*स्मॉग टावर समस्या या समाधान* ।

इंसान ने जबरदस्त उन्नति की है या अवनति यह आप विचार करें ।

लोहे कंक्रीट के विविध टावरों से धरा को पाट दिया है।
पहले विकराल पर्यावरण समस्याएं उत्पन्न करना फिर उनका आंशिक खर्चीला कृत्रिम समाधान प्रस्तुत करना। हमने आपने भूमि आकाश में स्थापित भीमकाय वॉच अर्थात निगरानी टावर ,मोबाइल टावर तो देखे सुने हैं अब नए टावर स्थापित किए जा रहे हैं पानी की तरह पैसा खर्च कर जिन्हें स्मोग टावर कहा जाता है। इन दिनों दिल्ली एनसीआर का वायु प्रदूषण से दम घुट रहा है। अस्थमा के मरीज ही नहीं स्वस्थ युवा से लेकर छोटे बच्चे गंभीर तौर पर प्रभावित है । एयर क्वालिटी इंडेक्स नियंत्रण से बाहर है। प्रदूषण की समस्या के समाधान के तौर पर जगह-जगह स्मोग टावर स्थापित किए जा रहे हैं। यह टावर स्टील कंक्रीट से निर्मित होते हैं इनकी औसत ऊंचाई 20 से 30 मीटर होती है। दिल्ली एनसीआर में जहरीले वायु प्रदूषण के समाधान के तौर पर 20-20 करोड़ खर्च करके ऐसे ही टावर बनाए जा रहे हैं। इन टावरों के निचले सिरे पर में 40, 40 फेन लगे होते हैं जो दूषित वायु को खींचते हैं इनके बीच 5000 छोटे बड़े फिल्टर होते हैं जो स्थिर वैद्युत बल के सिद्धांत पर कार्य करते हैं जिनसे वायु के प्रदूषित कन चिपक जाते हैं फिर इन फिल्टर से होते हुए टावर के ऊपरी सिरे से आउटलेट के तौर पर स्वच्छ हवा निकलती है लेकिन कितनी हवा स्वच्छ होती है केवल प्रति सेकंड 500 से 1000 घन मीटर वायु तथा करोड़ों रुपया खर्च कर बना हुआ 20 से 30 मीटर ऊंचा एक स्मोक टावर केवल 500 से लेकर 1000 मीटर के दायरे के प्रदूषण को आंशिक तौर पर कम करता है ।इन टावरों को चलाने का खर्चा अर्थात ऑपरेटिंग कॉस्ट कल पुर्जों का मेंटेनेंस बिजली का बिल शामिल करें तो यह सफेद हाथी है सरकारों के लिए लेकिन अधिकारियों नगर निगम नेताओं एनवायरनमेंट सेफ्टी प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनियों की चांदी कटती है कमाई का जरिया है पर्यावरण प्रदूषण के विरुद्ध इन टावरों को समाधान के तौर पर प्रस्तुत करना जनता की भावनाओं स्वास्थ्य के साथ गंभीर खिलवाड़ है ।करदाताओं के पैसों का दुरुपयोग है। भगवान ने हरे भरे पेड़ बनाए हैं पीपल बरगद नीम जैसे जो प्राकृतिक निशुल्क स्मॉग टावर है। एक पेड़ अपने जीवन काल में 250 अधिक इंसानों की आवश्यक आपूर्ति की वायु को स्वच्छ करता है पेड़ प्रदूषक तत्वों कार्बन डाई ऑक्साइड सल्फर डाइऑक्साइड नाइट्रिक ऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों को न केवल ग्रहण करते हुए फिर उन्हें अपने भोजन में इस्तेमाल करते हुए बदले में प्राण वायु ऑक्सीजन का भी निर्माण करते हैं साथ में तलाब आद्र भूमि क्षेत्रों का साथ पेड़ों को मिल जाए तो उनकी क्लीनिंग एफिशिएंसी में जबरदस्त इजाफा होता है। करोड़ों खर्च कर बनाए गए आर्टिफिशियल टावर कभी भी ऑक्सीजन नहीं बनाते । पेड़ ऐसा प्राकृतिक स्मॉग टावर है जिसे कोई भी आम व्यक्ति स्थापित कर सकता है नहीं कोई टेक्निकल इंजीनियरिंग ज्ञान की जरूरत ना ही कोई झंझट आम बच्चा भी अपने हाथों से यह टावर स्थापित कर सकता है वृक्षारोपण के रूप में और उस टावर को लगाइए भूल जाइए कोई इसका मेंटेनेंस नहीं कोई देखभाल नहीं।

नोएडा दिल्ली जैसे महानगरों में 20, 20 करोड़ की धनराशि खर्च कर लगभग आधा दर्जन स्मॉग टावर बनाए जा रहे हैं इतनी धनराशि से सैकड़ों नहीं करोड़ों वर्ग मीटर जमीन को हरी-भरी कर प्राकृतिक स्मॉग टावर पेड़ों उद्यानों के रूप में बनाए जा सकते हैं बल्कि ग्रेटर नोएडा नोएडा के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बहुत से प्राकृतिक स्थान है जिनका संरक्षण करें हरियाली को बढ़ावा देकर पर्यावरण प्रदूषण कें विरुद्ध निर्णायक जंग लड़ी जा सकती है। लेकिन उसमें जन पर्यावरण का हीत तो है लेकिन अधिकारियों नेताओं और अवसरवादी कॉर्पोरेट का हित नहीं है तो वह यूजलेस समाधान है विकास के नाम पर पेड़ों को काट के तालाबों पर अतिक्रमण करिए और प्राकृत उद्यानों को नष्ट कीजिए और कृत्रिम टावर लगाइए और सर्वोच्च न्यायालय एनजीटी में हलफनामा दीजिए कि हम निर्णायक लड़ाई पर्यावरण के विरुद्ध लड़े रहे हैं और सभी अपने कर्तव्यों की इतिश्री करके बैठ जाइए और जनता को जहरीली वायु से मरने के लिए छोड़ देना चाहिए आखिर क्रियाकलाप तो हमारे भी खराब है हम इसी के अधिकारी है।

आर्य सागर खारी✍✍✍

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