लोकल कलाकारों के लुटने का मौसम आया

सुरेश कुमार

जो हमारी संस्कृति को सहेजते हैं उन्हें हम कितना सम्मान देते हैं, कितना सस्ता समझते हैं और जो सिर्फ सीडी सुनाकर चलते बनते हैं, उनके लिए पलक पांवड़े बिछाते हैं। हैं तो ये भी कलाकार ही, फिर ये अपने ही घर में घर की मुर्गी दाल बराबर क्यों समझे जाते हैंज्समाचारों में ही पढ़ा कि चंबा के मिंजर मेले में मीका सिंह धूम मचाएंगे। एक सहस्राब्दी शहर, एक धरोहर शहर, जिसकी संस्कृति हिमाचली धरोहर मानी जाती है और उसमें शिरकत करने आ रहे हैं मीका सिंह। मीका सिंह यानी विवादों के बादशाह। कभी वह एक समारोह में डाक्टर को थप्पड़ मारते हुए टीवी स्क्रीन पर दिखते हैं, कभी राखी सावंत की वजह से सुर्खियों में रहे और एक बार तो वह हिमाचल में भी सुर्खियां बटोर गए, जब एक समाचार पत्र में मैने पढ़ा कि सीडी सुनाकर मीका सिंह लाखों ले गए। जो मैंने लिखा उससे तो यही लगता है कि मीका सिंह काफी मशहूर हैं और शायद इसी लिए प्रशासन ने मीका सिंह को मिंजर मेले की सांस्कृतिक संध्या में बुलाया है। वैसे हमारे हिमाचली नेता अकसर ऐसे मेलों पर भाषण देते हैं कि मेले हमारी संस्कृति को सहेजते हैं, तो इसका मतलब यह हुआ कि मीका सिंह मिंजर मेले में संस्कृति को सहेजने आ रहे हैं। आप सोच रहे होंगे कि एक कलाकार और वह भी जाने-माने कलाकार के खिलाफ क्या अनाप-शनाप लिख रहा है, पर क्या आपने कभी हिमाचली कलाकारों के बारे में सोचा है। एक तो उन्हें स्टेज पर चढऩे का मौका ही नहीं मिलता है और मौका मिल भी जाए तो मेहनताना कितना मिलता है। बाहरी कलाकार कुछ घंटों के लिए लाखों बटोर कर ले जाते हैं और हिमाचल के ख्याति प्राप्त कलाकार सस्ते में निपटा दिए जाते हैं। जरा सोच कर देखो, तो पाओगे कि जो हमारी संस्कृति को सहेजते हैं उन्हें हम कितना सम्मान देते हैं, कितना सस्ता समझते हैं और जो सिर्फ सीडी सुनाकर चलते बनते हैं, उनके लिए पलक पांवड़े बिछाते हैं। हैं तो ये भी कलाकार ही, फिर ये अपने ही घर में घर की मुर्गी दाल बराबर क्यों समझे जाते हैं। मैं यह नहीं कहता कि लोगों का मनोरंजन न हो, पर सिर्फ मनोरंजन को ही तरजीह दी जाए और हमारी संस्कृति, हमारी युवा पीढ़ी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े, तो यह भी ठीक नहीं। मैं बाहरी कलाकारों को बुलाने के विरोध में भी नहीं हूं, पर अपने कलाकारों के पक्ष में जरूर खड़ा हूं। सरकार और प्रशासन को कार्यक्रम की रूपरेखा इस तरह बनानी चाहिए कि लोगों का मनोरंजन भी हो और जिस मकसद को लेकर ये मेले आयोजित किए जा रहे हैं यानी हमारी प्राचीन संस्कृति के बारे में युवा पीढ़ी को वाकिफ करवाने के लिए, वह मकसद भी पूरा होना चाहिए। और यह मकसद स्थानीय कलाकारों के अलावा कौन पूरा कर सकता है। उस समय हमारे प्रादेशिक कलाकार हीन भावना का शिकार होते हैं, जब पता चलता है कि बालीवुड सिंगर  सोनू निगम कार्यक्रम करने के लिए आठ लाख मेहनताना ले गया या मीका सिंह ने एक घंटा प्रोग्राम के पांच लाख ले लिए और ख्याति प्राप्त हिमाचली कलाकार को बीस हजार रुपए। यह असहनीय है। हिमाचली कलाकार अपनी संस्कृति को सहेजने और इसके प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभा रहे हैं और प्रशासन अपना पूरा खजाना बाहरी कलाकारों पर ही लुटा देता है। सरकार दावे तो बहुत करती है कि मेलों में स्थानीय कलाकारों को तरजीह दी जाएगी, पर होता इसके बिलकुल विपरीत है। हमें अपनी संस्कृति को सहेजने के लिए बाहरी कलाकारों का सहारा लेना पड़ता है जबकि हमारे हिमाचली कलाकार ही इसके लिए काफी हैं, पर प्रशासन को तो पैसा बाहरी कलाकारों पर लुटाना है और यही सब हो रहा है। मनोरंजन का मतलब पैसा लुटाना नहीं होता है। यह पैसा प्रदेश के लोगों के खून- पसीने की कमाई है और इसे यूं ही लुटा देना कहां की समझदारी है। या तो यह हो कि जितना मेहनताना बाहरी कलाकारों को दिया जाता है, उतना ही मेहनताना ख्याति प्राप्त हिमाचली कलाकारों को भी दिया जाए या जितना पैसा हिमाचली कलाकारों को दिया जाता है, उतना ही पैसा कार्यक्रम के लिए बाहरी कलाकारों को दिया जाना चाहिए। हर बार हर मेले या कार्यक्रम के बाद इससे विवाद जुड़ जाते हैं और जांच शुरू हो जाती है, जो बिना किसी निष्कर्ष के बंद हो जाती है और तब तक अगले साल फिर मेलों का दौर शुरू हो जाता है यानी लोकल कलाकारों के लुटने का मौसम आ जाता है। क्या हर समारोह, मेला या सांस्कृतिक कार्यक्रम महज रस्म निभाने तक ही सीमित रहना चाहिए और क्या इन से पूरे होने वाले मकसद बारे गौर नहीं करना चाहिए। डीजे की धुनों और भौंडे म्यूजिक से संस्कृति का सुधार होने के बजाय शोषण ही होगा। कब तक प्रदेश का पैसा बाहरी कलाकारों पर लुटता रहेगा और कब तक हिमाचली कलाकार घर की मुर्गी दाल बराबर समझे जाते रहेंगे? यह सरकार और प्रशासन को तय करना है और तय करना ही पड़ेगा, नहीं तो आने वाली हिमाचली पीढ़ी जान ही नहीं पाएगी कि गंभरी देवी कौन थी। यह युवा पीढ़ी के लिए बड़े शर्म की बात होगी और इसके जिम्मेदार सरकार और स्थानीय प्रशासन होंगे, जिन्होंने हिमाचली मेलों में बाहरी कलाकारों का रंग चढ़ा दिया और हिमाचली संस्कृति की पहचान ‘गंभरी देवी’ कहीं गुम हो गई।

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