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भारतीय संस्कृति

लोकहित ही रहा भारतीय धातु परंपरा का उद्देश्य

आर.के.त्रिवेदी

विश्व के कल्याण का भाव लेकर ही भारत में धातुकर्म विकसित हुआ था। धातुकर्म के कारण ही भारत में बड़ी संख्या में विभिन्न धातुओं के बर्तन बना करते थे जो पूरी दुनिया में निर्यात किए जाते थे। धातुकर्म विशेषकर लोहे पर भारत में काफी काम हुआ था। उस परम्परा के अवशेष आज भी देश में मिलते हैं। यह केवल लौह स्तंभों की बात नहीं है, उस ज्ञान परम्परा की भी बात है। वह ज्ञान परम्परा आज भी हमारे देश में धातुकर्म करने वाले अनपढ़ लुहारों के पास सुरक्षित है।
वर्ष 2012 में आंध्र प्रदेश के निजामाबाद जो कि वर्तमान में तेलंगाना में पड़ता है, में एक किले के संरक्षण के उपाय कर रहा था। उस किले की दिवारों में अनेक पेड़ उग आए थे। उन्हें काटने में कठिनाई आ रही थी कि कुल्हाड़ियों की धार पत्थर के कारण कट जाती थी। इस पर मैंने एक स्थानीय लुहार से पूछा कि एक कुल्हाड़ी में धार चढ़ाने का वह कितना लेगा। उसने बताया बीस रुपये। मैंने उसे कहा कि पत्थर पर कुल्हाड़ी मारने पर भी धार न कटे, ऐसी धार चाहिए। इस पर उसने कहा कि ऐसी धार बनाने के तीन सौ रूपये लगेंगे। मैंने उससे पूछा कि कैसे करेगा। उसने लोहे को पहले गरम किया, फिर पानी में डाल कर ठंडा किया। 2-3 बार ऐसा करने के बाद उसने लोहे को लगभग 300 डिग्री सेंटीग्रेट तक गरम किया, वह नीले रंग का हो गया। तब उसने उसे एक काले रंग के पानी में डाल दिया। पूछने पर बताया कि वह काला पानी त्रिफला का पानी था। उससे ठंडा करके उसने एक गड्ढा बनाया और उसमें लोहे को डाल कर उसमें केले के तने को छोटे-छोटे टुकड़े करके उसमें डाल दिया। केले के तने का रस उसमें ठीक से भर गया। फिर उसे बंद करके 15 दिन के लिए छोड़ दिया गया। पंद्रह दिन बाद उसमें ऐसी धार थी कि पत्थर कट रहे थे, धार नहीं। एक धरोहर के संरक्षण में मैंने इन्हीं लुहारों का सहयोग लिया था। उनकी बनाई धार के कारण पत्थरों में जमे वृक्षों को साफ करना संभव हो पाया था।
भारतीय धातुकर्म की इसी उत्कृष्टता के कुछ नमूने हमें देश में लौह स्तंभों के रूप में मिलते हैं। इन स्तंभों की विशेषता है कि लोहे के बने होने के बाद भी इनमें जंग नहीं लगता और खुले में धूप-बरसात को झेलते हुए ये हजारों वर्षों से खड़े हैं। सवाल है कि इन पर जंग क्यों नहीं लगता? आखिर उन्हें किस प्रकार के इस्पात से बनाया गया है?
इन्हें बनाने में पिटवां लोहे का उपयोग किया गया है। लोहे को गरम करके पीट-पीट कर तैयार करने पर पिटवां लोहा तैयार होता है। परंतु इतने बड़े लोहे के टुकड़े को घुमाना संभव नहीं है। परंतु इसी लौह स्तंभ के आकार की तोपें भी मिलती हैं। यानी उस समय इस आकार के लोहे के टुकड़ों को बनाने का तरीका लोगों को ज्ञात था। वे लोग लोहे को गरम करके ठंड़ा करते समय उसे गौमूत्रा में भिगोते थे। गौमूत्रा लोहे के ऊपर एक ऐसी परत चढ़ाता है, जो उसे जंग लगने से बचाती है। इसे हम अपने दांतों के उदाहरण से समझ सकते हैं। हमारे दांतों पर एनामेल की परत चढ़ी होती है। जब तक वह परत सुरक्षित है, हमारे दांत सुरक्षित हैं। एनामेल नष्ट हुआ तो हमारे दांत भी गए। यही बात इन लौह स्तंभों की भी है। मेहरौली के लौह स्तंभ की जाँच करने के लिए जब उसका नमूना लिया गया तो वहाँ की परत कट जाने के कारण वहाँ जंग लगना प्रारंभ हो गया।
इसी प्रकार कोणार्क मंदिर में भी लोहे की बड़े-बड़े बीम बनाए गए थे। आज यह तीन टुकड़ों में मिलता है। इसी प्रकार धार, मध्य प्रदेश में दुनिया का सबसे बड़ा स्तंभ मिलता है। यह भी पिटवां लोहे का बना हुआ है। इसमें भी जंग नहीं लगता। इसका अर्थ है कि इस पर भी कुछ परत चढ़ाई गई होगी। आइने अकबरी में एक संदर्भ मिलता है कि उसके लेखक ने जब पुरी का मंदिर देखा तो वह वर्णन करता है कि उस पर रंग चढ़ाया गया है। उस समय रासायनिक रंग नहीं होते थे। जो रंग होते थे वे जैविक तरीके से तैयार किये जाते थे।
आंध्र प्रदेश में एक धरोहर के संरक्षण के लिए उस पर मुझे एक परत चढ़ानी थी, तो मैंने भी उसी तरह एक रंग तैयार किया था। मैंने इसके लिए मधुमक्खी के मोम को जले हुए किरासन तेल के साथ मिला कर उसे गरम किया और उसकी परत चढ़ाया। इससे वह धरोहर 100 वर्ष तक के लिए संरक्षित हो गया। यह प्रक्रिया हमारे लोगों को पहले से ज्ञात थी।
माउंट आबू में ऐसा ही एक लौह स्तंभ पाया जाता है। कहते हैं कि जब अलाउद्दीन खिलजी को यहां के राजाओं ने हराया तो उसकी सेना के अस्त्रा-शस्त्रों को एकत्रा करके उन्हें पिघला कर उससे एक त्रिशूल के आकार का स्तंभ बनाया। इसलिए इसे जय स्तंभ भी कहा जाता है। मुर्शिदाबाद में एक लोहे की बड़ी तोप है। इस तोप में भी वही तकनीक का प्रयोग किया है। बीजापुर के तोप में भी यही तकनीक पाई जाती है। यह तकनीक इतनी अधिक प्रयोग में रही है कि आज के सामान्य लुहारों को भी इसकी अच्छी जानकारी है।
इसी प्रकार की अन्य भी कई पद्धतियों की चर्चा पाई जाती है। इसे मधुचिकित्सा विधान के नाम से जाना जाता था। इसमें मधुमक्खी के मोम का उपयोग किया जाता था। लोहे पर उस मोम की परत चढ़ाने की प्रक्रिया का वर्णन इसमें पाया जाता है। इसी प्रकार मूर्तियों को बनाने के लिए धातु को पिघलाना, उसे मूर्तियों के सांचे में डालकर मूर्तियां बनाना आदि की प्रक्रिया भी काफी वैज्ञानिक रही है। ऐसी भट्ठियां रही हैं, जिनमें 700 डिग्री तक का तापमान पैदा किया जा सकता था।
लोहे के अयस्कों की पहचान के तरीके थे। युक्तिकल्पतरू में लोहे के प्रकारों का वर्णन पाया जाता है। वहां कलिंगा, वज्रा, भद्रा आदि प्रकार के लोहे का वर्णन किया गया है। धातुकर्म की एक प्रक्रिया में पीप्पली के चूर्ण को गौमूत्रा मिलाकर उसकी एक परत लोहे पर चढ़ाई जाती थी। इसी प्रकार नागार्जुन के रसतंत्रासार में भी धातुकर्म की अनेक विधियों का उल्लेख मिलता है। आचार्य चाणक्य ने अपने ग्रंथ कौटिलीय अर्थशास्त्रा में भी धातुकर्म पर काफी लिखा है। इन सभी विवरणों से यह साबित होता है कि अपने देश में धातुकर्म की एक विशाल परम्परा विद्यमान थी। आज भी गाँवों और शहरों में पाए जाने वाले लुहारों के पास उस विद्या का ज्ञान सुरक्षित है। आवश्यकता है तो उस ज्ञान को सहेजने और उसका उपयोग करने की।
साभार

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