Kalyanराजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह एक मंजे हुए राजनीतिज्ञ हैं, उन्होंने जीवन के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। यह भी सत्य है कि उन्हें ये उतार चढ़ाव उनके अपने स्वाभिमानी स्वभाव के कारण भी देखने को मिले हैं। 1992 ई. में बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय सभी भाजपाइयों से अधिक स्पष्टता और जिम्मेदारी का भाव उन्हीं के शब्दों में था।
मेरी उनसे पहली भेंट उनके दिल्ली स्थित आवास पर हुई थी। मैं यह देखकर दंग था कि वह प्रदेश के छोटे-छोटे कस्बों के अपने कार्यकर्ताओं के नामों से परिचित थे और उनके विषय में बहुत कुछ जानते भी थे।
अब माननीय राज्यपाल महोदय ने फिर कुछ ऐसा कहा है जो उनके गंभीर व्यक्तित्व और भारतीय इतिहास के प्रति गंभीर चिंतन शैली को प्रकट करता है। उन्होंने कहा है कि राष्ट्रगान से ‘अधिनायक’ शब्द हटना चाहिए। राजस्थान विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बोलते हुए उन्होंने यह भी कहा कि महाराणा प्रताप को महान माना जाना चाहिए न कि अकबर को।
कल्याण सिंह ने दोनों बातें ही इतिहास की तर्क तराजू पर तोलकर कहीं हैं। जब 1912 ई. में अंग्रेजों ने भारत की राजधानी को कलकत्ता से नई दिल्ली के लिए स्थानांतरित किया था तो राजधानी का भव्य उद्घाटन करने के लिए ब्रिटेन का तत्कालीन राजा जॉर्ज पंचम यहां आया था। उस समय उसकी भव्य सवारी दिल्ली में निकाली गयी थी, उस कार्यक्रम में भारत के सभी रजवाड़े उपस्थित रहे थे, परंतु महाराणा प्रताप का वंशज तत्कालीन मेवाड़ नरेश उस समय भी ‘अकबर’ के दिल्ली दरबार में उपस्थित नही हुआ। उसने इसे अपने स्वाभिमान के विरूद्घ समझा था और ब्रिटिश राजा के सामने सिर झुकाने से मना कर दिया था। सारे समारोह में मेवाड़ नरेश की कुर्सी खाली पड़ी रही थी। कार्यक्रम में ब्रिटिश राजा के हृदय में महाराणा के वंशज का यह कृत्य बार-बार शूल बनकर चुभता रहा था। इसी को महानता कहते हैं कि जब शत्रु को हर समय अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान का भान कराना शासक अपना दायित्व समझता है। महाराणा इसीलिए महान थे कि वह राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए लड़ते रहे और अकबर को उन्होंने अपने जीते जी शांति से शासन नही करने दिया।
जॉर्ज पंचम के उक्त कार्यक्रम में कांग्रेसियों ने ‘महाराणा’ का अनुकरण न करते हुए उसके लिए एक ‘चारणगीत’ राष्ट्रकवि रविन्द्रनाथ टैगौर से लिखवाया। उन सबने उस ‘चारणगीत’ को विदेशी ‘अधिनायक’ की सेवा में स्वयं को उसका गुलाम मानते हुए गाया था। वह गीत ही ‘जन-गण-मन अधिनायक जय हे’ था। बाद में कांग्रेसियों ने इसे जब अपने हर कार्यक्रम में गाना आरंभ किया और इसे ‘अपने सम्राट’ की चाटुकारिता के लिए स्थायी रूप से मान लिया तो गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगौर की स्वतंत्रता प्रेमी आत्मा भी कांग्रेसियों से विद्रोह कर उठी थी। वह स्वयं पश्चात्ताप करते थे कि मुझसे यह क्या अनर्थ हो गया? मुझे यह गीत बनाकर इन कांग्रेसियों को नही देना चाहिए था।
जब देश स्वतंत्र हुआ तो राष्ट्रगान कौन सा गीत बने इस पर चर्चा आरंभ हुई। कांग्रेसियों में भी 80 प्रतिशत लोग ऐसे थे जो ‘वंदेमातरम्’ को उस समय राष्ट्रगान बनाना चाहते थे, परंतु एक नेहरू की हठधर्मिता के कारण कांग्रेस अपनी गुलामी की मानसिकता से उबर नही पायी और हमें अपने ‘अधिनायक’ की जय जयकार करने के लिए ही अभिशप्त होना पड़ गया। इस गीत में कोई प्रार्थना नही है, अपितु किसी व्यक्ति की अभिवंदना ही है। जबकि राष्ट्रगान वह होता है जिसमें संपूर्ण राष्ट्र समूह गान के माध्यम से सामूहिक प्रार्थना करता है। यजुर्वेद (22/22) में हमें वेद के राष्ट्रगान का पता चलता है। जिसमें ओ३म् आ ब्रह्मन ब्राह्मणों ब्रह्मवर्चसी…..के माध्यम से संपूर्ण राष्ट्र सामूहिक प्रार्थना करते हुए ईश्वर से कहता है :-
ब्रह्मन! स्वराष्ट्र में हों द्विज ब्रह्म तेजधारी।
क्षत्रिय महारथी हों, अरिदल विनाशकारी।।
होवें दुधारू गौवें, पशु अश्व आशुवाही।
आधार राष्ट्र की हों नारी सुभग सदा ही।
बलवान सभ्य योद्घा यजमान पुत्र होवें,
इच्छानुसार बरसें पर्जन्य ताप धोवें।
फ लफूल से लदी हों औषध अमोघ सारी।
हो योगक्षेमकारी स्वाधीनता हमारी।।
अपने लिए प्रार्थना तो सभी करते हैं पर सबके लिए प्रार्थना के क्षण बड़े सौभाग्य से आते हैं। यह कितना सुखद होता है कि प्रत्येक घर से प्रात:काल यज्ञ हवन की सुगंधि निकले और यह वैदिक राष्ट्रीय प्रार्थना हर घर का हर व्यक्ति प्रात:काल करे।
कल्याण सिंह जो कुछ कह रहे हैं वह उचित है उनके शब्द राष्ट्र के लिए कल्याणकारी हैं। राष्ट्रबोध हमंर तभी हो सकता है जब इतिहासबोध हो और इतिहास बोध तभी हो सकता है जब शब्दबोध हो। शब्दों की अपनी गरिमा होती है। मानव की अधिनायकवादी प्रवृत्ति ने विश्व में मानवता को दास बनाने के लिए करोड़ों लोगों का रक्त बहाया है बड़ी कठिनता से लोगों ने ‘अधिनायकवाद’ को विदा किया है, और हम हैं कि आज तक ‘अधिनायक जय हे’ बोलते आ रहे हैं। हमें शब्दबोध होना चाहिए। अतीत की कुपरंपराएं व्यक्ति के उत्सव का नही रूदन का कारण बनती हैं। भारत उत्सवों का देश है-इसलिए उत्सवों के रंग में अधिनायकों की भांग नही पडऩी चाहिए। आवश्यक है कि भारत के इतिहास का पुनर्लेखन हो।

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