Categories
अन्य कविता

घायल धरती की पुकार

परमाणु परीक्षण करता जब, उसकी छाती फट जाती है।
भूकंप जिसे तुम कहते हो, वो धरती के दिल की धडक़न।
कहती किया घायल मानव ने, सुन स्रष्टा तू मेरी तडफ़न।

मेरा दिल आहत कर डाला, इस मानव नाम के प्राणी ने।
आखिर मैं कब तक मूक रहूं, सुन मेरी व्यथा की वाणी ने।

सृष्टि तो मेरा कलेवर है, पर्वत पठार अस्थि पंजर।
मैं पालन सबका करती हूं, चलते क्यों परमाणु खंजर?
पालक और निर्दोष हूं मैं, क्या इसका ये पुरस्कार?
उन्नत मानव को याद नही, क्या जीवन के आधार?

Comment:Cancel reply

Exit mobile version