ग्रामीण विकास की भयावह तस्वीर

Grāmīṇa vikāsaडॉ. अश्विनी महाजन

भारत सरकार द्वारा वर्ष 2011 में हुई जनगणना के आर्थिक, सामाजिक और जाति की गणना के आंकड़े हाल ही में प्रकाशित किए गए हैं। ये आंकड़े भारत में गरीबों की वर्तमान दुर्दशा की कहानी बयान कर रहे हैं। चिंता का विषय केवल यह नहीं है कि गरीबों की हालत खराब है, बल्कि वह पहले से तेज गति से बदतर होती जा रही है।

गौरतलब है कि अभी ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ही ये आंकड़े प्रकाशित हुए हैं। जनगणना के प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार परिवार में अभावों के 7 प्रकार बताए गए हैं- कच्चा घर; परिवार में कार्यशील आयु में वयस्क का न होना; बिना वयस्क पुरुष सदस्य के महिला का परिवार का मुखिया होना; बिना समर्थ वयस्क के अपाहिज सदस्य का होना; 25 वर्ष से ऊपर आयु में बिना साक्षर वयस्क के परिवार; अनुसूचित जाति/जनजाति और शारीरिक श्रम में लगे भूमिहीन परिवार।

जनगणना में पाया गया है कि 48.5 प्रतिशत परिवार कम से कम एक प्रकार के अभाव से ग्रस्त थे, लेकिन सभी प्रकार के अभावों के लिए भूमिहीनता उसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण कारक देखी गई। जैसे कच्चे घरों वाले परिवारों में 59 प्रतिशत भूमिहीन थे, 25 साल की आयु तक सभी निरक्षर सदस्यों वाले परिवारों में से 55 प्रतिशत भूमिहीन थे, अनुसूचित जाति और जनजाति के 54 प्रतिशत परिवार भूमिहीन मजदूरों के थे। यानी विभिन्न प्रकार की अभावग्रस्तता में भूमिहीनता का खासा योगदान दिखाई देता है। गौरतलब है कि कुल 17.9 करोड़ ग्रामीण परिवारों में 5.4 करोड़ परिवार भूमिहीन मजदूरों की श्रेणी में आते हैं। जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि जहां 2001 में जनजाति वर्ग के 45 प्रतिशत किसान अपनी जमीन पर खेती करते थे, 2011 में इस वर्ग के मात्र 35 प्रतिशत लोगों ने ही यह बताया कि वे अपनी जमीन पर खेती करते हैं। जहां 2001 में अनुसूचित जाति के 20 प्रतिशत लोग अपनी जमीन पर खेती करते थे, 2011 में 15 प्रतिशत अपनी जमीन पर खेती करते रिपोर्ट हुए। जहां 2001 में 37 प्रतिशत लोगों ने यह कहा था कि वे भूमिहीन खेतिहर मजदूर हैं, 2011 में 44.4 प्रतिशत लोगों ने अपने आपको भूमिहीन खेतिहर मजदूर बताया। यानी 2001 से 2011 के बीच दस वर्षों में काफी संख्या में गरीबों के हाथ से भूमि छिन गई।

भूमि की मिलकियत व्यक्ति और परिवार के लिए रोजगार और आमदनी का मात्र एक जरिया ही नहीं, वह परिवार के लिए एक बीमा का भी काम करती है। समाज मेें व्यक्ति और परिवार का सम्मान भी भूमि की मिलकियत से बढ़ता है। भूमिहीन लोग रोजगार के लिए सरकार समेत अन्य लोगों पर निर्भर करते हैं और उनका रोजगार भी आकस्मिक होता है, जबकि भूमि के मालिक स्वरोजगार युक्त कहलाते हैं। भूमि के छिनने की यह प्रक्रिया राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 68वें दौर की रिपोर्ट में भी परिलक्षित होती है। गौरतलब है कि इस रिपोर्ट में बताया गया था कि 2004-05 से लेकर 2009-10 के पांच सालों में ही स्वरोजगार में लगे 2 करोड़ 50 लाख लोग स्वरोजगार से बाहर हो गए और दूसरी ओर 2 करोड़ 20 लाख लोग दिहाड़ीदार मजदूर बन गए। यानी राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रिपोर्ट के आंकड़ों को जनगणना के आंकड़े पुष्ट कर रहे हैं।

जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि कुल 13.35 करोड़ परिवारों में अधिकतम कमाने वाले सदस्य की आमदनी 5000 रुपये मासिक से कम थी, यानी कुल परिवारों का 74.5 प्रतिशत। अधिकतम आय वाले सदस्य की 5000 रुपये और 10,000 रुपये के बीच आमदनी वाले परिवारों की संख्या 3.1 करोड़ थी, यानी कुल परिवारों का 17.2 प्रतिशत। किसी एक सदस्य की मासिक आमदनी 10,000 रुपये या उससे अधिक वाले परिवार मात्र 1.5 करोड़ ही थे, यानी कुल परिवारों का मात्र 8.3 प्रतिशत। ये आंकड़े स्पष्ट रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में अभावग्रस्तता की कहानी बयान करते हैं।

हालांकि तकनीकी विकास का कुछ असर ग्रामीण क्षेत्रों पर दिखाई देता है, चूंकि 2001 में जहां बहुत कम मोबाइल फोन थे, 2011 में 68.4 प्रतिशत परिवारों में मोबाइल फोन पाया गया, लेकिन 28 प्रतिशत परिवारों में कोई फोन नहीं था। दोपहिया वाले परिवार मात्र 20.7 प्रतिशत ही थे। 64 लाख परिवारों यानी कुल परिवारों के मात्र 3.8 प्रतिशत के पास ही 50,000 रुपए की सीमा से अधिक के किसान क्रेडिट कार्ड थे।

आजादी के बाद के लगभग 68 सालों में सभी सरकारें लगातार किसान और गांव की बेहतरी के वादे करती रही हैं लेकिन सच्चाई यह है कि आज गांवों में 36 प्रतिशत लोग निरक्षर हैं, 91.7 प्रतिशत परिवारों में अधिकतम आय वाले सदस्य की आमदनी 10,000 से कम है। मात्र 29.7 परिवारों के पास ही सिंचित भूमि है।

आंकड़े बताते हैं कि पिछले 10 वर्षों में गरीबों के हाथों से भूमि छिनने की गति बढ़ गई है। लाखों किसानों की आत्महत्याएं इस बात की ओर इंगित करती हैं कि कृषि अलाभकारी होती जा रही हैै।

यही नहीं, जनसंख्या का दबाव भी भूमि के अभाव को बढ़ा रहा है। गौरतलब है कि 1970-71 में जहां खेत का औसत आकार 2.28 हेक्टेयर था, वह 2010-11 में घटकर मात्र 1.16 हेक्टेयर ही रह गया है। इसके अलावा बड़ी मात्रा में भूमि का उपयोग गैर कृषि कार्यों के लिए होने लगा है। शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, इन्फ्रास्ट्रक्चर इत्यादि के लिए तो भूमि का उपयोग बढ़ा ही है, लाभ कमाने के लिए अमीर लोगों द्वारा बड़ी मात्रा में भूमि बिना वजह भी हस्तगत कर ली गई है। गणना के आंकड़े भी भूमिहीनता को ही अभावों का सबसे बड़ा कारण बता रहे हैं। ऐसे में गरीब को भूमि मिले, इसका तो प्रयास होना ही चाहिए, लेकिन साथ ही वैकल्पिक रोजगार के अवसरों द्वारा उसका आर्थिक सशक्तीकरण निहायत ही जरूरी है।

ग्रामीण उद्योग धंधों, विशेषतौर पर फूड प्रोसेसिंग, दस्तकारी समेत लघु-कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना होगा। कृषि को फिर से लाभकारी बनाकर गांवों को खुशहाल बनाना होगा और गांवों को मुख्यधारा से जोडऩा होगा। ऐसी सब वस्तुएं जो गांवों में बन सकती हैं, उनके आयातों पर अंकुश लगाना होगा। ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार के विशेष अवसर जुटाने होंगे। गांवों में स्वरोजगार के अवसर जुटा कर ही हम भूमिहीनों की दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भरता को कम कर सकते हैं। तभी उनके परिवार शिक्षित व स्वस्थ हो किसी भी मुश्किल का सामना करने में सक्षम होंगे।

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