाती मानसिकता और क्या हो सकती है?

स्वतंत्र भारत मे हम 80% होकर भी 20% के अत्याचारो को सहने के लिए विवश हो तो फिर स्वतंत्रता व स्वराज का अर्थ निर्थक है।यह ठीक हे कि हमारा धर्म उनको यहाँ रहने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है परंतु इसका अर्थ यह नहीं की वे हमारी संस्कृति पर आक्रमण करे ।हमें उनका हमारे साथ मिलजुल कर रहना तो स्वीकार है परंतु अगर वे अपनी संस्कृति को हमारे ऊपर थौपना चाहेंगे तो वह किसी भी स्थिति मे स्वीकार्य नहीं।

विनोद कुमार सर्वोदय
नया गंज, गाज़ियाबाद।

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