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राजनीति

क्या बिहार में जंगलराज था या है ? अगर ‘हाँ’ …तो इसमें भाजपा का भी योगदान है

आज से कुछ दिनों पहले , रविवार ९ अगस्त २०१५ को , गया की रैली में बिहार के पिछले २५ वर्षों के शासनकाल को , जंगलराज , कुशासन और बिहार की बदहाली का कारण बता कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो भाजपा की प्रदेश इकाई को सांसत में ही डाल दिया है l प्रधानमंत्री के इस बयान को निगलना व उगलना दोनों ही भाजपा की प्रदेश इकाई के लिए दुविधा का विषय बना हुआ है , क्यूँकि इन कथित पच्चीस वर्षों  के आठ वर्षों में भाजपा की भी सत्ता में भागीदारी थी l बड़ी असमंजस की स्थिति है क्यूँकि अब तक भाजपा यही दावा करते आई  है कि जब तक वो सत्ता में साथ थी बिहार में मंगल ही मंगल था l ऐसे में क्या ये समझा जाए कि प्रधानमंत्री ये मानते हैं कि भाजपा भी बिहार की बदहाली के लिए ज़िम्मेवार है या ‘रौ’ में आने के कारण प्रधानमंत्री जी की जुबान एक बार फिर से फिसल गई जैसे मुजफ्फरपुर की रैली में फिसली थी ….!!

‘जंगलराज’ का नाम दे कर सिर्फ बिहार की छवि धूमिल की गई , आँकड़े भी इसकी गवाही देते हैं l सतही तौर पर अगर देखा जाए तो लालू यादव के पास निःसन्देह कुछ भी शो – केस करने के लिए न था न है , सिवाय गरीब – गुरबों को आवाज देने के l बेशक , लालू यादव की सरपरस्ती के शासनकाल  में कानून – व्यवस्था लचर व बदहाल थी और इसकी जवाबदारी से लालू यादव अपना पल्ला भी नहीं झाड़ सकते l लेकिन लालू यादव की सरपरस्ती  के १५ सालों के शासनकाल को जिस तरह से एक सोची – समझी राजनीतिक रणनीति के तहत ‘जंगलराज’ का नाम दे कर वर्गीकृत ( categorized ) व प्रचारित किया गया  और बिहार की एक बदरंग व दागदार छवि प्रस्तुत  की गई परिस्थितियाँ बिल्कुल वैसी भी नहीं थीं l
चित्रों में दिए गए आँकड़ों को संदर्भ में रखकर अगर देखा जाए तो  लालू – राबड़ी के बाद के शासनकाल , जिसमें आठ सालों तक भाजपा भी हमसफर थी ,  को भी कोई विकृत नाम मिलना ही चाहिए  l ये शासनकाल कहीं से ‘सुशासन’ तो बिल्कुल ही नहीं था , सच तो ये है कि मीडिया को साध कर नीतीश जी के साथ-साथ भाजपाइयों ने भी अपनी पीठ खुद ही बखूबी ठोकी और सिर्फ और सिर्फ जनता को भरमाने का काम किया l
यहाँ सवाल ये उठता है कि जब आज भाजपा ये दिखाने की कोशिश में है कि “बिहार की चिंता उसे ही सबसे ज्यादा सता रही है तो उस समय की वास्तविक स्थिति से वाकिफ होते हुए भी भाजपा सरकार से अलग क्यूँ नहीं हुई थी ?” , उस समय तो भाजपा नीतीश कुमार के कसीदे गढ़ने में लीन थी l क्या आज नीतीश कुमार से अलग होने के बाद भाजपाइयों में इस स्वीकारोक्ति का साहस है कि ” हमारे (भाजपा) और नीतीश जी के साथ के शासनकाल में भी अपराध चरम पर था ?”  ये सवाल सहज ही उठता है कि “क्या सरकार में साथ रहने पर उत्तरदायित्व नहीं बनता था या है  ?”
बहुप्रचारित सुशासन की कड़वी व जमीनी सच्चाई ये है कि “ पिछले १० वर्षों में राज्य में अपराध का तेजी से विकास हुआ l इन दस वर्षों में राज्य में कोई बड़ा औद्योगिक निवेश नहीं हुआ तो इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह भी अपराध ही है , भले ही मीडिया के सहयोग उस पर बखूबी पर्दा डाला गया l भाजपा – नीतीश के आठ वर्षों के साथ की आड़ में बिहार में राजनीतिक – आपराधिक गँठजोड़ ने नई उचाईयाँ हासिल की , इस हकीकत पर भी पर्दा नहीं डाला जा सकता l इस कडवे सच को भाजपा नकार नहीं सकती कि सत्ता में आठ सालों तक साथ रह कर सत्ता के मोह में जनता के हितों को ताक पर रखकर पनपते और फलते-फूलते अपराध की उसने भी अनदेखी की l” आज जब भाजपा सत्ता से बाहर है और सत्ता पर काबिज होने की जुगत में खुद को पाक – साफ साबित करने में लगी है तो ऐसे में यह सवाल उठता है कि “ क्या ऐसे दल से किसी सकारात्मक बदलाव की उम्मीद की जा सकती है जिसने सत्ता में रहते हुए अपने हितों को साधने के उद्देश्य मात्र से बढ़ते हुए अपराध से अपना मुँह मोड़ा ?” एक समय आंतक का पर्याय रह चुके पप्पू यादव का साथ लेना और देना क्या भाजपा का विरोधाभासी चरित्र उजागर करने के लिए काफी नहीं है ? आज पप्पू यादव सरीखे आपराधिक पृष्ठ-भूमि के व्यक्ति को भाजपा नीत केंद्र की सरकार के द्वारा “ Y वाई ” श्रेणी की सुरक्षा प्रदान किया जाना क्या संदेश देता है ? इससे ये साफ साबित होता है कि भाजपा को आपराधिक चरित्र के लोगों से कोई परहेज नहीं बशर्ते ऐसे लोग उसके खेमे में रहें l भाजपा के घटक दल लोजपा में तो आपराधिक चरित्र के लोगों की भरमार है और ऐसे लोगों को अपने समर्थन से भाजपा ने लोकसभा तक पहुँचाने में अपनी ओर से कोई कसर भी नहीं छोड़ी l हाल ही में स्थानीय निकाय कोटे से संबंधित संपन्न विधान-परिषद चुनाव में भी भाजपा से जुड़े कई दागी चेहरे चुन कर आए और इसे विधानसभा चुनावों के पूर्व का सेमी-फाइनल बता कर भाजपा ने जश्न भी मनाया l इसी चुनाव में  टुन्ना जी पाण्डेय (सीवान) , हुलास पाण्डेय (भोजपुर – बक्सर) , दीपिका सिंह (नालंदा , रणजीत डॉन की पत्नी ) जैसे उम्मीदवारों को क्या भाजपा का समर्थन प्राप्त नहीं था ? क्या भाजपा की छतरी के नीचे आते ही साबिर अली का दामन साफ हो गया ? क्या हाल ही में भाजपा में शामिल किए गए ढाका के विधायक पवन जयसवाल की पृष्ठभूमि से भाजपा अनभिज्ञ  है ? ऐसे में ‘परिवर्तन’ की बातें दिखावा मात्र ही साबित होती हैं l स्वतः ही सवाल उठता है कि अपराध और अपराधी के पोषण में भाजपा ‘औरों’ से अलग कैसे है ? भाजपा के प्रदेश और शीर्ष नेतृत्व की मौजूदा कार्यशैली देखकर तो कहीं से नहीं लगता कि वे (भाजपाई) व्यवस्था में सुधार लाना चाहते हैं। श्री जीतन राम माँझी के मुख्यमंत्रीत्व काल में श्री माँझी के पुत्र का एक महिला पुलिसकर्मी के साथ होटल का मामला काफी चर्चा में आया और गरमाया था और तब भाजपा ने इसे जंगलराज की पुनरावृति बताते हुए काफी तूल भी दिया था , लेकिन आज वही जीतन राम माँझी और उनका वही पुत्र भाजपा के साथ कदमताल मिलाते हुए चुनावी रणभूमि में अपनी ताल ठोक रहे हैं l  उपरोक्त उद्धरणों से ये स्पष्ट है कि जंगलराज के खात्मे की बातें करने वाली करने वाली भाजपा आज उसी का हिस्सा बनती नजर आ रही है।

( उद्धृत आँकड़े नेशनल क्राईम रिकॉर्ड ब्यूरो के हैं ,जिन्हें आरटीआई के माध्यम से हासिल किया गया है l)
आलोक कुमार

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