अमत्र्य सेन और गजेन्द्र चौहान को लेकर छिड़ा विवाद

डा0 कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

प्रो0 अमत्र्य सेन नालन्दा विश्वविद्यालय के कुलापिति पद की अपनी सेवा अव िपूरी हो जाने पर मुक्त हो गये । इसको लेकर सेन अभी भी विवाद चला रहे हैं । अभिनय जगत के गजेन्द्र चौहान को पुणे की एक सरकारी संस्था फि़ल्म व टैलीविजन संस्थान का चेयरमैन नियुक्त किया गया है , इसको लेकर भी विवाद हो रहा है । दोनों संस्थाएँ शैक्षिक संस्थाएँ हैं, इसलिये दोनों को लेकर चल रहे या चलाये जा रहे , इस विवाद पर एक साथ चर्चा हो सकती है। पहले अमत्र्य सेन की बात! उन्हें कुछ साल पहले अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार मिला था। उसके कारण वे आम आदमी की चर्चा में आये थे । ऐसा नहीं कि उससे पहले उन्हें कोई जानता नहीं था। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में , अर्थ शास्त्र पढऩे और पढ़ाने वाले छात्रों और अध्यापकों में उनकी पहचान पहले भी थी। लेकिन यह पहचान अर्थशास्त्र में शो करने वाले या उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों में ही थी। लेकिन अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने के बाद उनकी चर्चा बढ़ी। उन्होंने आरगुमैंटेटिव इंडियन नाम से एक पुस्तक भी लिखी जिसमें भारतीय मानसिकता की व्याख्या करने का प्रयास किया था। बाज़ार में जब किसी चीज़ की कमी हो और वह एक दिन अचानक बाज़ार में आ जाये, तो उसकी क़ीमत ही नहीं बढ़ती बल्कि जिसके खाते में वह चीज़ चली जाये, उस व्यक्ति का मान सम्मान भी बढ़ जाता है। अपने देश में नाबेल पुरस्कार विजेता की यही स्थिति है। विजेताओं की संख्या इतनी कम है कि जब कभी कभार देश में कोई नोबेल पुरस्कार विजेता आ जाता है, तो उसे सिर आँखों पर बिठा लिया जाता है । अब अपने देश के लोगों को नोबेल पुरस्कार क्यों नहीं मिलता और कैसे मिलता है , यह अपने आप में एक अलग पुस्तक का विषय है और मेरी अभी ऐसी पुस्तक लिखने में कोई रुचि नहीं है।

जब सरकार ने उस नालन्दा विश्वविद्यालय का पुनरुद्धार करने का संकल्प लिया , जिसे सदियों पहले विदेशी हमलावरों ने मिट्टी में मिला दिया था और उसके पुस्तकालय को आग के हवाले कर दिया था तो स्वाभाविक ही अमत्र्य सेन को कुलापिति के पद पर अभिषिक्त किया। वे अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता हैं । उस वक़्त भी मीडिया में और बुद्धिजीवी वर्ग में कुछ लोगों ने कहा था कि सेन को यह पद नहीं देना चाहिये क्योंकि नालन्दा विश्वविद्यालय जिस परम्परा के लिये विश्वविख्यात रहा है, ज्ञान की उस परम्परा और दिशा में उनका विश्वास नहीं है। वे पाली भाषा भी नहीं जानते। लेकिन उस समय की सरकार ने अनेक राजनैतिक कारणों से सेन को इस विश्वविद्यालय का कुलापिति बना दिया । सेन की कुलापिति की अव िअभी पूरी नहीं हुई थी, तभी केन्द्र में सरकार बदल गई और भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता संभाल ली । तब फिर चर्चा चल पड़ी कि सरकार अब येन केन प्रकारेण अमत्र्य सेन को , उनकी अव िपूरी होने से पहले ही पद से हटा देगी या फिर त्यागपत्र देने के लिये विवश कर देगी। इस राजनैतिक दख़लंदाज़ी की आशंका कुछ क्षेत्रों में चर्चा का विषय बन गई थी। लेकिन सरकार ने नालन्दा विश्वविद्यालय के काम काज में राजनैतिक दख़लंदाज़ी नहीं की। अमत्र्य सेन का कार्यकाल बिना किसी राजनैतिक बाा के पूरा हो गया। परन्तु अब अमत्र्य सेन की लालसा कुलापिति के रुप में दूसरी पारी खेलने की भी बलबती होने लगी। उसके लिये सेन के पास तर्क भी आ गया था। विश्वविद्यालय के गवर्निंग बोर्ड ने एक औपचारिक प्रस्ताव पारित किया कि सेन बाबू को यह पद संभालने का एक मौक़ा और और देना चाहिये। यह विश्वविद्यालय के काम में राजनीति और राजनैतिक दख़लंदाज़ी का निकृष्टतम उदाहरण था, क्योंकि यह सारा बोर्ड उस सरकार द्वारा नामित था जो पराजित हो चुकी थी। लेकिन सेन को यह अवसर नहीं मिला और सिंगापुर के जार्ज यिओ को नया कुलापिति बनाया गया। अब सेन देश भर में इस नियुक्ति की व्याख्या, नालन्दा विश्वविद्यालय में भाजपा की राजनैतिक दख़लन्दाज़ी के रुप में कर रहें हैं और उन्हें ऐसा आभास भी होने लगा है कि उनको पुन: कुलापिति न बनाये जाने से विद्वानों का अपमान हुआ है। उन्हें यह भी लगता है कि उनको छोड़ कर बाक़ी विद्वान दोयम दर्जे के ही हैं। इसलिये सेन बाबू पढऩे लिखने का काम छोड़ कर , देश में विद्वानों की बहाली के आन्दोलन में लग गये हैं। और यह बहाली तभी हो सकेगी जब उन्हें पुन: नालन्दा का कुलापिति बना दिया जाता है। सेन ने तो आरगुमैंटेटिव इंडियन लिखी है। क्या उन्हें अपनी इस मानसिकता का कोई कारण पकड़ में आया है ?

दूसरा क़िस्सा पुणे स्थित भारत के फि़ल्म व टैलीविजन संस्थान के चेयरमैन का है । इस संस्थान का अपने वक़्त में बहुत नाम और स्थान हुआ करता था । अभिनय और कला के क्षेत्र में इसके कई विद्यार्थियों ने फि़ल्म जगत में भी ख्याति प्राप्त की। कलात्मक फि़ल्मों में, इसके कई छात्र बहुत ऊँचाइयों तक पहुँचे। लेकिन दुर्भाग्य से कलात्मक फि़ल्मों के निर्देशकों और अभिनेताओं को ख्याति और सम्मान तो मिलता है लेकिन दर्शक बहुत कम मिलते हैं। भारतीय सिनेमा में जिन अभिनेताओं और निर्देशकों को आम दर्शकों का प्यार मिला, उनको इस प्रकार के संस्थानों में शायद दाख़िला भी नहीं मिल सकता था। लेकिन पिछले कुछ साल से संस्थान कलात्मक सिनेमा के लिये भी कोई सार्थक योगदान कर पाया हो, ऐसा ध्यान में नहीं आता। पुरानी ख्याति की ही अभी तक जुगाली की जा रही है । यह संस्थान राजनीति का और निहित स्वार्थों का अखाड़ा बन कर रह गया था। नामी गिरामी लोग इसके चेयरमैन बन जाते थे ।

इससे उनका अपना अहम तो संतुष्ट हो जाता था , लेकिन वे संस्थान को पटरी पर लाने के लिये कुछ कर नहीं पाते थे । शायद अन्य अन्य व्यस्तताओं के चलते, संस्थान उनकी प्राथमिकता में नहीं रहता होगा । पिछले कुछ वर्षों से संस्थान जिस दुष्चक्र में फँस गय़ा था, उसमें से उसे निकालना बहुत जरुरी था । सरकार ने गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति से ऐसा ही करने का प्रयास किया है । लेकिन जो विवाद अमत्र्य सेन को न नियुक्त करने को लेकर हुआ था, वही विवाद गजेन्द्र चौहान को नियुक्त कर दिये जाने को लेकर हो रहा है। तर्क यहाँ भी सेन वाला ही है। चौहान इस योग्य ही नहीं है। भारतीय विश्वविद्यालयों या शिक्षा संस्थानों में यह विवाद पुराना है। जो व्यक्ति नियुक्त नहीं हो पाता, उसकी दृष्टि में नियुक्त हो गया व्यक्ति बौद्धिक स्तर में बहुत नीचे चला जाता है। वह अपनी योग्यता का ढिंढोरा ख़ुद पीटता रहता है और उसकी नजऱ में उसे न नियुक्त किये जाने का कारण केवल राजनैतिक ही हो सकता है । अमत्र्य सेन यह प्रचार करने में सबसे आगे दिखाई दे रहे हैं। यदि क्षण भर के लिये उनके इस तर्क को स्वीकार ही कर लिया जाये तो क्या इससे यह भी सिद्ध नहीं होता कि जब उनकी नियुक्ति नालन्दा विश्वविद्यालय में हुई थी तो वह भी राजनैतिक कारणों से ही हुई थी?

लेकिन गजेन्द्र चौहान के मामले में तो राज बब्बर जैसे अभिनेता भी राजनैतिक दखलनंदाजी का आरोप लगा रहे हैं, जो स्वयं कई राजनैतिक दलों में इर से उर होते हुये राजनैतिक अनुष्ठान का सक्रिय हिस्सा हैं। फि़ल्म जगत में कितने गली मुहल्ले हैं और उन गली मुहल्लों में क्या होता है , यह फि़ल्म जगत से बेहतर और कोई नहीं जानता । उन्हीं में से कुछ लोग जब गजेन्द्र चौहान को प्रश्नित करते हैं, तब आश्चर्य होना स्वाभाविक ही है

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