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राष्ट्र गौरव के प्रतीकों को देना होगा उचित सम्मान

ललित गर्ग

देश के वास्तविक इतिहास, आजादी के सच्चे योद्धाओं, ऐतिहासिक धरोहरों, हिन्दू परंपराओं और प्रतीकों के प्रति कांग्रेसी दुराग्रह ने इतिहास एवं ऐतिहासिक घटनाओं को धुंधलाया है। इस देश की उत्कृष्ट परंपराओं और विचारों को दकियानूसी और पिछड़ा करार दिया गया। योग, आयुर्वेद और संस्कृत भाषा के प्रति जो दुराग्रह रहा, उसका परिणाम हुआ कि ये विलुप्त होने के कगार पर आ गईं। आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों से हर वर्ष 21 जून को योग दिवस मनाया जाता है तो कतिपय राजनीतिक दल इस अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का मजाक उड़ाते हैं और इससे जुड़े कार्यक्रमों से दूर रहते है। ये ही दल इफ्तार की दवातें देने के लिए तत्पर रहते हैं, लेकिन हिन्दुओं के त्योहारों को मनाने में उतना ही पीछे रहते हैं। इन बड़ी भूलों को सुधारने, विसंगतियों एवं विडम्बनाओं को दूर करने के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासन में उल्लेखनीय काम हुआ है। भारतीय कीर्ति पताका को धुल-धूसरित करने के प्रयास बाहर से ही नहीं, भीतर से भी होते रहे हैं। ऐसी ही एक बड़ी भूल का सुधार है राजा महेंद्र प्रताप सिंह कोे सम्मान देना और उनके नाम पर राजा महेंद्र प्रताप सिंह राज्य विश्वविद्यालय का शिलान्यास होना।
एक सराहनीय उपक्रम के रूप में योगी सरकार इस विश्वविद्यालय को महान स्वतंत्रता सेनानी, लेखक, पत्रकार, शिक्षाविद् और सामाजिक सुधारक रहे मुरसान रियासत के राजा महेंद्र प्रताप सिंह के सम्मान में स्थापित कर रही है, जिसका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 सितंबर 2021 को अलीगढ़ में शिलान्यास किया। मुरसान को अब हाथरस के नाम से जाना जाता है। राजा महेंद्र प्रताप सिंह जाट थे। पश्चिमी यूपी के जाट समाज में उनके प्रति काफी आदर और सम्मान है। विश्वविद्यालय की स्थापना अलीगढ़ की कोल तहसील के गांव लोधा और गांव मूसेपुर करीम जरौली में 92 एकड़ से अधिक रकबे की जमीन पर होगी। अलीगढ़ प्रखंड के 395 कॉलेज इस विश्वविद्यालय से संबद्ध होंगे।
1 दिसंबर 1886 को जन्मे महेंद्र प्रताप सिंह ने 50 से ज्यादा देशों की यात्रा की थी। जबकि उनके पास भारतीय पासपोर्ट नहीं था। उन्होंने अफगान सरकार के सहयोग से 1 दिसंबर 1915 को पहली निर्वासित हिंद सरकार का गठन किया था। आजादी का बिगुल बजाते हुए वह 31 साल 8 महीने तक विदेश में रहे। हिंदुस्तान को आजाद कराने का यह देश के बाहर पहला अनूठा प्रयास था। उन्होंने स्विट्जरलैंड, जर्मनी, सोवियत संघ, जापान, चीन, अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की जैसे देशों की यात्रा की। 1946 में वे शर्तों के तहत हिंदुस्तान वापस आ सके। जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान उनकी विदेश नीति में जर्मनी और जापान मित्र देश नहीं रहे थे, जबकि राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने इन देशों से मदद मांगकर आजादी की लड़ाई शुरू की थी। ऐसे में राजा महेंद्र प्रताप सिंह को शुरू से ही कांग्रेस में बहुत ज्यादा तरजीह नहीं मिली, उनकी उपेक्षा हुई एवं उनके आजादी के आन्दोलन में दिये गये सहयोग को नजरअंदाज किया गया।
सन 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई थी। इससे पहले ही राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने विश्व शांति के लिए ‘संसार संघ’ की परिकल्पना की थी। उन्होंने प्रेम धर्म और संसार संघ की परिकल्पना के जरिये भारतीय संस्कृति के प्राण तत्व वसुधैव कुटुम्बकम् को साकार करने का प्रयास किया था। डॉ. अनूप शर्मा ने 23 वर्ष पहले ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राजा महेंद्र प्रताप की भूमिका’ विषय पर इतिहासकार डॉ. बिशन बहादुर सिंह के निर्देशन में शोध किया था। डॉ. अनूप शर्मा का कहना है, राजा महेंद्र प्रताप के साथ राजनीतिक दलों ने न्याय नहीं किया। उनको जो सम्मान मिलना चाहिए, वह नहीं मिला। राजा महेंद्र प्रताप अपने समय के बड़े क्रांतिकारी, महत्वाकांक्षा रहित राजनीतिज्ञ, महान त्यागी, महादानी, बेजोड़ शिक्षाविद एवं देशभक्त थे। महेन्द्र प्रताप अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं है, जिनकी उपेक्षा हुई हो।
शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान देने वाले राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने वृंदावन में अपनी जमीन पर प्रेम महाविद्यालय नाम से इंटर कॉलेज बनवाया था। यह महाविद्यालय स्वतंत्रता संग्राम का साक्षी रहा है। इसके सामने यमुना किनारे स्थित उनकी समाधि है, जो अब बदहाल स्थिति में है। यहां के लोगों ने उनके समाधि स्थल को विश्व घाट के रूप में विकसित करने की मांग उठाई है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को भी उन्होंने जमीन दी थी। देश एवं दुनिया में आज के लोग कुछ भी कहें लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत की बुनियाद मजबूत रही है। वह शिक्षा, संस्कृति, व्यापार, समृद्धि और साख पर निर्भर रही है। भले ही हम हजारों सालों के अंधेरों में कितने ही भ्रमित हुए हों लेकिन श्री नरेंद्र मोदी ने जताया है कि भारत होने का वास्तविक अर्थ क्या है और कौन सा मार्ग है जिस पर चलकर भारत दुनिया में पुनः प्रतिष्ठित हो सकता है। उन्होंने उसी मार्ग पर कदम बढ़ाया है। उन्होंने भारत की वही नींव खोजी और उसी पर नया भारत-सशक्त भारत निर्मित करने की शुरूआत की है।
अटल बिहारी वाजपेयी ने दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हुए कहा था ‘‘हमें पीछे नहीं देखना है, हम आगे बढ़ रहे हैं, बस पीछे की कमजोरियों को सुधारकर एक बेहतर भविष्य और भारत का निर्माण करना है।’’ लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों और गठबंधन की मजबूरियों के कारण कुछ प्राथमिकताएं पीछे हो गई, जो राष्ट्र के सम्मान, साख, समृद्धि और सुरक्षा के लिए जरूरी थीं। नए भारत का निर्माण उस अनुरूप न हो सका, जो भारत की नींव थी या जो भाजपा का संकल्प था, लेकिन शायद नियति ने परंपराओं और स्वगौरव के अनुरूप नए भारत के निर्माण के लिए यही समय निर्धारित किया था और इसके लिए शायद श्री नरेंद्र मोदी को ही निमित्त बनाया है।
नये भारत का निर्माण होते हुए देखकर मुझे राष्ट्रसंत महर्षि अरविंद की भविष्यवाणी भी स्मरण हो रही है जिसमें उन्होंने कहा था ‘‘भारत को अपने गौरव के अनुरूप मार्ग पर चलने में कम से कम सौ साल लगेंगे।’’ उन्होंने यह बात 1914 में कही थी- ‘‘भारत 2011 से करवट लेगा और 2016 से विश्वगुरु होने की राह पर चलेगा।’’ इससे मिलती जुलती बात शहीद रामप्रसाद बिस्मिल ने भी अपनी फांसी के दो दिन पहले अपनी बहिन को पत्र लिखकर कही थी ‘‘भारत में अभी क्रांति और स्वतंत्रता की मानसिकता नहीं बनीं। इसमें सौ साल लगेगे।’’ हालांकि इन दोनों ही भविष्यवाणियों में कहे गए सौ साल की अवधि में पूरा होने के बहुत पहले ही देश में आजादी आ गई। हमारे अपने लोग भी प्रधानमंत्री बने लेकिन देश की देशाभिमान, भारतीय संस्कृति एवं गौरव का जो परिचय श्री नरेंद्र मोदी ने दिया है वैसा आभास अब तक कोई प्रधानमंत्री न दे सका। अब जिस ढंग से श्री नरेंद्र मोदी ने भारत की संस्कृति, इतिहास गौरव की सुरक्षा से जो उपक्रम कर रहे हैं उससे लगने लगा है कि अतीत की भविष्यवाणियों के सार्थक होने का समय आ गया है।
भारत का गौरव पूरे संसार में होने एवं विश्वगुरु होने के कारणों में शिक्षा, योग, चिकित्सा (आयुर्वेद), ज्ञान विज्ञान और अनुसंधान और आर्थिक समृद्धि रहे हैं। गांव-गांव में ज्ञान, तक्षशिला, विक्रमशिला, बनारस, नालंदा जैसे विश्वविद्यालय और हस्तकौशल के आधार पर उद्योग थे। चाणक्य ने कभी कहा था कि ‘शासक भेदभाव से मुक्त प्रशासन तभी दे पायेगा तक उसके परिजनों का हस्तक्षेप नहीं होगा। इस बात को लागू करने के लिए श्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रियों से दो टूक शब्दों में कहा था कि वे अपने रिश्तेदारों को अपने विभाग और स्टाफ में महत्वपूर्ण स्थानों पर न रखे। उन्होंने अहंकारमुक्त शासन देने के लिये वीवीआईपी संस्कृति पर भी अंकुश लगाया। श्री नरेंद्र मोदी ने बनारस की प्रतिष्ठा लौटाने का संकल्प भी पूरा किया है। उन्होंने अयोध्या में श्री राम मन्दिर निर्माण का संकल्प भी पूरा किया। बनारस की प्रतिष्ठा उसके ज्ञान विज्ञान में तो श्रीराम मन्दिर का बनना जन-जन की आस्था से जुड़ा है। निःसंदेह बनारस की बौद्धिकता की वापसी एवं श्रीराम की आस्था का अर्थ है भारत का भारतत्व की राह पर लौटना। श्री नरेंद्र मोदी के बढ़ते कदम इन सभी प्राथमिकताओं को पूरा करने की दिशा में उठाए गए कदम हैं। उन्हीं में एक बड़ा कदम है राजा महेन्द्र प्रताप सिंह यूनिवर्सिटी का बनना, जो युवाओं को शिक्षा, देश की रक्षा उद्घोष की सार्थक निष्पत्ति होगा।

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