क्या भारत का संविधान मुसलमानों को अल्पसंख्यक का दर्जा देता है ?

images (65)

संविधान दिवस 26 नवंबर पर विशेष

भारत के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो मुसलमानों को अल्पसंख्यक घोषित करता हो, लेकिन राजनीति में ‘सेकुलर गैंग’ ने इस शब्द को अपने राजनीतिक लाभ के लिए गढ़ लिया है । यद्यपि इतना अवश्य है कि भारत के संविधान की धारा 29 व 30 भारतवर्ष में अल्पसंख्यक शब्द और तदजनित विसंगतियों को हवा अवश्य देती हैं। राजनीतिक दलों ने अपने फायदे के लिए कायदे (अर्थात धर्म, नीति, न्याय, निष्पक्षता जैसे वे सभी गुण जो राजनीति की रीढ़ होते हैं) को भुला दिया।
हमारे संविधान में नीति, न्याय और सामाजिक समरसता को स्थापित करने के लिए सभी संविधान निर्माताओं ने आम सहमति बनाकर इस बात पर बल दिया कि प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक न्याय मिलना सुलभ हो।
    किसी वर्ग विशेष की दादागर्दी या गुंडागर्दी के चलते कोई भी वर्ग इन तीनों प्रकार के न्यायों से वंचित न रहने पाए। अभी पश्चिम बंगाल में जिस प्रकार एक पार्टी और उसके समर्थक संप्रदाय के लोगों ने एक दूसरे संप्रदाय पर अपनी राजनीतिक गुंडागर्दी और दादागर्दी का परिचय दिया है, उसकी कल्पना तक हमारे संविधान निर्माताओं ने नहीं की थी।
देश का कोई भी वर्ग सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय से वंचित न रहने पाए – यह भावना बहुत ही पवित्र कही जा सकती है। यद्यपि व्यवहार में हमारे राजनीतिज्ञों ने इस भावना को लगभग दुर्भावना में परिवर्तित कर अल्पसंख्यक शब्द को कुछ इस प्रकार व्याख्यायित व परिभाषित किया है जैसे इसका अभिप्राय किसी वर्ग विशेष को विशेष अधिकार देना है। ‘सेकुलर गैंग’ के प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह ने इसी व्याख्या और परिभाषा को और भी अधिक विकृत करते हुए यहां तक कह दिया था कि भारत के आर्थिक संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। इस प्रकार के बयानों का अर्थ किसी वर्ग विशेष को विशेषाधिकार संपन्न करना नहीं है तो और क्या है ? इससे देश के बहुसंख्यक या दूसरे वर्गों या संप्रदायों को यह आभास होना स्वाभाविक है कि वे इस देश के दोयम दर्जे के नागरिक हैं। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि पिछले लगभग 72 वर्षों में हमने धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक जैसे कई शब्दों की परिभाषा ना तो निर्धारित की और ना ही इस दिशा में सोचने का साहस किया।
यद्यपि केंद्र की मोदी सरकार के द्वारा पहली बार सत्ता संभालने के समय यह अवसर आया था जब हम इस दिशा में कुछ ठोस विचार विमर्श कर सकते थे। ऐसा विचार विमर्श उस समय स्वाभाविक रूप से देश के लिए बहस का विषय हो सकता था जब अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय का प्रभार संभालने के तुरंत बाद 2014 में नजमा हेपतुल्ला ने मुसलमानों के अल्पसंख्यक दर्ज़े को लेकर एक बहुत ही सारगर्भित और उचित टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘यह मुस्लिम मामलों का मंत्रालय नहीं है, यह अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय है … मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं हैं।’
जब संविधान मुसलमानों को अल्पसंख्यक घोषित ही नहीं करता, तब देश के अल्पसंख्यक मंत्रालय को मुस्लिम मंत्रालय समझ लेना संविधान और संविधान की भावना के खिलाफ षड्यंत्र भी है और उसके साथ खिलवाड़ भी है। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत का संविधान अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित नहीं करता । इसके उपरांत भी संविधान की सौगंध ले लेकर हमने देश में हिंदू बहुसंख्यक बनाम मुस्लिम अल्पसंख्यक का एक ऐसा घृणास्पद परिवेश सृजित कर लिया है जो देश की सामाजिक विसंगतियों को हवा देते – देते दूषित और प्रदूषित करता जा रहा है। इस प्रकार की धारणा अवधारणाओं ने अल्पसंख्यक माने जाने वाले मुसलमानों के एक बड़े वर्ग को देश में सांप्रदायिकता फैलाने और धीरे – धीरे देश विभाजन की परिस्थितियां सृजित करने का अवसर उपलब्ध कराया है। हमारे संविधान ने संख्या की दृष्टि से छोटे समुदाय की विशेषता को अल्पसंख्यक दर्जे के कानूनी आधार के रूप में मान्यता तो प्रदान की है पर इस छोटे समुदाय की संख्या कितनी हो ? – यह निर्धारित नहीं किया है।
हमारा मानना है कि सांप्रदायिक आधार पर किसी व्यक्ति को विशेषाधिकार देना और दूसरे के अधिकारों का हनन कर लेना या हनन करके ऐसे विशेषाधिकार देना भी राजनीतिक और सरकारी स्तर पर फैलायी जाने वाली सांप्रदायिकता है । इसी प्रकार किसी जाति विशेष के अधिकारों में कटौती कर किसी जाति विशेष को आरक्षण के आधार पर विशेषाधिकार देना भी सरकारी स्तर पर फैलाया जाने वाला जातिवाद है।
यह कितना अजब खेल है कि राजनीतिक दल और सरकारें अपने स्तर पर खुल्लम खुल्ला सांप्रदायिकता और जातिवाद फैला रहे हैं और संविधान की आड़ में ऐसा कर रही हैं , इसके उपरांत भी ना तो देश की न्यायपालिका सक्रिय हो रही है और ना ही देश के तथाकथित बुद्धिजीवी इस प्रकार की सरकारी सांप्रदायिकता और जातिवाद का विरोध कर रहे हैं।
जबकि सरकारी स्तर पर फैलायी जाने वाली इस प्रकार की सांप्रदायिकता और जातिवाद ने देश की सामाजिक स्थिति को बहुत ही अधिक दुर्बल कर दिया है। यदि यह भी कहा जाए कि उसकी जड़ों को खोखला कर दिया है तो भी कोई अतिशयोक्ति न होगी।
सरकारी स्तर पर जातिवाद और सांप्रदायिकता को फैलाने का खुला खेल सपा और बसपा जैसी पार्टियां तो निसंकोच और निडर होकर खेलती रहीं हैं, परंतु उन्हें उन लोगों का समर्थन प्राप्त होता रहा है जो देश में आरक्षण के समर्थक कहे जाते हैं। इसी प्रकार कांग्रेस ने भी बड़ी सावधानी से जातिवाद और सांप्रदायिकता को हवा देने का काम किया था। उसी की सोच और राजनीति से प्रेरित होकर सपा और बसपा ने अपना काम करना आरंभ किया । यह कितना आश्चर्यजनक तथ्य है कि तथाकथित ओबीसी और एससी एसटी के अंतर्गत आने वाली जातियों ने सपा के द्वारा एक जाति विशेष और एक संप्रदाय विशेष को खुल्लम-खुल्ला अपना समर्थन और सरकारी नौकरियों में उनकी अंधाधुंध भर्ती करते देखा, परंतु इसके उपरांत भी वे मौन साधे रहीं। इसी प्रकार बसपा के शासनकाल में उत्तर प्रदेश में एक जाति विशेष के लिए किए जाने वाले सरकारी भूमि के पट्टों की सरकारी स्तर पर की जाने वाली जातिवादी राजनीति को भी देखा। उस समय यह नारा दिया गया था कि ”जो भूमि सरकारी है – वह भूमि हमारी है”- जबकि अन्य राजनीतिक दलों को यह स्पष्ट करना चाहिए था कि वह भूमि प्रदेश के प्रत्येक व्यक्ति की भूमि थी। मायावती अपना काम करती रही और ओबीसी व एससी एसटी में आने वाली जातियों के अन्य लोग इस पर मौन साधे खेल देखते रहे। वास्तव में सपा और बसपा जैसी पार्टियों के द्वारा इस प्रकार का आचरण अपने ‘वोट बैंक’ को मजबूत करने के लिए मतदाता को दी जाने वाली रिश्वत मानी जानी चाहिए, परंतु ऐसा कुछ भी न तो माना गया और ना मानने की दिशा में कोई चर्चा ही हुई। इसके लिए भाजपा जैसी पार्टियां भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्हें भी एससी / एसटी या ओबीसी की वोट चाहिए । इसलिए उन्होंने विधान मंडलों में ऐसी राजनीति की ना तो आलोचना की और ना ही ऐसी तुच्छ राजनीति को करने पर पूर्णविराम लगाने की दिशा में कोई ठोस कार्यवाही की। इतना ही नहीं वह भी अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए ऐसा ही काम करती रही। उस पर अगड़ी जातियों को अपने साथ लगाए रखने का आरोप लगाया जाता है । इस प्रकार हमाम में सब नंगे हो गए । देश के संविधान और संविधान निर्माताओं की उस मूल भावना को भूल गए जिसमें सर्व समन्वयी समाज की संरचना पर बल दिया गया था और भारत से जातिवाद और सांप्रदायिकता के जहर को धीरे-धीरे समाप्त करने का संकल्प लिया गया था। भारत की सामासिक संस्कृति का प्रचार प्रसार करने का संकल्प हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान के मौलिक कर्तव्यों के अंतर्गत व्यक्त किया है , परंतु उस दिशा में किसी भी राजनीतिक दल ने ईमानदारी से कार्य नहीं किया। जिससे आज हमारे लिए जातिवाद और संप्रदायवाद बहुत बड़ी समस्या बन चुके हैं।
देश की ऐसी स्थिति बनाने में ‘गोदी मीडिया’ का विशेष योगदान रहा है। कुछ लोगों की दृष्टि में ‘गोदी मीडिया’ मोदी शासन में ही पैदा हुई है ,परंतु सच यह है कि देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू के प्रति चाटुकारिता का भाव रखने वाले पत्रकारों या प्रेस के लोगों को भी ‘गोदी मीडिया’ ही कहा जाता था। तब से लेकर आज तक ‘गोदी मीडिया’ का एक वर्ग अपने अपने पसंद के प्रधानमंत्रियों / मुख्यमंत्रियों या राजनीतिज्ञों की आरती उतारने के काम में लगा रहा है। ‘गोदी मीडिया’ के इन निकृष्ट और भ्रष्ट लोगों ने देश के नायकों को कभी सच पर गंभीरतापूर्वक विचार करने का अवसर ही नहीं दिया।
यही कारण है कि भारत के संविधान में मुस्लिमों को अल्पसंख्यक न मानने के बावजूद भी उन्हें विशेष अधिकारों से सुभूषित कर मजबूत किए रखने की दिशा में तो कार्य किया जा रहा है पर इस बात पर चर्चा नहीं हो रही है कि मुस्लिम अल्पसंख्यक है ही नहीं तो उसे अल्पसंख्यक माना क्यों जाए ? इसके साथ ही इस पर भी चर्चा नहीं हो रही है कि देश के संविधान की मूल भावना के अनुसार देश में अल्पसंख्यक कौन हो सकता है ? और उनकी कम से कम संख्या कितनी होनी चाहिए ? सरकारें अपने कार्यों में व्यस्त हैं और ‘गोदी मीडिया’ अपने कार्य में व्यस्त है। जबकि देश का साधारण नागरिक सरकारों की इस प्रकार की उदासीनता के चलते कई प्रकार की विसंगतियों में पिस रहा है।
ऐसे में देश का निर्माण कैसे हो सकता है और कैसे राष्ट्रवाद मजबूत हो सकता है ? – यह प्रश्न बहुत गंभीर हो चुका है।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस समय देश में मंडल कमंडल की राजनीति चल रही थी, उसी समय कांग्रेस अपने मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने के लिए अल्पसंख्यक आयोग कानून का निर्माण कर रही थी। मंडल कमंडल वाले सड़कों पर एक दूसरे से खूनी खेल खेलते रहे और कांग्रेस उस समय अपना काम कर गई। यद्यपि उस अल्पसंख्यक आयोग कानून (1993) में भी अल्पसंख्यक शब्द की व्याख्या नहीं की गई।
आज जो लोग यह कह रहे हैं कि देश जब कोरोना
से जूझ रहा था तो मोदी पश्चिम बंगाल में चुनावी रैलियों में व्यस्त थे, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि देश की चिन्ता इस देश में कब किस राजनीतिक दल को रही है ? – मंडल – कमंडल और अल्पसंख्यक के भंवर में फंसी हुई देश की राजनीति देश के कंकाल को नोंच नोंच कर खाने वाले नेताओं की जमात बन चुकी है।
इस जमात में शामिल हुए अपने-अपने आकाओं के समर्थक पूरे देश में बिखरे पड़े हैं। वे सब भी एक दूसरे से जातीय दुश्मनी रखते हुए दिखाई देते हैं। सपा का समर्थक भाजपा के समर्थक से भिड़ने को तैयार रहता है तो कांग्रेस वाला बसपा से और बसपा वाला किसी और राजनीतिक दल से और कुल मिलाकर सारे एक दूसरे से गुत्थमगुत्था हुए दिखाई देते हैं। इन नेताओं की इस प्रकार की कमीनी राजनीति ने देश में राजनीतिक सांप्रदायिकता को हवा दी है। जिससे जनसाधारण भी राजनीतिक संप्रदायों अर्थात सपा, बसपा, कांग्रेस में विभाजित हो गया है । यह सब एक दूसरे के प्रति वैसे ही खूनी हो गए हैं जैसे दो संप्रदायों के लोग एक दूसरे के प्रति खूनी होते देखे जाते हैं। ऐसी राजनीति की कल्पना के लिए तो शायद हमारे राजनीतिक संविधान निर्माताओं ने सोचा भी नहीं होगा। क्या हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति में आई इन विसंगतियों की ओर ध्यान देकर उचित कदम उठा पाएंगे ?

डॉ राकेश कुमार आर्य

Comment:

betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
vaycasino
betpark
kolaybet
betgaranti
betpark
kolaybet
betpark
betpark
casibom giriş
casibom giriş
casibom
betpark
betpark
kolaybet giriş
betpark
betpark
betgaranti
betpark
betpark
kolaybet
kolaybet
vaycasino
vaycasino
norabahis giriş
norabahis giriş
betbox giriş
betbox giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
xbahis
xbahis
vaycasino
vaycasino
millibahis
millibahis
betnano giriş
bahisfair giriş
betnano giriş
bahisfair giriş
bahisfair giriş
bahisfair giriş
betnano giriş
betnano giriş
timebet giriş
betplay giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
norabahis giriş
perabet giriş
perabet giriş
pokerklas
pokerklas
betpark giriş
betasus giriş
betasus giriş
vaycasino
vaycasino
pokerklas
pokerklas
betpark giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
oslobet giriş
oslobet giriş
oslobet giriş
betnano
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
pokerklas
pokerklas
ikimisli giriş
timebet giriş
casibom giriş
casibom giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
romabet giriş
romabet giriş
casibom
casibom
ikimisli giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
norabahis giriş
roketbet giriş
roketbet giriş
Betist
Betist giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino
vaycasino
betpark giriş
betpark giriş
perabet giriş
perabet giriş
bahiscasino giriş
bahiscasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betnano giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
ikimisli giriş
betplay giriş
timebet giriş
roketbet giriş
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
ikimisli giriş
betplay giriş
norabahis giriş
pokerklas giriş
pokerklas giriş
pokerklas giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
betpark
betpark
Hitbet giriş
Bahsegel giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betnano giriş
betpuan giriş
betpuan giriş