कैसी स्थिति थी प्राचीन भारत में नारियों की

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ज्ञानेंद्र बरतरिया

इस लेख के दो उद्देश्य हैं। एक यह कि यह लेख प्राचीन भारत में कन्याओं, स्त्रियों और महिलाओं की स्थिति को यथासंभव और संक्षेप में प्रस्तुत करें, और दूसरा यह कि इस लेख को पढऩे वाले व्यक्ति उस प्रत्येक नारी के सम्मान और कल्याण के लिए प्रेरित हों, जो नारी उनसे मां, बहन, बेटी या पत्नी या किसी भी रूप में संबद्ध हो।
बात आगे बढ़ाने के पहले एक स्थिति पर विचार करें। वर्तमान में नारी के संरक्षण के लिए लगभग हर स्थिति के लिए कानून मौजूद हैं। वर्तमान में जीवन के लगभग हर क्षेत्र में नारी अपनी उत्कृष्टता सिद्ध कर चुकी है। नारी स्वावलंबी भी है और कई स्थानों पर तो आश्रयदाता भी है। वह सशक्त भी है और सफल भी। फिर भी, बेटी बचाओ की मुहिम हमारे ही देश में हमें क्यों चलानी पड़ती है। उत्तर सीधा सा है- व्यक्तिगत सफलता और सामूहिक सफलता में अंतर अभी बाकी है।
क्या यह हमेशा ऐसा ही था? नहीं। प्राचीनकाल में भारतवर्ष में नारी को सदैव एक विशिष्ट स्थान रहा है, पर धीरे धीरे और विभिन्न विदेशी आक्रमणों ने हमारी संस्कृति को इस तरह दूषित किया की नारी समाज में अत्यंत पीछे होती चली गई।
ऐसा कैसे हुआ? नारी के उत्थान के लिए आवश्यक शर्त है कि समाज में शांति हो, बाहुबल निर्णायक न हो, और जहां तक हो सके, आवश्यकतानुसार संसाधन भी हों। विदेशी आक्रमणों ने सबसे पहले शांति की शर्त भंग की। लूटपाट ने संसाधनों में कमी पैदा की, और युद्धक्षेत्र मंह बलिदान देने वाले युवकों की क्षति के कारण बाहुबल की महत्ता स्थापित होती गई। युद्ध पहले भी होते थे, लेकिन उनका लक्ष्य लूटपाट नहीं होता था, और लूटी जाने वाली वस्तुओं में नारी शामिल नहीं होती थी। कैकेयी दशरथ के साथ न केवल युद्ध भूमि में जाती थीं, बल्कि उन्होंने अपने शौर्य से दशरथ की प्राणरक्षा भी की थी। ऐसा इतिहास समाज में पुरुषों को सिर्फ इस आधार पर श्रेष्ठता का दावा करने का अवसर नहीं देता था कि वे बाहुबल में स्त्रियों से श्रेष्ठ हैं।
लेकिन विदेशी आक्रमणों द्वारा किया गया हमारा सांस्कृतिक प्रदूषण इनसे कहीं ज्यादा गंभीर है। नारी के संदर्भ में, भारत पर आक्रमण करने वाली विदेशी संस्कृतियों को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। एक वे जिन्होंने नारी शरीर पर ज्यादा से ज्यादा कपड़े लादने को ही सांस्कृतिक आवश्यकता माना, हालांकि नारी शरीर पर आभूषणों से परहेज किया और दूसरे वे जिन्होंने नारी तन को कम से कम कपड़ों में करना ही अपनी सांस्कृतिक आवश्यकता माना। दोनों में एक बात साझी थी। दोनों के लिए नारी मात्र एक तन, एक शरीर थी, जिसका शेषसमाज, शेष परिवार से संबंध कपड़ों से जुड़ा था। वह न आत्मा थी, न मनुष्य। इन दोनों आक्रमणकारी संस्कृतियों की दृष्टि में नारी में आत्मा नहीं होती थी।
उन संस्कृतियों का प्रभाव आज भी भारत के समाज पर है। एक छोर पर बलात्कारों की भीषण घटनाएं, कन्या भ्रूण हत्याओं की घटनाएं हैं। झूठे प्रेम जाल में फंसाकर युवतियों का देह शोषण करना, उनको ब्लैकमेल करना एक धार्मिक कृत्य माना जा रहा है। हाल ही में आईएसआईएस के सरगना द्वारा एक अमेरिकी बालिका का बार-बार बलात्कार करके यह कहना कि यह कृत्य उसके लिए इबादत की तरह है, भारत को उस सांस्कृतिक हमले की विभीषिका की याद दिलाने के लिए काफी है। दूसरे छोर पर, नारी मुक्ति के नाम पर, नारी को सबल बनाने के नाम पर, आधुनिकता के नाम पर, फिर एक बार नारी को महज शरीर बनाया जा रहा है। लगभग सारे विज्ञापनों में नारी शरीर रा प्रदर्शन होता है और उसे अनावृत करना कला के रूप में पेश किया जाता है। यह काम भावना नहीं है। यह वासना भी नहीं है। यह सरासर बदमाशी है, नारी पर अत्याचार है। खजुराहो के मैथुन मुद्रा में भित्ति चित्रों का उद्हरण देकर इसे न्याय ठहराने वाले उन भित्ति चित्रों से गैर-नारी तत्वों की अनदेखी कर देते हैं। उन भित्ति चित्रों में नारी अपने भागीदार के साथ है, स्वेच्छा से है और किसी को आकर्षित करके व्यवसाय करने का काम नहीं कर रही है। वह वहां बराबरी की भागीदार है, न कि एकतरफा विक्रय वस्तु है। इसके विपरीत अब दफ्तरों में सुन्दर लड़कियों को उनके सौंदर्य के आधार पर रोजगार उन्हें सबल बनाने के लिए, विशुद्ध विज्ञापन की नीयत से, ग्राहकों को प्रभावित करने के लिए दिया जाता है। यह नारी पर अत्याचार है, अगर देह का नहीं तो सौंदर्य का व्यापार है।
अब देखते हैं, प्राचीन भारत में महिलाओं की स्थिति को।
वैदिक काल
वैदिक काल खंड ईसा से 10,000 वर्ष पूर्व से लेकर 5000 वर्ष पूर्व तक का माना जाता है। वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति के दो तीन पहलू देखे जा सकते हैं। एक यह कि इस काल में स्त्रियों को पूर्ण स्वतंत्रता रही। शिक्षा और स्वयंवर ही नहीं, विवाह के जितने प्रकारों का उल्लेख मिलता है, उनमें निश्चित रूप से प्रजापत्य विवाह है, जिसमें माता-पिता अपनी पुत्री का विवाह करते हैं, लेकिन शेष अधिकांश प्रकारों में अपने वर के चयन में कन्या की भूमिका रहती है। इसी प्रकार, लड़कियां भी गुरुकुलों में शिक्षा प्राप्त करती थीं। आश्रमों में ब्रह्मचर्य अनिवार्य था और सह शिक्षा का प्रचलन था। दूसरा पक्ष इस काल में महिलाओं के अन्दर छिपे हुए सर्जनात्मक गुणों के प्रस्फुटन का है। बात सिर्फ इतनी नहीं है कि वैदिक काल में कई विद्वान् महिलाएं हुईं या यह कि उनके नाम वेदों में श्लोकों में समाहित किए गए। बात यह है कि एक तो महिलाएं रचनात्मक कार्यों में संलग्न थीं, और दूसरी यह कि वह इस क्षेत्र में विद्यमान भारी प्रतियोगिता के बावजूद अपना नाम वेदों तक शामिल करवाने में, स्वाभाविक रूप से अनेक पुरुषों को पराजित करते हुए, सफल रहीं। इनमें से कुछ प्रमुख नाम हैं- विश्ववरा, अपाला, घोषा, लोपामुद्रा, मैत्रेयी और गार्गी। इन्हें जीते-जी ऋषि पद प्राप्त हुआ। ऋग्वेद में (अगस्त्य मुनि के साथ) लोपामुद्रा 179 ऋचाओं की रचयिता हैं।
इनमें से घोषा का विशेष उल्लेख आवश्यक है। घोषा कुष्ठ रोग से पीडि़त थीं। वह ऋग्वेद की पुस्तक संख्या 10 के पूरे दो अध्यायों की लेखिका हैं, जिनमें प्रत्येक में 14-14 श्लोक हैं। कुष्ठ रोग से पीडि़त घोषा का विवाह नहीं हो पाता है, जिस कारण वह अपने माता-पिता के साथ ही रहती हैं। ऋग्वेद में घोषा ने उस समय के विश्वप्रसिद्ध जुड़वां चिकित्सक भाइयों – अश्विनी कुमारों से प्रार्थना की। इसमें घोषा ने अश्विनी कुमारों से आग्रह किया कि वह कुष्ठ के कारण अविवाहित हैं और अपने पिता के घर पर पड़ी हुई हैं, अत: कुमार बंधु उसका उपचार करें। घोषा की प्रार्थना पर अश्विनी कुमार उसे कुष्ठ से पूर्णत: मुक्त कर देते हैं। इसके बाद घोषा का विवाह भी हो जाता है और वह खुशहाल जीवन जीने लगती है।
इतनी ही महत्वपूर्ण लोपामुद्रा की भूमिका है। लोपामुद्रा अगस्त्य मुनि की पत्नी थीं। विदर्भ के राजा ने लोपामुद्रा को सारे ज्ञान विज्ञान का अध्ययन करवाया और अध्ययन करते हुए वह जब विवाहयोग्य हो गईं तो राजा ने उनकी अगस्त्य मुनि से शादी करा दिया। अगस्त्य मुनि बेहद गरीबी में जीवन गुजार रहे थे पर लोपामुद्रा राज़महल का त्याग कर जंगल में उनके साथ कठिन जीवन व्यतीत करने लगी। लम्बे समय तक बिना शिकायत अपने पति की सेवा करती रहीं। लेकिन धीरे धीरे वह ऋषि की लम्बी तपस्या से परेशान हो गईं। फिर अपने पति को समझाने के लिए लोपामुद्रा ने वेद में 2 पदों की रचना की। इन पदों में लोपामुद्रा अगस्त्य मुनि से उनके भौतिक जीवन के कर्तव्यों को पूर्ण करने की भावपूर्ण विनती करती हैं। इन्हें पढऩे के बाद ऋषि दृष्टिकोण बदल गया और वह आध्यात्मिक जीवन के साथ साथ भौतिक जीवन में भी पूर्णता को प्राप्त हो गए। इन दोनों से एक पुत्र पैदा हुआ जिसका नाम द्रिधास्यु रखा गया। द्रिधास्यु आगे चलकर एक महान कवि बना।
बहुत अहम बात। वैदिक काल की महान दार्शनिक गार्गी तत्कालीन मिथिला नरेश महाराजा जनक के दरबार के नवरत्नों में से एक थीं। वेद की अनेक ऋचाओं की रचना के अलावा उन्होंने गार्गी संहिता नामक पुस्तक भी लिखी। महाराजा जनक द्वारा आयोजित दर्शन शास्त्र पर बहस के दौरान उसने ऋषि याज्ञवल्क्य से प्रकृति में उपस्थित तमाम वस्तुओ की उत्पत्ति का कारण पूछा था। यह प्रसंग बताता है कि रामायण काल वैदिक युग के मध्य का ही था, उससे अन्यत्र नहीं। महत्व की बात यह भी है कि गार्गी को महाराजा जनक के दरबार में विशिष्ट पद प्राप्त था।
चारों वेदों में नारी विषयक सैकड़ों मंत्र हैं। ऋग्वेद में 24 और यजुर्वेद में 5 विदुषियों का उल्लेख है। इसी प्रकार ऋग्वेद में नारी विषयक 422 मंत्र हैं। यजुर्वेद के अनुसार वैदिक काल में कन्या का उपनयन संस्कार होता था। उसे सन्ध्यावन्दन करने का अधिकार था। ऋग्वेद में तहा गया है कि जो विधवा अपने मृत पति की चिता सजाती है, उसे पुनर्विवाह का आशीर्वाद प्राप्त होता है। ऋग्वेद में स्त्रियों के अपने पति अथवा प्रेमी के साथ मेलों और त्यौहारों में शामिल होने का उल्लेख है। राजकाज चलाने वाली सभाओं और समितियों में स्त्रियों के शामिल होने के ढेरों उदाहरण है। ऋग्वेद में, परिवार के भीतर, स्त्री और पुरष को एकदूसरे का अर्धांश माना गया है और उन्हें सभी दायित्वों में और सभी सम्मानों में बराबरी का अधिकरारी कहा गया है। (ऋग्वेद 5- 6-8)। अथर्ववेद में पत्नी को ‘रथ की धुरीÓ कहकर गृहस्थी का आधार माना गया है।
पुरुष को स्त्री के बिना कुछ धार्मिक कार्य करने की अनुमति नहीं थी, इसके विपरीत, यह देखिए-
‘पत्नी को यज्ञ, संध्या पूजा और अन्य सभी धार्मिक अनुष्ठानों को करना चाहिए, अगर किसी कारण पति मौजूद नहीं है तो अकेले महिला को पूरा यज्ञ करने का अधिकार हैÓ (ऋग्वेद संहिता भाग 1 सूक्त 79 श्लोक 872)
एक नव विवाहित स्त्री को वेद ज्ञान को प्राप्त करके अपनी नई गृहस्थी में उस ज्ञान का उपयोग करने की बात अथर्ववेद में कही गई है -हे दुल्हन ! ईश्वरीय कृपा से वेद का ज्ञान तुम्हारे सामने हो, तुम्हारे पीछे हो, तुम्हारे मष्तिष्क के केंद्र में हो और उसके अंत में भी हो, वेदों के ज्ञान को प्राप्त करने के बाद आप अपने जीवन का संचालन कर सकती हो। आप उदार हो, अच्छे स्वास्थ्य और भाग्य की अग्रदूत हो ,और महान गरिमा के साथ रहती हो और आप अपने ज्ञान से अपनी पति का गृह प्रकाशित करो (अथर्ववेद अध्याय 14-1-64)
वैदिक काल में स्त्री की महानता ऋग्वेद के इस सूक्त से स्पष्ट होती है-
वास्तव में पत्नी की निष्ठा और पवित्रता केवल अग्नि से तुलना करने के योग्य है, शुद्ध अग्निदेव और पतिव्रता स्त्री ही पूजने योग्य हैं (ऋग्वेद संहिता भाग 1 सूक्त 73 श्लोक 829)
एक विशेष और उल्लेखनीय बात यह है कि वैदिक युग में स्त्री को न तो देह रूप में देखा गया और न सिर्फ पत्नी रूप में और घर-गृहस्थी में उसकी भूमिका के रूप में। वैदिक युग में स्त्री को छूट थी कि वह चाहें तो अपना जीवन बिना विवाह किए व्यतीत कर सकती थी। स्त्रियां बिना विवाह किए सारा जीवन शिक्षा में व्यतीत कर सकती थीं। शिक्षार्थी लड़कियों को दो वर्गों में बांट दिया जाता था- ब्रह्मवादिनी और सद्योद्वाह। ब्रह्मवादिनी लंबे समय तक या जीवन भर शिक्षा, दर्शन और धर्म से जुड़ी रह सकती थीं। जबकि सद्योद्वाह लड़कियां युवा होने तक या विवाह होने तक शिक्षा ग्रहण करती थीं। लड़कियां अपना जीवन-साथी चुनने के लिए स्वतंत्र थीं।
वैदिक काल में ही स्त्री की शक्ति रूप में स्थापना हुई और वह शक्ति रूप में पूज्यनीय बनी। देवी स्वरूप को कई स्थानों पर पुरुष देवताओं से ज्यादा शक्तिशाली दिखाया गया था। स्त्री को धऩ, शौर्य और ज्ञान की अधिष्ठात्री बताया गया है। वैदिक काल में औरतों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता था। उसे सिर्फ शिक्षा के लिए भेज देना काफी नहीं होता था। देखिए –
‘एक बालिका के विकास और शिक्षा में महान प्रयत्न और सावधानी की जरुरत होती हैÓ (महानिर्वाण तंत्र)
‘ज्ञान के सभी रूप में महिलाएं है और महिलाओं का स्वरुप ज्ञानमय है Ó (देवी महात्य)
रामायण काल को वैदिक काल का मध्य भाग माना जाता है। इसमें सारे वही गुण पाए जाते है जो की वैदिक काल में पाए जाते हैं। एक महत्वपूर्ण बात, जो रामायण काल में है, वह स्त्रियों को दिए गए वचन को पूरा करने को कत्र्तव्य का रूप देना है। कैकेयी को दिए गए वचन को पूरा करने के लिए महाराजा दशरथ ने अपने पुत्र श्रीराम को जंगल भेज दिया जिसके शोक में वह स्वयं भी मृत्यु को प्राप्त हो गए। स्त्री के बिना कोई भी मंगल कार्य नहीं किया जाता था। सीता की अनुपस्थिति में श्रीराम ने सीता की स्वर्ण प्रतिमा को वाम भाग में बिठाकर ही यज्ञ किया था।
महाभारत के अनुसार, ‘वह घर, घर नहीं जिसमें में पत्नी नहीं।Ó गृहिणीहीन घर ‘जंगलÓ है। महाभारत काल में भी स्त्रियां सामाजिक संबंध स्थापित करने के लिए स्वतन्त्र थीं। खुला यौनाचार नहीं था, लेकिन स्त्रियों का स्वयं प्रणय निवेदन या काम निवेदन करना कोई बहुत अनूठी बात नहीं थी। पर्दा-प्रथा नहीं थी। पुरुषों द्वारा स्त्रियों की रक्षा करना परम कत्र्तव्य माना जाता था। विधवा स्त्री पुनर्विवाह कर सकती थी। स्त्री-पुरुष समान रूप से धार्मिक कृत्यों को करते थे। किसी भी यज्ञ आदि में पति-पत्नी दोनों का होना आवश्यक था। महाभारत काल से कुछ पहले, भगवान श्रीकृष्ण के बाल्य-काल में, कंस के गुप्तचर प्रभाग की मुखिया एक स्त्री- पूतना थी।
हड़प्पा ,मोहनजोदड़ो काल में भी स्त्री देवी रूप में पूज्य थी। यहां मिले आभूषणों से पुष्टि होती है कि महिलाएं अपने सौन्दर्य पर पहले से अधिक ध्यान देने लगी थीं। उन्हें पूर्ण धार्मिक अधिकार प्राप्त थे। उत्तर वैदिक काल के प्रारंभिक वर्षों में स्त्रियों की स्थिति वैदिक युग के समान ही थी। वे वेदों का अध्ययन कर सकती थीं, अपना वर स्वयं चुन सकती थीं। उनके धार्मिक और सामाजिक अधिकार वैदिक काल जैसे ही और पुरषों के बराबर थे। इस काल में जैन और बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार हुआ और अनेक स्त्रियों ने इन धर्मों के प्रचार का कार्य किया। बौद्ध धर्म और जैन धर्म ने भी स्त्री अधिकारों का समर्थन किया।
जैन और बौद्ध धर्मों के पतन और स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन की घटनाएं लगभग साथ-साथ घटीं। नारियों की स्वतंत्रता को पुरुष वर्ग की सुविधा के साथ जोड़ा जाने लगा। जैन और बौद्ध धर्मों के शोर में यज्ञ करना तथा वेदों का अध्ययन वैसे भी सीमित हो गया और स्त्रियों के लिए लगभग प्रतिबन्धित हो गया। विधवा पुनर्विवाह भी बंद होने और स्त्रियों के लिए शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाई होने के लक्षण भी इसी दौर के हैं।
स्मृति युग और यवनों (यूनानियों) के आक्रमण का युग लगभग एक साथ है। इस युग में स्त्रियों के अधिकारों और संकुचित होते गए। स्मृतिकारों ने स्त्री को बचपन में पिता के संरक्षण में, युवास्था में पति के और वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में रहने के आदेश दिया। फिर ग्रंथ युग में समाज और स्त्रियों पर अधिक प्रतिबन्ध लगाए गए। स्त्री-शिक्षा पर पाबन्दी लगी। कन्याओं के विवाह की आयु घटकर 10-12 वर्ष रह गयी। बाल-विवाह का प्रचलन बढ़ गया। वर के चुनाव में कन्या का अधिकार समाप्त हो गया। कुलीन विवाह तथा अनमेल विवाह तथा बाल विवाह का महत्व बढऩे से बहुपत्नी सम्प्रदाय होने लगे। रखैल रखने की प्रथा प्रारंभ हो गई। विधुर चाहें तो 8 या 10 वर्ष की कन्या से विवाह कर सकता था। लेकिन 8 या 10 वर्ष की कन्या का पति मर जाए तो वह आजीवन विधवा बनकर रहने के लिए मजबूर हो जाती थी। विधवाओं की संख्या बढऩे लगी। स्त्रियां माता से सेविका और गृहलक्ष्मी से याचिका बन गयीं। स्त्रियों के लिए विवाह ही एकमात्र धार्मिक संस्कार रह गया।

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