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जीएसटी की कसौटी पर भारत की अर्थव्यवस्था

पार्थ उपाध्याय

अर्थव्यवस्था को एकीकृत रूप दिए जाने और केंद्र-राज्यों के बीच कई स्तरों पर कर संबंधी जटिलताओं को समाप्त करने के लिए वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम का मूर्त रूप लेना बेहद जरूरी है। दुनिया के करीब डेढ़ सौ देश अपने यहां इस तरह की कर व्यवस्था लागू कर चुके हैं। हमारे देश में इस तरह की व्यवस्था एक लंबे समय से अपेक्षित रही है।

संसद का सत्र लोक-अपेक्षाओं को पूर्ण करने का एक मंच होता है। संवैधानिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए ही सरकार संविधान में संशोधन, परिवर्धन और परिवर्तन करती है। विपक्ष भी जन-आकांक्षाओं पर सरकार को काम करने के लिए बाध्य करने का एक माध्यम है। पर कांग्रेस की हठधर्मिता के कारण विपक्ष की यह भूमिका फिलहाल कमजोर हुई दिखती है। लगभग सत्रह हजार नागरिकों ने अपने हस्ताक्षरों के साथ अपील जारी की कि कांग्रेस को राज्यसभा में जीएसटी संविधान संशोधन विधेयक पास करा देना चाहिए। लेकिन मानसून सत्र के समाप्त होते ही जीएसटी जैसे महत्त्वपूर्ण विधेयक के पास होने की उम्मीद पर पानी फिर गया। दरअसल, भारत आर्थिक मजबूती की दिशा में बेहतर साख बना रहा है। जीएसटी जैसे विधेयक अगर कानूनी जामा पहन लेते तो हमारे देश में आर्थिक निवेश के नए रास्ते निश्चित रूप से सुगम होंगे।

अर्थव्यवस्था को एकीकृत रूप दिए जाने और केंद्र-राज्यों के बीच कई स्तरों पर कर संबंधी जटिलताओं को समाप्त करने के लिए वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम का मूर्त रूप लेना बेहद जरूरी है। दुनिया के करीब डेढ़ सौ देश अपने यहां इस तरह की कर व्यवस्था लागू कर चुके हैं। सर्वप्रथम फ्रांस ने 1954 में यह व्यवस्था लागू की थी। भारत सरकार भी इस व्यवस्था के तहत अधिक निवेश, आर्थिक प्रगति और कराधान की जटिलताओं को कम करने की आस लगा रही है। हमारे देश में इस तरह की व्यवस्था एक लंबे समय से अपेक्षित रही है। वस्तु एवं सेवा कर के कई आयामों पर चर्चा करने से पहले हमें समझना होगा कि यह कर-प्रणाली आखिरकार है क्या? दरअसल, हमारे संविधान के भाग-(क) के अंतर्गत अनुच्छेद 268 से 281 के मध्य केंद्र और राज्यों के बीच करों के अधिरोपण और वितरण संबंधी प्रावधान किए गए हैं, जिनके तहत राज्यों में बिक्री कर, चुंगी, वैट समेत तमाम कर राज्य सरकार लगाती है और केंद्रीय कर जैसे उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क आदि केंद्र सरकार लगाती है।

कराधान सिद्धांत के तहत अर्थशास्त्री अंतिम चरण में करों की अधिरोपण प्रक्रिया को सबसे बेहतर मानते हैं, मगर वर्तमान प्रणाली में निर्माता को वस्तु के उत्पादन व बिक्री तक कई स्तरों पर कर चुकाना पड़ता है। लेकिन जीएसटी व्यवस्था में सिर्फअंतिम स्तर पर कर अधिरोपण का प्रावधान है। इसके द्वारा जहां एक ओर करों के संग्रह को बढ़ाया जा सकेगा वहीं करों पर छूट के कई गैर-जरूरी तौर-तरीकों को भी कम किया जा सकेगा।

जीएसटी व्यवस्था को मोदी सरकार के आर्थिक निवेश और मेक इन इंडिया जैसे अभियान से भी जोड़ कर देखा जा सकता है। हमारे देश में कई राज्यों में विदेशी निवेशक आने को आतुर हैं और यह राज्यों पर निर्भर करता है कि वे इस अवसर को कैसे प्राप्त करें। आर्थिक निवेश में कराधान संबंधी जटिलताओं को बड़ी बाधा माना जाता है। अगर इस प्रक्रिया को आसान बना दिया जाए और एकीकृत किया जाए तो यह निवेशक और सरकार, दोनों के हितों में होता है और इससे राज्यों में करों के असमान संग्रह और वितरण संबंधी मामलों पर अंकुश लगता है।

राज्यों और केंद्र के बीच कर वितरण का विवाद सामान्य रूप से बना ही रहता है। लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने जीएसटी का विरोध ही इस आधार पर किया था कि केंद्र सरकार ने 2010 से 2013 के बीच का केंद्रीय सेवा करों का भुगतान पश्चिम बंगाल को नहीं किया। अगर जीएसटी लागू किया जाएगा तो इस तरह के विवादों में निश्चित रूप से कमी आएगी।

जीएसटी व्यवस्था का दूसरा पहलू भ्रष्टाचार को कम करने से भी संबंधित है। राज्यों में और केंद्र के बीच विभिन्न स्तरों पर कराधान की प्रक्रिया कर-चोरी और कर वसूलने वाले प्राधिकारियों को भ्रष्टाचार के अधिक मौके उपलब्ध कराती है। यदि इस विविधता को समाप्त कर दिया जाता है तो भ्रष्टाचार में कमी आएगी। हालांकि वित्तीय वितरण भारत की संघीय व्यवस्था में अहम भूमिका रखता है। सातवीं अनुसूची की प्रथम सूची में केंद्रीय करों का और दूसरी सूची में प्रांतीय करों का उल्लेख है और कई केंद्रीय करों को राज्यों के साथ साझा किया जाता है।

जीएसटी का चर्चा शुरू हुए करीब एक दशक हो गया है। यूपीए सरकार के दौरान जब इसकी पहल हुई तो राज्यों के एतराज भी सामने आए। जीएसटी पर आम सहमति बनाने के लिए राज्यों के वित्तमंत्रियों की एक उच्चाधिकार समिति बनी। तमाम बैठकों के बावजूद समिति आम राय पर नहीं पहुंच पाई। गुजरात और मध्यप्रदेश जैसे भाजपा शासित राज्य भी असहमति प्रकट करते रहे। दरअसल, राज्यों को अंदेशा यह रहा है कि जीएसटी के लागू होने पर कराधान में उनकी स्वायत्तता नहीं रहेगी। यही नहीं, उन्हें राजस्व का नुकसान भी होगा। राज्यों को मनाने के लिए शुरू के तीन वर्षों तक पूरी तरह और बाद के दो साल तक नुकसान की आंशिक भरपाई का भरोसा दिलाया गया। यूपीए सरकार ने इस संबंध में एक विधेयक भी पेश किया था, पर वह कानून का रूप नहीं ले सका। अब मोदी सरकार ने जीएसटी का जो संशोधित विधेयक तैयार किया है उसमें राज्यों को पांच साल तक नुकसान की सौ फीसद भरपाई का आश्वासन दिया गया है।

प्रारंभ के पांच वर्षों में राज्यों को कर-घाटे को पाटने के लिए वित्तीय सहायता देने का प्रावधान जीएसटी व्यवस्था के तहत किया गया है। जीएसटी विधेयक में अंतर-राज्यीय कर लगाने का भी प्रावधान है जिसे केंद्र द्वारा संग्रहीत और राज्यों के बीच वितरित किया जाएगा। संभावित विवादों के निपटारे के लिए विधेयक में जीएसटी परिषद का प्रावधान है जिसमें राज्यों की तो तिहाई हिस्सेदारी होगी। लेकिन कांग्रेस सदन में जिस तरह इस संशोधन को पारित होने में अड़ंगे लगा रही है वह हैरानी का विषय है। कांग्रेस ने ही जीएसटी की पहल की थी। जब वह सत्ता में थी तो विपक्ष पर जीएसटी की राह रोकने का आरोप मढ़ती थी। मगर अब खुद उसकी भूमिका में दिख रही है। इस रवैए के चलते अनेक महत्त्वपूर्ण विधेयक पारित नहीं हो पा रहे हैं। यह सही है कि कांग्रेस ने जीएसटी के बारे में कई अहम संशोधन सुझाए हैं

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