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भारतीय संस्कृति

हर वर्ण की भाँति शूद्र का भी होता था उपनयन

रवि शंकर

दलितों और स्त्रियों की बात करते ही एक बात बड़े ही जोर शोर से कही जाती है कि मनु स्मृति में कहा गया है कि वेदों को सुनने पर शूद्रों और स्त्रियों के कानों में पिघला हुआ सीसा उड़ेल दिया जाना चाहिए, ताकि वे हमेशा के लिए बहरे हो जाएं। हमें यह जान कर हैरानी हो सकती है कि ऐसा कहने और लिखने वाले किसी भी व्यक्ति ने मनु स्मृति को नहीं पढ़ा होता है। मनु स्मृति में ऐसा कोई विधान है ही नहीं। यह भी उल्लेखनीय बात है कि ऐसा कहने वाले अधिकांश लोगों को यह पता ही नहीं होता कि आखिर यह विधान किसका है। इस एक बात से हम जान सकते हैं कि शूद्रों और मनु स्मृति को लेकर समाज में कितना भ्रम व्याप्त है।
मनु सिद्धांतत: वर्णों को श्रेष्ठता के आधार के रूप में स्वीकार नहीं करते। यह भी साफ है कि मनु ने केवल उन्हें ही शूद्र कहा है जो शिक्षा ग्रहण करने में असमर्थ हैं या जिन का मन विद्याग्रहण में नहीं लगता। यह समझना आज थोड़ा कठिन प्रतीत होता है। आज की व्यवस्था में हम हर किसी को स्नातक की उपाधि दिला देते हैं, भले ही उसने संबंधित विषय के बारे में थोडा बहुत ही जाना हो। भारत में आज से केवल ढाई सौ वर्ष पहले भी ऐसा नहीं होता था। स्नातक होने का अर्थ पूरा विद्वान होना होता था। और इसलिए मनु ने कहा कि राजा और स्नातक विद्वान में स्नातक विद्वान अधिक मान्य है। उसकी प्रतिष्ठा राजा से भी अधिक होनी चाहिए। (मनु 2/139) इसलिए विद्या ग्रहण में असमर्थ होने का मनु का अभिप्राय आज के संदर्भों में समझना थोड़ा कठिन है।
मनु इससे आगे बढ़ कर ब्राह्मणों के लिए निर्देश देते हैं कि ब्राह्मणों को कभी भी सम्मान की इच्छा नहीं करनी चाहिए, प्रत्युत उन्हें हमेशा लोगों से अपमान मिलने की ही अपेक्षा रखनी चाहिए। (मनु 2/162) यह बात आज के ब्राह्मणवाद के ढिंढोरचियों को निश्चय ही उलटी जान पड़ेगी। आखिर बात तो यह कही जाती रही है कि ब्राह्मण सबसे अधिक सम्मान के योग्य हैं और शूद्र सर्वाधिक अपमानित किए जाते हैं परंतु मनु यहाँ इसका ठीक उलटा कह रहे हैं। यहाँ मनु ने एक उपमा भी दी है। मनु ने सम्मान की उपमा विष से और अपमान की उपमा अमृत से दी है। यानी ब्राह्मण के लिए सम्मान विष के समान है और अपमान अमृत के समान। इसलिए भी ब्राह्मण सम्मान का आकांक्षी नहीं हो सकता। मनु इसके बाद कहते हैं कि यदि ब्राह्मण वेदों का अध्ययन बंद कर देता है तो शीघ्र की पूरे कुल समेत वह शूद्रत्व को प्राप्त हो जाता है। शूद्र बनने की यह प्रक्रिया भी वेदों के अध्ययन से जुड़ी है यानी शूद्र केवल वही बनता है जो वेदाध्ययन नहीं करता या करने में समर्थ नहीं होता।
इसलिए मनु स्मृति को पढ़ते समय ध्यान रखें यदि कोई विधान शूद्रों का अपमान केवल इसिलिए करता है कि वह शूद्र वर्ण का है, तो वह मनु का विधान नहीं है, कोई प्रक्षिप्त श्लोक है। इसे हम आगे एक उदाहरण से समझेंगे। दूसरे अध्याय में संस्कारों की चर्चा प्रारंभ करते हुए मनु ने पहले श्लोक में लिखा है कि पुंसवन से लेकर जातकर्म तक के संस्कारों से द्विजों के बच्चों को दुष्ट संस्कारों का नाश होता है। (मनु 2/26) अब प्रश्न उठता है कि क्या ये संस्कार केवल द्विजों को यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के बच्चों के ही किए जाने चाहिए, शूद्रों के बच्चों के नहीं? क्या यह मनु का अन्याय नहीं है?
ध्यान देने की बात यह है कि मनु ने उपरोक्त श्लोक में केवल उन्हीं संस्कारों की बात की है जो गर्भावस्था से लेकर जन्म होने तक के हैं। उसके बाद के संस्कारों की इस श्लोक में कोई चर्चा नहीं है। मुझे इस प्रसंग में एक व्यक्तिगत अनुभव याद आता है। जब मुझे अपनी पत्नी का पुंसवन संस्कार करवाना था तो मैंने अपने उपाध्याय जी से आग्रह किया कि वे आकर विधि-विधानपूर्वक पुंसवन संस्कार करवा दें। उन्होंने तब मुझे कहा था कि पुंसवन, से लेकर निष्क्रमण तक के संस्कार माता-पिता को स्वयं करने चाहिए, इसमें किसी पुरोहित को नहीं बुलाया जाता। उन्होंने मुझे कहा कि मैं स्वयं इन संस्कारों का अध्ययन करूँ, मंत्रों का अभ्यास करूँ और फिर संस्कार संपन्न करूँ। मैंने वैसा किया भी। संभवत: यही कारण है कि मनु ने भी इन संस्कारों को केवल द्विजों के बच्चों के लिए किए जाने की बात कही। आखिर शूद्र तो वेदमंत्रों को पढऩे योग्य है नहीं। वह उन्हें पढ़ नहीं सकता, इसीलिए तो वह शूद्र है। ऐसे में वह अपने बच्चों का ये संस्कार कैसे करेगा? इसलिए मनु ने इन्हें द्विजों तक सीमित कर दिया। परंतु इसके ठीक बाद का श्लोक मनु का प्रतीत नहीं होता, क्योंकि वह श्लोक शेष संस्कारों से भी शूद्रों को वंचित करता है। इस श्लोक में गार्भै: और होम का भी उल्लेख है, जिससे भी यह प्रक्षिप्त प्रतीत होता है। इस श्लोक के द्वारा प्रक्षिप्तकर्ता ने शूद्रों को संस्कारों के साथ-साथ यज्ञ-याग करवाने से भी वंचित कर दिया है। परंतु इसके बाद के श्लोकों में नामकरण संस्कार का वर्णन करते हुए शूद्र बालकों का नाम रखने का भी उल्लेख है यानी मनु शूद्रों का नामकरण करने का विधान कर रहे हैं। यदि शूद्रों का नामकरण संस्कार किया जा रहा है तो फिर शेष संस्कारों में कोई बाधा रह ही नहीं जाती।
नामकरण के इन श्लोकों में एक और समस्या आती है। नामकरण के इन दो श्लोकों में शूद्र के लिए जुगुप्सित: (मनु 2/31-32) शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका सामान्यत: सभी टीकाकारों ने घृणापरक अर्थ किया है जो कि सही नहीं है। वास्तव में जुगुप्सित शब्द गुप रक्षणे धातु से बना है और इसका अर्थ पालन और रक्षण होता है। इन्हीं अर्थों में इसका प्रयोग वेदों में भी पाया जाता है। इस श्लोक में मनु ने चारों वर्णों के नामकरण में उनके गुणानुसार करने का विधान किया है। ब्राह्मणों का शुभकारक, क्षत्रियों का बलकारक, वैश्यों का धनसूचक और शूद्रों का पालन तथा रक्षण सूचक। इसलिए यहाँ भी शूद्रों के प्रति किसी प्रकार की घृणा का उल्लेख नहीं है।
इसके बाद मनु ने विभिन्न संस्कारों का उल्लेख करते हुए उपनयन संस्कार के वर्णन में शूद्रों की चर्चा नहीं की है। वहाँ मनु ने स्पष्ट रूप स ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के लिए उपनयन किये जाने की बात कही है। (मनु 2/37-38) यहाँ इन दो श्लोकों से पहले दो श्लोक और मिलते हैं, जिनमें एक बार फिर द्विजातियों के लिए चूड़ाकर्म आदि संस्कारों के किए जाने का उल्लेख है (मनु 2/35), जो कि इससे पहले मनु के नामकरण संस्कार के विधान के विपरीत है। इसके अलावा अगले श्लोक 2/36 में तीनों वर्णों के उपनयन के काल का वर्णन है। परंतु उसके तुरंत बाद के श्लोकों में भी उपनयन काल का ही वर्णन है। साफ है कि 35-36 क्रमांक के श्लोक किसी और ने बना कर मिलाए हैं। श्लोक 35 में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के उपनयन का वर्ष क्रमश: आठवाँ, ग्यारहवाँ और बारहवाँ बताया है, जबकि श्लोक 36 में पाँचवाँ, छठा और ग्यारहवाँ। इतना ही नहीं दोनों श्लोकों की भाषा भी भिन्न है। श्लोक 35 में कहा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का उपनयन जबकि श्लोक 36 में कहा गया है ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य बनने के इच्छुक का उपनयन। इस भाषा से बहुत अंतर हो जाता है। बालक के वर्ण का निर्धारण जन्म से तो होता नहीं था, ऐसे में हरेक बालक उपनयन का अधिकारी था। जो बालक जिस वर्ण में जाना चाहता था, उसके उपनयन की न्यूनतम आयु का उल्लेख किया गया है। इसलिए शूद्र का उल्लेख नहीं है, क्योंकि बालक तो अवर्ण होने के कारण शूद्र आदि कुछ है नहीं, और उपनयन से द्विजाति बनने पर तीन ही वर्ण होते हैं – ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य।
इससे स्पष्ट है कि मनु ने हरेक बालक के उपनयन का विधान किया था, जिसे बिगाडऩे का प्रयास एक श्लोक मिला कर किया गया। फिर कई सारे श्लोकों में संस्कारों को केवल द्विजातियों तक सीमित करने की भी चेष्टा की गई। मनु का अपना अभिप्राय दूसरे अध्याय के 36वें और 37वें श्लोकों से प्रगट हो जाता है और उसमें कहीं कोई भेदभाव नहीं है।
साभार

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