क्या वेशयावृति को सरकारी मानयता देने से यौन रोगों व अपराधों आदि की रोकथाम होगी ?

डॉ विवेक आर्य

शंका- पराचीन काल में राजा लोग वैशयावृति में लिपत थे। हमारे यहा पर कामसूतर वं खजराओ कि मूरतियां हैं जोकि हमारी संसकृति का भाग हैं। वेशयावृति को सरकारी मानयता देने से AIDS, STD, ILLEGAL TRAFFICKING आदि कि रोकथाम होगी।
 
समाधान- जो राजा लोग वेशयावृति में लिपत थे वे कोई आदरश नहीं थे। हमारे आदरश तो शरी राम हैं जिनहोंने चरितरहीन शूरपनखा का परसताव असवीकार किया। कछ लोगो दवारा खजराओ की नगन मूरतिया अथवा वातसायन का कामसूतर को भारतीय संसकृति और परमपरा का नाम दिया जा रहा हैं जबकि सतय यह हैं कि भारतीय संसकृति का मूल सनदेश वेदों में वरणित संयम विजञान पर आधारित शदध आसतिक विचारधारा हैं।
भौतिकवाद अरथ और काम पर जयादा बल देता हैं जबकि अधयातम धरम और मकति पर जयादा बल देता हैं । वैदिक जीवन में दोनों का समनवय हैं। क ओर वेदों में पवितर धनारजन करने का उपदेश हैं दूसरी ओर उसे शरेषठ कारयों में दान देने का उपदेश हैं । क ओर वेद में भोग केवल और केवल संतान उतपतति के लि हैं दूसरी तरफ संयम से जीवन को पवितर बनाये रखने की कामना हैं । क ओर वेद में बदधि की शांति के लि धरम की और दूसरी ओर आतमा की शांति के लि मोकष (मकति) की कामना हैं। धरम का मूल सदाचार हैं। अत: कहा गया हैं आचार परमो धरम: अरथात सदाचार परम धरम हैं। आचारहीन न पननति वेदा: अरथात दराचारी वयकति को वेद भी पवितर नहीं कर सकते।
अत: वेदों में सदाचार, पाप से बचने, चरितर निरमाण, बरहमचरय आदि पर बहत बल दिया गया हैं जैसे- यजरवेद ४/२८ – हे जञान सवरप परभ मे दशचरितर या पाप के आचरण से सरवथा दूर करो तथा मे पूरण सदाचार में सथिर करो। ऋगवेद ८/४८/५-६ – वे मे चरितर से भरषट न होने दे। यजरवेद ३/४५- गराम, वन, सभा और वैयकतिक इनदरिय वयवहार में हमने जो पाप किया हैं उसको हम अपने से अब सरवथा दूर कर देते हैं। यजरवेद २०/१५-१६- दिन, रातरि, जागृत और सवपन में हमारे अपराध और दषट वयसन से हमारे अधयापक, आपत विदवान, धारमिक उपदेशक और परमातमा हमें बचा। ऋगवेद १०/५/६- ऋषियों ने सात मरयादां बनाई हैं. उनमे से जो क को भी परापत होता हैं, वह पापी हैं. चोरी, वयभिचार, शरेषठ जनों की हतया, भरूण हतया, सरापान, दषट करम को बार बार करना और पाप करने के बाद छिपाने के लि ूठ बोलना। अथरववेद ६/४५/१- हे मेरे मन के पाप! मसे बरी बातें कयों करते हो? दूर हटों. मैं ते नहीं चाहता। अथरववेद ११/५/१०- बरहमचरय और तप से राजा राषटर की विशेष रकषा कर सकता हैं। अथरववेद११/५/१९- देवताओं (शरेषठ परषों) ने बरहमचरय और तप से मृतय (दःख) का नषट कर दिया हैं। ऋगवेद ७/२१/५- दराचारी वयकति कभी भी परभ को परापत नहीं कर सकता। इस परकार अनेक वेद मनतरों में संयम और सदाचार का उपदेश हैं। खजराओ आदि की वयभिचार को परदरशित करने वाली मूरतिया ,वातसायन आदि के अशलील गरनथ क समय में भारत वरष में परचलित ह वाम मारग का परिणाम हैं जिसके अनसार मांसाहार, मदिरा वं वयभिचार से ईशवर परापति हैं।
कालांतर में वेदों का फिर से परचार होने से यह मत समापत हो गया पर अभी भी भोगवाद के रूप में हमारे सामने आता रहता हैं। यह क कतरक हैं कि वेशयावृति को सरकारी मानयता देने से AIDS आदि बीमारियां कम होगी। क उदहारण लीजिये क विवाहित वयकति सबह से शाम तक मजदूरी कर पैसे कमाता हैं , मेहनत करता हैं, पसीना बहाता हैं। अब कलपना कीजिये वेशयावृति को मानयता मिलने पर वह अपनी बीवी से धंधा करवागा और आराम से बैठ कर खायेगा। अब सरकारी कानून के कारण वह सा नहीं कर सकता। क शराबी बाप अपनी बेटी से अपनी नशे की आवशयकता को पूरा करने के लि धंधा करवागा। कलपना करो बाद में समाज में इससे कितना वयभिचार फैलेगा। क काल में उततरांचल की पहाड़ी जातियों में अनेक परिवारों में सी कपरथा थी। परिवार की महिलाओं से धंधा करवाया जाता था। लाला लाजपत राय जैसे समाज सधारकों ने उस रकवाया था। आज आप सामाजिक परगति के नाम पर फिर से समाज को उसी गरत में कयों धकेलना चाहते हैं? HIV आदि की रोकथाम ने नाम पर विदेशी शकतियां हमारे देश को भोगवाद के रूप में मानसिक गलाम बनाना चाहती हैं जिससे उनके लि भारत क बड़े उपभोकता बाजार के रूप में बना रहे वं यहा के लोग आरथिक, मानसिक, सामाजिक गलाम बनकर सदा पीड़ित रहे।
वैदिक विचारधारा इस गलामी की सबसे बड़ी शतर हैं। इसीलि क सनियोजित षड़यंतर के तहत उसे मिटाने का यह क कतसित परयास हैं। समाज हमारी परमपरा और संसकृति चरितर हीनता नहीं अपित बरहमचरय वं संयम हैं।

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