भगत सिंह सेवा दल जिसके लिए मानवता की सेवा ही सबसे बड़ी चीज है

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अरुण नैथानी

सचमुच वह भयावह काल था जब अपने अपनों से बचने लगे थे। पड़ोसी और रिश्तेदार तो दूर, खून के रिश्ते भी अपनों से मुंह फेरने लगे थे। एक अनजानी महामारी से भय का वातावरण। महामारी के दायरे से सामान्य दिनों में चरमराने वाली चिकित्सा व्यवस्था कहां इन लाखों मरीजों का बोझ उठाती। ऐसे में मरीजों को अस्पताल ले जाना और लाना भी मुश्किल काम था। फिर जब महामारी पूरी लय में आई तो लाशों तक की बेकद्री शुरू हुई। गाल बजाने वाले नेता कहीं नहीं दिखाई दिये। जनप्रतिनिधि अपनी सुरक्षित मांदों में थे। उस वक्त कुछ संस्थाएं और इंसानियत के जुनूनी लोग मदद को निकले भी। ऐसा नहीं अस्पताल से लेकर सार्वजनिक जीवन में तमाम ऐसे लोग कोरोना योद्धा देश में काम कर रहे थे। इन्हीं में उल्लेखनीय हैं जितेंद्र शंटी। शहीद भगत सिंह के समाज उत्थान के लिये जुनून से प्रेरित होकर करीब पच्चीस साल से सेवा का लंगर चला रहे हैं शंटी। उनके और उनकी टीम के योगदान को पिछले दिनों नागरिक सम्मान दिया गया। यूं तो घोषणा पिछली जनवरी में हो गई थी, लेकिन फिर कोरोना की दूसरी लहर आ गई। पद्मश्री की घोषणा हुई तो उन्हें लगा उनकी जिम्मेदारी फिर कसौटी पर आई है। कुछ सतही सोच के लोगों ने कहा भी कि अब तो पद्मश्री मिल गया है क्यों श्मशान घाट के चक्कर लगा रहे हो। तब शंटी का कहना था कि भगत सिंह ने 23 साल की उम्र में शहादत दे दी, तो हम इस उम्र में क्यों नहीं कुछ कर गुजरते।

वैसे तो पहली कोरोना की लहर में भी शहीद भगत सिंह सेवा दल ने सेवा का जुनून दिखाया। लेकिन दूसरी लहर ज्यादा मारक थी। महामारी का दायरा बड़ा था। शुरुआत में शंटी की संस्था रक्तदान शिविर लगाती थी। वे खुद भी 102 बार रक्तदान कर चुके हैं। फिर मरीजों को ले जाने और अस्पताल से लाने के लिये एंबुलेंस सेवा की शुरुआत हुई। कारवां बढ़ता गया। कोरोना की दूसरी लहर में तो उनकी 18 एंबुलेंस दौड़ रही थी। महामारी ने शंटी को भी नहीं बख्शा वे खुद, उनका बच्चा और पत्नी भी कोरोना की चपेट में आये। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और ठीक होकर भी सेवा में जुट गये। उनके एक जांबाज एंबुलेंस चालक पचपन वर्षीय आरिफ खान की मौत कोरोना से हो गई। लेकिन उनका व टीम का उत्साह कम नहीं हुआ। करीब उन्नीस हजार लोगों को उनकी एंबुलेंस ने अस्पताल व घर पहुंचाया।

ऐसे वक्त में जब अपने रक्त संबंध के लोग भी अपनों के शवों को अंतिम विदाई देने से कतरा रहे थे या पूरा परिवार ही कोरोना संक्रमण की चपेट में था, तो शहीद भगत सिंह सेवा दल के जांबाज मैदान में डटे थे। उन्हें रोज चालीस-पचास फोन मदद के लिये आते। कभी-कभी तो कनाडा, अमेरिका, आस्ट्रेलिया से लोगों के फोन आते कि हमारे परिजनों को अस्पताल पहुंचा दो, अंतिम संस्कार कर दो, हम पैसे देने को तैयार हैं। शंटी बताते हैं कि उनकी संस्था ने करीब चार हजार लोगों का अंतिम संस्कार किया। इस कार्य में संगठन के स्वयं सेवकों के साथ उनका बेटा व पत्नी भी शामिल होते। पीपीए किट व कई मास्क लगाकर वे अनजान लोगों को अंतिम विदाई देते। सैकड़ों ऐसे लोग भी थे, जिनका कोई आगे-पीछे न था। वे दुख जताते हैं कि करीब 967 शव ऐसे थे जिन्हें लोग श्मशान घाट के गेट पर छोड़ गये। यह बड़ा मुश्किल वक्त था, बेटे-बेटियां संक्रमित न हो जायें, इस भय से अपने मृत परिजनों को दूर से नमस्कार करके खिसक जाते थे। कई संतानें तो ऐसी थीं कि वे शव से कीमती सामान, नकदी, मोबाइल और जेवर निकालने को प्राथमिकता देते थे। क्या इन सामानों के जरिये संक्रमण नहीं फैल सकता था?

इस दौरान कई ऐसे घटनाक्रमों से शंटी रूबरू हुए कि उन्होंने बार-बार मानवता को मरते देखा। कई घरों में लाशें पड़ी होती थीं और डर के मारे कोई रिश्तेदार व पड़ोसी उन्हें अंतिम संस्कार के लिये नहीं ले जाते थे। हमें उठाने के लिये फोन आते। कभी विदेशों से कि हमारे परिजनों को अंतिम विदाई दे दो। हमारा मानना था कि व्यक्ति की अंतिम विदाई गरिमामय होनी चाहिए। इतना ही नहीं शंटी की टीम का दावा है कि उनकी संस्था ने चौदह हजार लोगों की अस्थियां सम्मान के साथ विसर्जित की। एक घटना का जिक्र करते हुए शंटी बताते हैं कि जब वे एक शव को लेकर उसके घर गये तो बच्चों ने उनकी जेब से सारे पैसे निकाल लिये। उन्होंने मुझे ड्राइवर समझकर पैसे देने चाहे, तो मैंने उनसे कहा कि हम तो ये काम सेवा के लिये करते हैं, पैसे नहीं लेते। तब एक भाई दूसरे से बोला ये तो पागल है, ये पैसे हम बांट लेते हैं। एक किस्सा वे और बयां करते हैं कि दिल्ली में 800 गज की कोठी में रहने वाले एक धनी व्यक्ति की मौत हुई तो उनका शव लेने कोई परिवार का सदस्य नहीं आया। जब उनसे संपर्क किया गया तो कहा कि इसने कोठी तो सामाजिक संस्थाओं के नाम कर दी है, हम क्यों आयें उठाने, उन्हीं लोगों को कहो, जिन्हें प्रापर्टी मिली है। इंसानियत की मौत के ऐसे कई किस्से शंटी बयां करते हैं। लेकिन इसके बावजूद शहीद भगत सिंह सेवा दल के जांबाज इंसानियत के भरोसे को कायम रखे हुए हैं। पिछले दिनों राष्ट्रपति ने जितेंद्र शंटी को चौथा बड़ा नागरिक सम्मान पद्मश्री कोरोना में मानवता की सेवा के लिए प्रदान किया। ऐसे लोगों को जब पद्म पुरस्कार मिलता है तो लगता है पुरस्कार की प्रतिष्ठा बढ़ी है।

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