amit sah bhagvaभाजपा को ‘फीलगुड’ की पुरानी बीमारी है। बेचारी इसी बीमारी के कारण 2004 का लोकसभा चुनाव हार गयी थी। उसके पश्चात भी पार्टी में ‘फीलगुड’ के अलम्बरदारों ने सच कहने वालों की एक भी नही सुनी थी। फलस्वरूप पार्टी अपने पुराने ढर्रे पर ही चलती रही।

नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह पार्टी के ऐसे नेता रहे जिन्होंने अपने अध्यक्षता काल में पार्टी को यथार्थ के धरातल पर उतारकर कुछ सोचने के लिए प्रेरित किया। पर पार्टी के भीतर ‘अहम के बहम’ में जीने वाले ‘फीलगुड’ के रोग से ग्रस्त कुछ लोगों ने नितिन जी को ‘सत्ता’ से शीघ्र ही बेदखल कर दिया। घूमते-फिरते पार्टी की अध्यक्षता पुन: राजनाथ सिंह के पास चली गयी। राजनाथ सिंह ने कई लोगों को उनके ‘अहम और बहम’ की कृत्रिम दीवारों से बाहर निकाला। उन्होंने बड़े साहस के साथ भाजपा के तंग दरवाजों को बड़ा किया और भाजपा में आगे बढऩे के लिए एक ‘56 इंची चौड़ी छाती के चाय वाले’ को अवसर दिया।

पार्टी आगे बढ़ी। कई लोगों के दिलों के दरवाजों के ताले टूट गये तो कई के दिल ही टूट गये। नया परिवर्तन कई लोगों के लिए कष्टïप्रद रहा। राजनाथ सिंह का गणित सफल रहा और देश ‘चाय वाले’ के हाथों में आ गया। सारे देश ने राहत की सांस ली। सबको लगा कि-‘‘नया सवेरा… लेकर आया, नये-नये पैगाम।’’ इन नये पैगामों में से एक पैगाम यह भी था कि पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह यदि सरकार में आते हैं तो उन्हें पार्टी की अध्यक्षता छोडऩी होगी। ‘रातों रात’ पार्टी में एक नया ‘बादशाह अमितशाह’ खड़ा हो गया और वह पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया।

नये बादशाह ने 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रमुख भूमिका निभाई थी। ‘आप्रेशन उत्तर प्रदेश’ में वह सफल रहे थे। यह अलग बात है कि उत्तर प्रदेश में चुनावों के अंतिम चरण के मतदान के पश्चात जब उनसे पूछा गया कि आप उत्तर प्रदेश में लोकसभा की कितनी सीटें भाजपा को मिलती देख रहे हैं तो उन्होंने पार्टी को केवल 55-60 सीटें मिलने की भविष्यवाणी की थी। पर जब सीटें खुलीं तो उन्हें ज्ञात हुआ कि उनका ‘फीलगुड’ कुछ छोटे स्तर का था। वह लोगों की नब्ज को पहचान नही पाये थे, अत: जितनी सीटें वह भाजपा को मिलती देख रहे थे उनसे लगभग अधिक सीटें डेढ़ दर्जन सीटें पार्टी अधिक जीत गयी। इसका अभिप्राय था कि लोग परिवर्तन चाहते थे और उस परिवर्तन का अनुमान अमितशाह जैसे नेताओं को भी नही था, इसलिए उत्तर प्रदेश की सफलता को अमितशाह के प्रबंधन से जोडक़र देखा जाना भाजपा की भूल रही। जिस व्यक्ति को अपने प्रभारी रहते हुए इतना भी पता ना हो कि तेरी पार्टी को प्रदेश में कितनी सीटें मिल रही हैं उसे पार्टी ने ‘फीलगुड’ की कल्चर में अपनी आस्था व्यक्त करते हुए पार्टी का राष्टï्रीय अध्यक्ष बना दिया। राजनाथ सिंह के ‘पर कैच’ कर उन्हें गृहमंत्रालय दे दिया गया। माननीय ने पार्टी का आदेश शिरोधार्य कर सफलता के साथ गृहमंत्रालय का संचालन आरंभ कर दिया।

पार्टी को अमितशाह लेकर चल दिये। कोई मुस्कराहट नये अध्यक्ष ने अपने लोगों के सामने बिखेरने से परहेज करना आरंभ कर दिया। लोगों ने इसे अहंकार में ‘फूली गर्दन’ कहना और मानना आरंभ कर दिया। कई बड़े लोगों के ऑप्रेशन ‘बूढ़ा है छोडिय़े और इसकी मत मानिये, क्योंकि आज के शहंशाह श्रीश्री अमितशाह हैं’ यह सोचकर कर दिये गये। आडवाणी जी जैसे लेागों के ऑप्रेशन का रक्तस्राव अभी तक नही बंद हुआ है। आज की भाजपा बुजुर्गों के आशीर्वाद से वंचित है, और यह पतन के लक्षण होते हैं। ऐसा ही अहंकार देश की जनता ने एक बार आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री एन.टी. रामाराव का भी देखा था, जो अपने  ही लोगों से सीधे मुंह बात नही करते थे और अपने सांसदों को भी ‘मालवाहक गधा’ ही मानते थे। उसका परिणाम क्या निकला था? सभी को पता है। इन्हीं अमितशाह जी के पार्टी अध्यक्ष रहते हुए भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की दिल्ली प्रदेश विधानसभा चुनावों में उपेक्षा की गयी और परिणाम यह आया कि भाजपा को अप्रत्याशित और लज्जाजनक हार का सामना करना पड़ा। ‘फीलगुड’ निकलकर बाहर आ गया पर किसी ने नही देखा और अमितशाह इस लज्जाजनक हार से भी कोई सबक न लेकर अपनी पहले वाली चाल से ही चलते रहे।

इसके पश्चात अब आते हैं, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में। भूमि विधेयक की बात सर्वप्रथम करते हैं। इस विधेयक के प्राविधान मोदी सरकार ने निस्संदेह किसानों के समर्थन में ठीक बनाये हैं। इसका हम पूर्णत: तो समर्थन नही करते, परंतु यह भी मानते हैं कि यह विधेयक इतना घृणास्पद भी नही है कि इसे माना ही न जाए।

क्रमश:

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