मनुष्य के भटकाव का अन्त कहाँ है? जन्म लेने से मृत्यु तक कितने चरणों में उसका बाहरी रूप बदलता है? हर वर्ष का पतझड़ उसके हृदय के रेगिस्तान को और भी ‘तपन’ दे जाता है। पर फि र बसन्त आता है और मन का मोर नाचने लगता है।—-लेकिन कितनी देर, कभी गरम लू तो कभी सर्द हवाएँ और कभी मौसम की उमस उसके मन के पपीहा को आसमान की ओर मुँह करके कुछ बोलने के लिए विवश कर देती है। वह पपीहा पागल हो जाता है। हर उमड़ते-घुमड़ते बादल को देखकर वह पी-पी-पी-पी पुकारने लगता है। लेकिन निष्ठुर बादल चुप चले जाते हैं। कोई उसकी प्यास नहीं बुझाता। चातक बने इस मन के मोर को कितने ही कवियों ने समझाया कि हर बादल बरसने वाला नहीं होता, इसलिए हर बादल के सामने तू दीनता के वचन मत बोल।

हर बादल तेरी प्यास नहीं बुझा पायेगा, इसलिए हर बादल को अपने दिल के राज मत खोल। लेकिन प्यासा पपीहा भी आदत से मजबूर है। वह नहीं मानता। भटकता रहता है, तड़पता रहता है। संसार उसकी दीनता पर हँसता है। उसकी खिल्ली उड़ाता है। उसकी ओर दयाभाव से, किन्तु उपहास भरी दृष्टि के साथ देखता है।

ऐसा पपीहा ही है मानव हृदय। मनुष्य के स्वभाव में दो बातें उसे जन्मजात मिलती है। एक है जिज्ञासा और दूसरी है जिजीविषा। जिज्ञासा जानने की इच्छा है और जिजीविषा जीने की इच्छा का नाम है। जानना और जीने की इच्छा रखना ये दोनों ही मनुष्य के नैसर्गिक मौलिक अधिकार हैं। लेकिन ये निष्ठुर समाज इन दोनों नैसर्गिक मौलिक अध्किारों पर भी अपनी निष्ठुरता, निर्ममता और निर्दयता का पहरा बैठा देता है। कितने ही लोग संसार की इस निष्ठुरता, निर्दयता और निर्ममता से दु:खी होकर अपनी जिज्ञासा और जिजीविषा को ‘शान्त’ करके जीवन का अन्त कर लेते हैं। कुछ शान्त हो जाते हैं तो कुछ मौन रहकर संसार के दमनचक्र का शिकार हो जाते हैं। यह कहानी सृष्टि प्रारम्भ से ही चली आ रही है।

आश्चर्य की बात है कि ऐसे निष्ठुर निर्दयी और निर्मम संसार में आने के लिए मनुष्य पुन: पुन: जन्म लेता है। अज्ञानवश वह इस संसार के दमनचक्र में पिसना ही अपना सौभाग्य समझता है। जबकि है उसका यह दुर्भाग्य। मनुष्य की भटकन का यही प्रमुख कारण है। जबकि मोक्ष की प्राप्ति इस भटकन का अन्त है।

आदिकाल में हमारे ऋषियों ने हमें हमारी जिज्ञासा और जिजीविषा को बचाये बनाये रखने के लिए ‘राष्ट्र’ की अवधारणा से अवगत कराया। उनका चिन्तन था कि मनुष्य के स्वाभाविक विकास के लिए और उसके मानस के भटकाव को रोकने के लिए राष्ट्र जैसी भावना महत्वपूर्ण उपाय सिद्घ होगी। क्योंकि राष्ट्र के कर्णधार ऐसे दुष्ट और आततायी लोगों का विनाश कर देंगे जोकि मनुष्य की जिज्ञासा और जिजीविषा को समाप्त करने के कुचक्र रचते हैं।

राष्ट्र की इस अवधारणा ने निस्संदेह अपने लक्ष्य में सफ लता भी प्राप्त की। कार्य चलता रहा। मनुष्य आगे बढ़ता गया, पीढिय़ाँ बीत गयी। फि र सदियाँ बीत गयीं। लगा कि शायद काम बन गया है। मनुष्य की भटकन का अन्त हो गया है। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। राष्ट्र के कर्णधार भी तो मनुष्य ही थे। उन कर्णधारों से उनका उत्तरदायित्व दुष्टों के द्वारा धीरे-धीरे छीना जाने लगा। कहीं वह स्वयं अपने दायित्व बोध् से मुँह फे रकर खड़े हो गये तो कहीं उन्हें किसी दुष्ट आततायी ने ऐसा करने के लिए विवश कर दिया। इस प्रकार बसन्त के फ ूल शीघ्र ही मुरझा गये।

आज के परिवेश में बड़ी व्यापक चुनौतियाँ हैं। राष्ट्र अपनी युवा शक्ति का आह्नान कर रहा है। उसे पुकार रहा हैद्ब्रराष्ट्रध्र्म की स्थापना के लिए। आतंकवाद, क्षेत्रवाद, प्रान्तवाद, भाषावाद, अलगाववाद और न जाने कैसे-कैसे वादों ने राष्ट्र की अन्तरात्मा को चीत्कार करने के लिए विवश कर दिया है। फ लस्वरूप राष्ट्र की हर फिजा में एक आह्नान है, एक चुनौती है। एक ललकार है। एक चेलैंज है। इसे सुनने के लिए युवा शक्ति के कान खोलने की आवश्यकता है। नीति, शृंगार और वैराग्य जीवन की त्रिवेणी है। नीति निश्चित व्यवस्था का नाम है। इसके बिना मानव समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती। शृंगार भी हमारे जीवन का आवश्यक अंग है। इसके बिना मानव समाज आगे नहीं चल सकता। इसे जीवन से निकाला नहीं जा सकता। जबकि ‘वैराग्य’ भी जीवन का ध्येय है।

नीति यदि ‘सत्यम’ की प्रतिपादिका है तो शृंगार ‘सुन्दरम’ का और वैराग्य शिवम का उपासक है। सत्यम, शिवम्, सुन्दरम् की इसी त्रिवेणी में डुबकी लगाना आत्मोत्थान का कारण है। जिज्ञासा और जिजीविषा इन तीनों से ही सुरक्षित और संरक्षित रह सकती है। लेकिन इन्हें सुरक्षा और संरक्षा प्रदान करेगा राष्ट्र। यह त्रिवेणी ही हमारी भटकन को समाप्त कर सकती है। इसलिए राष्ट्र की पुकार को सुनना और अपनी जिज्ञासा और जिजीविषा को सुरक्षित और संरक्षित करना आज के युवा का प्रथम उद्देश्य है। ‘ शृंगार’ में बहकर वह सत्य-शिव को विस्मृत न करे। यही उसके आत्मकल्याण का मार्ग है। अध्यात्म और भौतिकवाद जीवन के दो पहलू हैं। इनका उचित समन्वय करके चलने से ही जीवन की भटकन शान्त हो सकती है। हम निरे शरीर ही नहीं है। हम नश्वर शरीर से अलग हैं। वह जो अलग है वही हम शिव हैं। उसी को हमें पाना है। यह हमारा अध्यात्मवाद है। हमारे जीवन का भौतिक पक्ष हमारा शरीर है। राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देश हमारा भौतिक स्वरूप है तो राष्ट्र एक अमूर्त भावना का नाम है। वह दीखती नहीं अनुभव की जाती है।

दुर्भाग्य से आज हम इस अध्यात्मवाद की अमूत्र्तभावना को मारकर आत्मिक रूप से मर रहे हैं। जिसका परिणाम हमारी बेतहाशा भटकन में दीख रहा है। युवा इस भटकन को समझें और राष्ट्र की आत्मा की पुकार को सुनें। जिज्ञासा व्यक्ति के अन्तर्मन की आध्यात्मिक भूख का नाम है और जिजीविषा उसके बाहरी स्वरूप को बनाये रखने की वस्तु और प्रयास का नाम है। यह उसका भौतिक स्वरूप है।

हमारा हृदय पागल पपीहा है जो अध्यात्म की वर्षा के लिए सदा पी-पी करता रहता है, इस पागल पपीहा की पुकार हमें सुननी चाहिए क्योंकि हृदय की शांति ही हमें वास्तविक शांति प्रदान कराएगी।

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