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इतिहास के पन्नों से

अंतिम जन्मदिन पर उदास क्यों थे गांधीजी

विवेक शुक्ला

राजधानी के तीस जनवरी मार्ग पर स्थित बिड़ला हाउस (अब गांधी दर्शन) में महात्मा गांधी के कमरे की पवित्रता और वातावरण को देखकर लगता है कि वे मानो कभी भी यहां आ जाएंगे। उनका आसन, लिखने की टेबल, लाठी वगैरह वहां पर रखे हुए हैं। कमरे के अंदर-बाहर खादी के कपड़े पहने लोग आते-जाते दिखाई दे रहे हैं। वे 2 अक्तूबर, 1947 को ना चाहते हुए भी अपने जन्मदिन पर, जो उनका अंतिम साबित हुआ, की तमाम लोगों से शुभकामनाओं को स्वीकार कर रहे थे। वे उस दिन बेहद निराश-हताश थे। देश की आजादी के बाद यह उनका पहला जन्मदिन था।

गांधी जी से उनके 78वें जन्मदिन पर सुबह मिलने के लिए आने वालों में लॉर्ड माउंटबेटन और लेडी माउंटबेटन भी थी। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, गृहमंत्री सरदार पटेल, मौलाना आजाद वगैरह भी उनसे मिलने आ चुके थे। उनके साथ छाया की तरह रहने वाले ब्रज कृष्ण चांदीवाला, मनु बहन और उनकी निजी चिकित्सक डा. सुशीला नैयर भी बिड़ला हाउस में ही थे। ये तीनों बापू के साथ बिड़ला हाउस में ही रहते थे।

गांधी प्रार्थना-प्रवचन-पेज 371-74 के अनुसार, गाधी जी ने हमेशा की तरह जन्मदिन प्रार्थना और विशेष कताई करके मनाया। वे साढ़े आठ बजे स्नान के बाद अपने कमरे में आए तो कुछ अंतरंग साथी पंडित नेहरू, मेजबान घनश्यामदास बिड़ला तथा उनके परिवार के समस्त सदस्यगण उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। मीरा बहन ने गांधीजी के आसन के सामने रंग-बिरंगे फूलों से ‘हे राम’ और ‘ॐ’ सजाया था। एक संक्षिप्त प्रार्थना हुई, जिसमें सबने हिस्सा लिया। प्रार्थना-प्रवचन महात्मा गांधी के उन प्रवचनों का संकलन है, जो उन्होंने 1 अप्रैल, 1947 से 30 जनवरी, 1948 को अपनी हत्या से एक दिन पहले तक दिल्ली की अपनी प्रार्थना सभाओं में दिए थे।

गांधी जी से मिलने के लिए सरदार पटेल अपनी पुत्री मणिबेन पटेल के साथ बिड़ला हाउस पहुंचे थे। बापू उनसे कहने लगे कि अब मेरी जीने की कतई इच्छा नहीं रही है। अब मेरी कोई सुनता ही नहीं। मैं इतने दिनों से दिल्ली में दंगों को रुकवाने की कोशिश कर रहा हूं पर दंगे रुक नहीं रहे। मेरी कोई सुन ही नहीं रहा। मणिबेन ने बाद में अपनी डायरी में लिखा, ‘उनकी व्यथा असह्य थी। हम उत्साह से उनके पास गए थे, बोझिल हृदय लेकर घर लौटे।’

गांधीजी से 2 अक्तूबर को लोग शाम तक मिलने आते रहे। कई विदेशी आए, सैकड़ों तार आए। गांधी जी ने उस दिन के बारे में लिखा भी है-ये बधाइयां हैं या कुछ और। एक जमाना था, जब सब मेरी कही हर बात को मानते थे पर आज हालत यह है कि मेरी बात कोई सुनता तक नहीं है। मैंने अब ज्यादा जीने की इच्छा छोड़ दी है। मैंने कभी कहा था कि मैं सवा सौ साल तक जिंदा रहूं, लेकिन अब मेरी ज्यादा जीने की इच्छा नहीं रही। दिल्ली के उस अशांत माहौल के बावजूद हिन्दू, मुसलमान और सिख उनके पास उस दिन आ रहे थे। बापू बीच-बीच में यही कह रहे थे कि भारत सबका है। यहां पर सब साथ-साथ रहेंगे। उनसे एक विदेशी पत्रकार पूछने लगे कि आपने कहा था कि आप 125 साल तक जीना चाहते हैं। इसके जवाब में बापू ने कहा-मैंने अब ज्यादा जीने की इच्छा छोड़ दी है। मैंने कभी कहा था कि सवा सौ साल तक जिंदा रहूं, लेकिन अब मेरी ज्यादा जीने की इच्छा नहीं रही।

गांधी जी राजधानी में भड़के सांप्रदायिक दंगों के कारण उदास और असहाय थे। वे 9 सितंबर, 1947 को कलकत्ता से दिल्ली आए थे। दिल्ली में तब से दंगे रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। वे जगह-जगह जाकर दंगे रुकवाने की कोशिशें कर रहे थे। गांधीजी के लिए जन्मदिन सामान्य दिनों की तरह होता था, वह उस दिन भी अपने काम में लगे रहे। वे वर्ष 1931 में जब लंदन में थे तब उधर बसे भारतीयों ने उनका जन्मदिन मनाया था। उस दिन, गांधी सोसाइटी और इंडियन कांग्रेस लीग ने उन्हें चरखा भेंट किया था। इससे पहले 2 अक्तूबर, 1917 को एनी बेसेंट ने बंबई के गोखले हॉल में बापू की तस्वीर का अनावरण किया था। वे वर्ष 1922, 1923, 1932, 1942, 1943 में अपने जन्मदिन पर जेल में थे। उन्होंने 1942 में जन्मदिन पर आइसक्रीम खाई थी, जेल अधीक्षक ने उन्हें फूल हार भेजे थे। बापू 1924 में जन्मदिन पर उपवास पर थे। यह उपवास हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए रखा गया था।

गांधी जी के लिए अंतिम जन्मदिन की तरह अंतिम दिवाली भी नीरस रही थी। वे 12 नवंबर, 1947 को दीपोत्सव वाले दिन दिल्ली में सबसे शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील कर रहे थे। उस दिन उन्हें कुरुक्षेत्र में शरणार्थियों से मिलने के लिए जाना था, पर वे वहां जा नहीं सके। दिवाली वाले दिन वे बिड़ला हाउस में कुछ लोगों से मिले थे। आप जब बिड़ला हाउस से बाहर निकलने लगते हैं तो आपको कुछ गांधीवादी कार्यकर्ता बापू का प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिये’ समवेत स्वर में गाते हुए मिल जाते हैं।

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