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इतिहास के पन्नों से

आज भी ताजा है 1984 के सिख विरोधी दंगों के घाव

 राकेश सैन

बड़े से बड़े आतंकी हमलों के बावजूद पंजाब का साम्प्रदायिक सौहार्द बरकरार रहा और दोनों ने मिल कर आतंकवाद से लोहा लिया। सिख विरोधी दंगों के दौरान भी इस रिश्ते को पूरी गम्भीरता से निभाया गया परन्तु दंगों की भयावहता की घटनाओं के बीच इन घटनाओं पर किसी का ध्यान नहीं जा पाया।

हर दंगे व साम्प्रदायिक हिंसा समाज में विभाजन और तनाव की रेखा खींच जाती है, समाज हितैषी शक्तियां जहां खाई को पाटने में विश्वास करती हैं वहीं विरोधी ताकतों का प्रयास रहता है कि इन दरारों को खाई बना कर समाज को बांटने का काम किया जाए। नवम्बर महीना आते ही हर भारतीयों के दिलों में हरे हो जाते हैं वो जख्म जो उन्हें 1984 में पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गान्धी की कायरतापूर्ण हत्या के बाद सिख विरोधी दंगों के समय मिले। इन दंगों में हुए एकतरफा नरसंहार से हर दिल दुखी है और सभी दंगाइयों को सख्त से सख्त सजा मिलने के बेसब्री से इन्तजार में हैं, लेकिन देखने में आता है कि दंगों की आड़ में सक्रिय हो जाते हैं विष की खेती करने वाले वे लोग जो देश में अलगाव पैदा करना चाहते हैं।

चाहे इन दंगों का आरोप एक राजनीतिक दल पर लगता है परन्तु विभाजनकारी शक्तियों द्वारा इसे समाज के दो घटकों के बीच संघर्ष के रूप में प्रचारित किया जाता है। यह बात सही है कि इन दंगों में उस सिख समाज को अत्यन्त पीड़ादायी परिस्थितियों से गुजरना पड़ा जो कुछ दशक पहले ही विभाजन के बाद देश के उस हिस्से से उजड़ कर आए जिसे आज पाकिस्तान कहा जाता है। दंगों की विभिषिका के बारे में बहुत कुछ लिखा व कहा जा रहा है परन्तु दंगों के दौरान हिन्दू समाज ने किस तरह सिख भाइयों की मदद की और जान पर खेल कर केसधारी बन्धुओं की जान, माल की रक्षा की और पुनर्वास में सहयोग किया उन घटनाओं की अनदेखी-सी की जाती रही है। इन दंगों में हिन्दू समाज ने आगे आ कर जितना सम्भव हो अपने सिख बन्धुओं की जानमाल की रक्षा की और उन्हें संरक्षण दिया।
हिन्दू-सिखों के बीच का यह सम्बन्ध केवल दिल्ली ही नहीं बल्कि देश के बाकी हिस्सों में भी देखने को मिला, इन घटनाओं को पंजाब के लेखक श्री अमरदीप जौली ने अपनी पुस्तक ‘इन्सानीयत जिन्दा है’ में किया है। इसमें लेखक ने देश के विभिन्न हिस्सों में रह रहे उन सिख बन्धुओं के साक्षात्कार प्रकाशित किए हैं जो दंगा पीड़ित हैं और उनके जान-माल की सुरक्षा में हिन्दू समाज, उनके पड़ोसियों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने अपनी जान की बाजी तक लगा दी। जिस तरह पंजाब में आतंकवाद के बुरे दौर में भी हिन्दू-सिखों ने नाखून मांस का सदियों पुराना रिश्ता निभाया, उसी तरह सिख विरोधी दंगों में भी यह रिश्ता खूब परवान चढ़ा।
केवल इतना ही नहीं, दंगा पीड़ितों के लिए न्याय हेतु संघर्ष कर रहे पंजाब के पूर्व विधायक व सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एडवोकेट एच.एस. फूलका भी 19 अगस्त, 2018 को ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित रिपोर्ट में बताते हैं कि ‘पूर्व प्रधानमन्त्री एवं भाजपा के दिवंगत नेता अटल बिहारी वाजपेयी दिल्ली में थे और 1 नवम्बर, 1984 को जब सिख विरोधी दंगे शुरू हुए तो उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था और वो अपने घर पर ही थे। उनके निवास के सामने एक टैक्सी स्टैण्ड था जहां काफी संख्या में सिख वाहन चालक मौजूद थे। दंगाइयों ने उन पर हमला कर दिया, शोर सुन कर वाजपेयी जी बाहर आए और उन्होंने इन सिखों को दंगाइयों से बचा कर अपने घर में शरण दी। दंगों के बाद संसद में तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस ने इनमें केवल 600 सिखों के ही मारे जाने की बात कही तो वाजपेयी जी ने इसका विरोध करते हुए 16 नवम्बर, 1984 को मृतकों के सही आंकड़े संसद के पटल पर रखे जिनकी संख्या 2700 थी। ये आंकड़े भाजपा नेता व दिल्ली के पूर्व मुख्यमन्त्री श्री मदन लाल खुराना (दिवंगत) ने पीड़ितों के घर-घर व राहत शिविरों में जा कर जुटाए थे। इस पर कांग्रेस ने वाजपेयी जी को देश का गद्दार बताया, परन्तु जवाब में उन्होंने कहा कि कोई मुझे कुछ भी कहे कोई अन्तर नहीं पड़ता। बाद में आहूजा समिति ने भी इन्हीं आंकड़ों को सत्य मानते हुए दंगे में मरे लोगों की संख्या 2733 बताई।’

एडवोकेट फूलका आगे कहते हैं कि ‘प्रधानमन्त्री बनने के बाद मैं वाजपेयी जी से मिला और उन्हें बताया कि कांग्रेस पार्टी अपने नेताओं को बचाने के लिए केसों को दबा रही है। सुझाव देने पर वाजपेयी जी ने साल 2000 में नानावटी आयोग की स्थापना की और बन्द हो चुके केस दोबारा खुलवाए। वाजपेयी जी द्वारा सदन में रखी गई मृतकों की सूची ने इस आयोग के कामों में बहुत सहायता की।’ केवल फूलका ही नहीं, देश के वरिष्ठ पत्रकार व लेखक रहे दिवंगत स. खुशवन्त सिंह भी स्वीकार करते हैं कि सिखों की जान-माल की रक्षा में हिन्दू समाज विशेषकर संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं ने अहम भूमिका निभाई थी। 16 नवम्बर, 1989 में पब्लिक ऐशिया में लिखते हुए वे बताते हैं कि ‘यह कांग्रेस (आई.) के नेता थे जिन्होंने 1984 में भीड़ को भडक़ाया जिसमें 3000 से अधिक लोग मारे गये। मैं आर.एस.एस. और भाजपा को यह श्रेय देना चाहता हूँ जिन्होंने उन मुश्किल दिनों में असहाय सिखों को बचाने का साहस दिखाया।’
यह कहने की ही बातें नहीं बल्कि, इस पुस्तक में देश के लगभग दो दर्जन दंगा पीड़ित सिख बन्धुओं के साक्षात्कार प्रकाशित किए गए हैं जिनकी जीवन रक्षा व सहायता हिन्दू समाज के लोगों व संघ के स्वयंसेवकों ने की। सिख धर्म के आरम्भ से ही हिन्दू-सिख समाज के बीच गर्भनाल का रिश्ता रहा है, जो नाल के कटने के बाद भी यथावत बना हुआ है। इतिहास में सभी तरह के सुख-दु:ख, मान-अपमान और खुशी-गम के घटनाक्रम इस समाज ने मिलजुल कर देखे और सहे हैं। देश विभाजन की सर्वाधिक विभिषिका पंजाब व बंगाल ने ही सहन की और पंजाब में हिन्दू-सिख समाज ने मिल कर इन कष्टों को हण्डाया और बाघा से उस पार उजड़ कर आने के बाद एक साथ मिल कर परिस्थितियों से लड़े। इसी एकता का ही असर है कि पंजाब में चली आतंकवाद व अलगाववाद की आंधी के बावजूद हिन्दू-सिख समाज में कभी दरार देखने को नहीं मिली। बड़े से बड़े आतंकी हमलों के बावजूद पंजाब का साम्प्रदायिक सौहार्द बरकरार रहा और दोनों ने मिल कर आतंकवाद से लोहा लिया। सिख विरोधी दंगों के दौरान भी नाखून और मांस के इस रिश्ते को पूरी गम्भीरता से निभाया गया परन्तु दंगों की भयावहता की घटनाओं के बीच इन घटनाओं पर किसी का ध्यान नहीं जा पाया। अब न्यायपालिका का दायित्व बनता है कि पीड़ितों को न्याय व अपराधियों के लिए दण्ड सुनिश्चित किया जाए, जिसमें कि पहले ही बहुत देरी हो चुकी है। जब तक पीड़ितों के जख्मों पर पूरी तरह मरहम नहीं लगता तब तक इस बात की पूरी आशंका बनी रहेगी कि देशविरोधी व समाज कंटक शक्तियां समाज में पनपे आक्रोश का अनुचित लाभ उठा सकती हैं।

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