विपक्षी एकता का सपना कितना साकार रूप ले सकेगा

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नरेंद्र नाथ 

पिछले कुछ महीनों से 2024 आम चुनावों में बीजेपी से मुकाबले के लिए विपक्षी दलों की एकता की कोशिश चल रही थी। इसके लिए एक के बाद एक कई मीटिंग भी हुईं। ऐसा संदेश गया कि विपक्षी दल पिछली गलतियों से सीख लेते हुए इस बार एक मंच पर आएंगे और आपसी मतभेद दूर करेंगे। लेकिन अभी विपक्षी एकता कोई आकार लेती कि पिछली बार की तरह ही फिर यह पटरी से उतरती दिखने लगी। हालांकि इस बार इसके पीछे कारण थोड़े अलग हैं। अभी तक विपक्षी एकता में नेतृत्व को लेकर सबसे अधिक विवाद होता था। लेकिन इस बार विपक्षी दलों की आपस में ही सेंधमारी होने लगी। जिस तरह समान विचारधारा वाले विपक्षी दल दूसरे दलों के नेताओं को अपने पाले में करने लगे हैं, उससे विपक्षी एकता की कोशिश फिलहाल विपक्ष बनाम विपक्ष की सियासी जंग में बदल गई है। टीएमसी कांग्रेस नेताओं को अपने पाले में कर रही है। कांग्रेस लेफ्ट नेताओं को शामिल कर रही है। आपस में पाले बदलने का ट्रेंड अभी रुकता भी नहीं दिख रहा है। इससे दलों के बीच कटुता भी सामने आई है। जहां महज कुछ दिनों पहले विपक्षी एकता के लंबे-चौड़े दावे हो रहे थे, अब बयानों में तल्खी है। अब तो सवाल यह पूछा जा रहा है कि विपक्ष बनाम विपक्ष की जंग कहां तक जाएगी?

क्यों आई यह नौबत
एकता की बातों के बीच ऐसी नौबत क्यों आई? क्षेत्रीय दल विपक्षी एकता में जारी इस जंग के लिए कांग्रेस को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका मानना है कि पिछले कुछ सालों से कांग्रेस के गिरते ग्राफ से हालात बदल गए हैं, जिसे कांग्रेस समझ नहीं पा रही है। क्षेत्रीय दल कांग्रेस की निष्क्रियता को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका मानना है कि कई राज्यों में कांग्रेस बीजेपी को टक्कर नहीं दे रही है, ऐसे में विपक्ष का स्पेस किसी न किसी को तो लेना ही होगा। पूर्वोत्तर भारत के एक क्षेत्रीय दल के सीनियर नेता ने एनबीटी को बताया कि दो सालों में अब तक पार्टी एक पूर्णकालिक अध्यक्ष ही नहीं चुन पाई है। उन्होंने कहा कि आपसी गुटबाजी अलग बात है, पार्टी धरातल पर गंभीर नहीं दिखती है। नेताओं ने कहा कि बाहर ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के अंदर भी इस बात को लेकर बेचैनी है। ऐसे में अब क्षेत्रीय दलों का मानना है कि 2021 में कांग्रेस की स्थिति 2004 वाली नहीं रही और विपक्ष की ताकत का नए सिरे से गठन होना चाहिए, उन्हें स्पेस मिलना चाहिए। वहीं आम आदमी पार्टी, टीएमसी जैसे दलों को यह भी लगने लगा है कि यही मौका है जब वे अपनी पार्टी का विस्तार कर सकते हैं।

उधर कांग्रेस को लगता है कि क्षेत्रीय दल अति महत्वाकांक्षा का शिकार हो रहे हैं, और वे जो कर रहे हैं उससे आखिरकार बीजेपी को ही फायदा होगा। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि विपक्षी एकता का मतलब यह नहीं है कि वे अपनी जमीन बाकी दलों को दे दें। लेकिन कांग्रेस भी इस खेल में शामिल है। लेफ्ट नेता कन्हैया को तब दल में शामिल किया गया, जब सीपीआई नेता डी. राजा पार्टी से यह फैसला नहीं लेने का आग्रह कर रहे थे। वहीं कन्हैया के शामिल होने से न सिर्फ लेफ्ट दलों से, बल्कि बिहार में आरजेडी से भी कांग्रेस के रिश्ते प्रभावित हो सकते हैं। सूत्रों के अनुसार पप्पू यादव को भी कांग्रेस शामिल कर सकती है, जिनका आरजेडी से विरोध है। उसी तरह टीएमसी ने गोवा, त्रिपुरा, असम और मेघालय में कांग्रेस के कुछ सीनियर नेताओं को अपने पाले में किया, तो अभी कई नेताओं के उनके संपर्क में रहने की भी बात कही जा रही है। इन राज्यों में टीएमसी भी चुनाव में उतरेगी। आम आदमी पार्टी दिल्ली के अलावा उत्तराखंड, पंजाब, गुजरात सभी जगह कांग्रेस का स्पेस ले रही है। अभी जो संकेत मिल रहे हैं उनके हिसाब से अगले कुछ दिनों में तनातनी और भी बढ़ सकती है। इसका असर विपक्षी दलों की एकता पर पड़ सकता है।
क्या बन पाएगी एकता
तो क्या विपक्षी एकता की कोशिश अब पूरी तरह से बेपटरी हो जाएगी? नेताओं का मानना है कि अभी यह कहना जल्दबाजी होगा। विपक्षी दलों के नेताओं के अनुसार अभी इस मसले पर तनातनी जरूर दिख सकती है, लेकिन इसका असर विपक्षी एकता पर नहीं दिखेगा। उन्होंने कहा कि हर पार्टी अपने संगठन को मजबूत करना चाहती है, उसका विस्तार करना चाहती है। इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन 2024 में बीजेपी के सामने इनके लिए एक होने का विकल्प नहीं होगा, बल्कि यह सबकी मजबूरी होगी। ऐसे में वे कुछ महीनों तक खुद को विस्तार देकर एक बार फिर विपक्षी एकता की कोशिश में लग सकते हैं। वहीं अगले साल फरवरी-मार्च में पांच राज्यों के चुनाव परिणाम भी कोई न कोई दिशा तो लेंगे ही। जाहिर है कि वे मौजूदा तनातनी के बाद भी विपक्षी एकता की कोशिश को खारिज नहीं करते हैं।
वे यह भी समझते हैं कि क्षेत्रीय दल कितने भी एकजुट हो जाएं, अगर कांग्रेस ने अपनी स्थिति नहीं सुधारी तो इस लड़ाई का कोई मतलब नहीं। इसके पीछे तर्क यह है कि 2019 आम चुनाव में लगभग 225 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस-बीजेपी का सीधा मुकाबला हुआ, जिनमें 200 से अधिक सीटें बीजेपी ने जीतीं। ऐसी परिस्थिति बनी रही तो उनके एक होने का भी अधिक लाभ नहीं होगा और वे बीजेपी को नहीं रोक सकते हैं। ऐसे में उनका फोकस गढ़ बचाने पर ही अधिक रह सकता है और उनके विस्तार प्लान को ब्रेक लग सकता है। वहीं कांग्रेस को भी अहसास है कि उसकी ताकत इतनी नहीं है कि बीजेपी से मुकाबला कर सके। गठबंधन उसके लिए मजबूरी है। जाहिर है, आने वाले समय में विपक्षी एकता की रेल तो हमेशा की तरह चलती रहेगी, लेकिन फिलहाल यह बेपटरी जरूर होती दिख रही है।

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