ममता बनर्जी को यदि आज कांग्रेस ने हल्के में लिया तो कल पड़ सकती हैं भारी

 ललित गर्ग

ममता बनर्जी को वर्तमान में कांग्रेस की गिरती साख एवं राहुल गांधी के शिथिल नेतृत्व के कारण ही कहना पड़ा है कि अब संप्रग जैसा कुछ नहीं रह गया है, उससे यह नए सिरे से स्पष्ट हो गया कि वह खुद के नेतृत्व में भाजपा का विकल्प तैयार करने को लेकर गंभीर हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एवं चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के कांग्रेस पार्टी और विशेषकर राहुल गांधी को लेकर दिये गये ताजा कटाक्षपूर्ण बयान एक राष्ट्रीय पार्टी की लगातार गिर रही साख एवं बिखराव को दर्शाते हैं। इसका सीधा मतलब है कि विपक्षी एकता के मामले में न केवल ममता बल्कि अन्य कुछ दल कांग्रेस को अनुपयोगी और अप्रासंगिक मानकर चल रहे हैं। यह असामान्य स्थिति है कि एक क्षेत्रीय दल देश के सबसे पुराने राष्ट्रीय दल की अहमियत को इस तरह खारिज करे। अन्य दल ही नहीं, बल्कि पार्टी के बलिदानी, वफादार एवं कद्दावर नेता भी द्वंद्व एवं घुटन की स्थिति में हैं, तभी पार्टी के भीतर जी-23 असंतुष्टों का समूह बना। कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं की यह खुली बगावत एवं विपक्षी दलों के तीखे तेवर पार्टी के भविष्य पर घने अंधेरों की आहट है।

ममता बनर्जी को वर्तमान में कांग्रेस की गिरती साख एवं राहुल गांधी के शिथिल नेतृत्व के कारण ही कहना पड़ा है कि अब संप्रग जैसा कुछ नहीं रह गया है, उससे यह नए सिरे से स्पष्ट हो गया कि वह खुद के नेतृत्व में भाजपा का विकल्प तैयार करने को लेकर गंभीर हैं। पता नहीं उनकी सक्रियता क्या रंग लाएगी, लेकिन इतना अवश्य है कि कांग्रेस को उनसे चिंतित होना चाहिए। अभी तक विपक्षी एकता की जो भी कोशिश होती रही है, उसमें कहीं-न-कहीं कांग्रेस भी शामिल रही है। खुद ममता बनर्जी भी ऐसी कोशिश का हिस्सा रही हैं, लेकिन अब वही कांग्रेस को किनारे कर रही हैं। इस तरह की स्थिति एकाएक नहीं बनी है, अकारण नहीं बनी है, उसके कारणों में कहीं-न-कहीं कांग्रेस का अप्रभावी नेतृत्व है। अनेक राजनीतिक दलों का भविष्य बनाने एवं राजनीति की धड़कनों पर पकड़ रखने वाले प्रशांत किशोर ने विपक्ष के कथित नेतृत्व को लेकर कांग्रेस की दावेदारी पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि कांग्रेस जिस विचार और जगह का प्रतिनिधित्व करती है वो एक मजबूत विपक्ष के लिए अहम है, लेकिन कांग्रेस का नेतृत्व एक विशेष व्यक्ति का दैवीय अधिकार नहीं, खासकर जब पार्टी पिछले 10 सालों में अपने 90 प्रतिशत चुनावों में हार का सामना कर चुकी है।
प्रशांत किशोर के बयान हों या पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रतिक्रियाएं, यह सब कांग्रेस के राहुल गांधी पर ही केन्द्रित हैं। ममता ने राजनीतिक जमीन बनाने के लिये जिस त्याग, बलिदान, समर्पण एवं जनता पर पकड़ की जरूरत को व्यक्त किया, उसी के सन्दर्भ में उन्होंने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के विदेश दौरों को लेकर सवाल उठाए हैं। ममता बनर्जी ने राहुल गांधी पर तंज कसते हुए कहा था कि जब आधा टाइम विदेश में रहेंगे तो राजनीति कैसे करेंगे? प्रशांत किशोर राहुल गांधी और कांग्रेस को लगातार घेरते रहे हैं। पिछले दिनों, सोशल मीडिया पर एक सवाल-जवाब के सत्र के दौरान उन्होंने कहा था कि आने वाले सालों में बीजेपी, भारतीय राजनीति के केंद्र में बनी रहेगी चाहे वह जीते या चाहे हारे। प्रशांत किशोर ने कहा था कि जैसे शुरुआती 40 वर्षों में कांग्रेस के साथ हुआ, वैसा ही भाजपा के साथ है। उन्होंने कहा था, ”दिक्कत राहुल गांधी के साथ है कि वे सोचते हैं कि बस कुछ वक्त की बात है और लोग बीजेपी को उखाड़ फेकेंगे। तो, ऐसा अभी नहीं होने जा रहा है।” यह सच भी है। लेकिन कांग्रेस को अपनी खोयी जमीन को पाने के लिये सीधा-सरल गणित नहीं बैठाना है, बल्कि कठोर परिश्रम करना होगा, लेकिन ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है। कोरी बयानबाजी एवं नरेन्द्र मोदी के विरोध से खोयी जमीन नहीं मिलती, बल्कि वह और रसातल में जायेगी।
कांग्रेस नेतृत्व ने अपनी दिशाहीन राजनीति से न केवल अपनी पार्टी को कमजोर किया है, बल्कि विपक्ष को भी नुकसान पहुंचाया है। कांग्रेस को पर्दे के पीछे से चला रहे राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता को लेकर उनके सहयोगी-समर्थक चाहे जो दावा करें, वह हर दृष्टि से निष्प्रभावी हैं। राजनीति में इतना लंबा समय बिताने के बाद भी वह बुनियादी राजनीतिक परिपक्वता हासिल नहीं कर सके हैं। उनके लिए राजनीति का एक ही मकसद है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कोसना। उन्होंने सस्ती नारेबाजी को ही राजनीति समझ लिया है। आज तृणमूल कांग्रेस प्रमुख एवं प्रशांत किशोर के बदले हुए स्वर हैं तो इसके लिए एक बड़ी हद तक कांग्रेस ही जिम्मेदार है। वह अपनी दयनीय दशा और बिखराव के लिए अपने अलावा अन्य किसी को दोष नहीं दे सकती।
विडम्बना तो यह है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अपनी इस दुर्दशा पर न चिन्तन-मंथन करता है और न अपनी कमियों एवं गलतियों को स्वीकारता है। राहुल ही नहीं, कुछ इसी तरह की राजनीति प्रियंका गांधी भी कर रही हैं। भले ही कांग्रेस में राहुल और प्रियंका को करिश्माई नेता बताने वालों की कमी न हो, लेकिन सच यही है कि ये दोनों नेता अपनी तमाम सक्रियता के बावजूद कहीं कोई छाप नहीं छोड़ पा रहे हैं। वास्तव में इसीलिए कांग्रेस तेजी के साथ रसातल में जा रही है। यह कांग्रेस के लगातार कमजोर होते चले जाने का ही कारण है कि उसके नेता अन्य दलों की शरण में जा रहे हैं। पंजाब एवं राजस्थान के कांग्रेसी तनाव के लम्बे समय से हल नहीं हो पाने के पीछे राहुल की अपरिपक्व राजनीतिक सोच ही है। राहुल गांधी को चाहिए था कि पंजाब के मामले में सिद्धू को निर्देश व सलाह देते कि राज्य में जो स्थिति उन्होंने बनाई है, उसका हल भी खुद ही निकालें। ऐसे नेताओं पर नकेल-कसना पार्टी का ही काम है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा लगातार शह-मात का खेल कांग्रेस को राज्य में कमजोर कर रहा है। यदि राहुल और प्रियंका ने सचिन पायलट को ठोस आश्वासन दिए थे, तो उन्हें तुरंत पूरा करना चाहिए और ऐसे प्रयास करने चाहिए कि कांग्रेस राज्य में 2023 में वापसी करे। कोई भी व्यक्ति संगठन से बड़ा नहीं है और यह संदेश साफ शब्दों में जाना चाहिए। पार्टी में संवादहीनता चरम पर है। अब जब कोविड-19 का प्रकोप कम होता लग रहा है, तब सोनिया गांधी को तुरंत ऑल इंडिया कांग्रेस समिति का अधिवेशन बुलाकर विचारधारा व नेतृत्व के मामले को पार्टी के समक्ष रखना चाहिए। इस कदम से कांग्रेस व नेहरू-गांधी परिवार और मजबूत, दृढ़ निश्चयी के साथ-साथ राजनीतिक लक्ष्यों के प्रति सजग व प्रेरित नजर आता, लेकिन ऐसा न होना पार्टी के अस्त होते जाने का ही संकेत है।
   
कांग्रेस की राजनीति की सोच एवं संस्कृति सिद्धान्तों, आदर्शों और निस्वार्थ को ताक पर रखकर सिर्फ सत्ता, पु़त्र-मोह, राजनीतिक स्वार्थ, परिवारवाद एवं सम्पदा के पीछे दौड़ी, इसलिये आज वह हर प्रतिस्पर्धा में पिछड़ती जा रही है। कांग्रेस आज उस मोड़ पर खड़ी है जहां एक समस्या समाप्त नहीं होती, उससे पहले अनेक समस्याएं एक साथ फन उठा लेती हैं। कांग्रेस के भीतर एवं बाहरी विरोधाभास नये-नये चेहरों में सामने आ रही है। कांग्रेस की इस दुर्दशा एवं लगातार रसातल की ओर बढ़ने का सबसे बड़ा कारण राहुल गांधी हैं। वह पार्टी एवं राजनीतिक नेतृत्व क्या देश की गरीब जनता की चिन्ता एवं राष्ट्रीय समस्याओं को मिटायेगी जिसे पु़त्र के राजनीतिक अस्तित्व को बनाये रखने की चिन्ताओं से उबरने की भी फुरसत नहीं है। असंतुष्ट नेता एवं विपक्षी दल इस नतीजे पर भी पहुंच चुके हैं कि राहुल के रहते कांग्रेस में कोई सूरज उग नहीं पाएगा। जो लोग प्रियंका गांधी से बड़ी उम्मीद लगाए थे, वे और ज्यादा निराश हैं। भाई-बहन किसी गरीब से मिल लें, किसी गरीब के साथ बैठकर खाना खा लें, किसी पीड़ित को सांत्वना देने पहुंच जायें तो समझने लगते हैं कि एक सौ तीस करोड़ लोगों का दिल जीत लिया है। वे अपने बयानों, कार्यों की निंदा या आलोचना को कभी गंभीरता से लेते ही नहीं। उनकी राजनीति ने इतने मुखौटे पहन लिये हैं, छलनाओं, दिखावे एवं प्रदर्शन के मकड़ी जाल इतने बुन लिये हैं कि उनका सही चेहरा पहचानना आम आदमी के लिये बहुत कठिन हो गया है। प्रश्न है कि इन स्थितियों के चलते कांग्रेस कैसे मजबूत बनेगी? कैसे पार्टी नयी ताकत से उभर सकेगी? कांग्रेस को राष्ट्रीय धर्म एवं कर्त्तव्य के अलावा कुछ न दिखे, ऐसा होने पर ही पार्टी को नवजीवन मिल सकता है, अन्यथा अंधेरा ही अंधेरा है।

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