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अल्सर से कैसा डर!

हमारा पेट नाजुक टिश्यू से बना है। थोड़ी-सी गड़बड़ी सेहत से जुड़ी कई समस्याएं खड़ी कर देती है। पेट में दर्द, जलन व सूजन का एहसास, सीने में जलन व उल्टी की शिकायत- सुनने में भले ही अजीब लगे, पर ऐसा ही होता है, जब पेट में अल्सर की शिकायत होती है। खुद को इसका शिकार बनने से कैसे रोक सकते हैं, बता रही हैं शमीम खान

जीवनशैली और खान-पान में बदलाव का नतीजा है कि किशोर और युवाओं में पेट के अल्सर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। सामान्य भाषा में कहें तो पेट में छाले व घाव हो जाने को अल्सर कहा जाता है। सोने का नियत समय न होना, ऑफिस में बेहतर प्रदर्शन का तनाव, जंक फूड का बढ़ता चलन और अधिक डाइटिंग से शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। उस पर धूम्रपान, एल्कोहल और तंबाकू का सेवन पेट की परत को नुकसान पहुंचाने का कारण बन जाता है।

क्या है पेप्टिक अल्सर

पेट में घाव या छाले होने को चिकित्सकीय भाषा में पेप्टिक अल्सर कहते हैं। पेट में म्युकस की एक चिकनी परत होती है, जो पेट की भीतरी परत को  पेप्सिन और हाइड्रोक्लोरिक एसिड से बचाती है। इस एसिड की खासियत यह है कि जहां यह एसिड पाचन प्रक्रिया के लिए जरूरी होता है, वहीं शरीर के ऊतकों को नुकसान भी पहुंचाता है। इस एसिड और म्युकस परतों के बीच तालमेल होता है। इस संतुलन के बिगडऩे पर ही अल्सर होता है। आमतौर पर यह आहार नली, पेट और छोटी आंत के ऊपरी भाग की भीतरी झिल्ली में होता है।

 गैस्ट्रिक अल्सर: यह पेट के अंदर विकसित होता है। इसोफैगियल अल्सर: यह भोजन नली (इसोफैगस) में होता है, जो भोजन को गले से पेट में ले जाती है। यह अल्सर कम देखने में आता है।

ड्योडेनल अल्सर: यह छोटी आंत के ऊपरी भाग में होता है, जिसे ड्योडनम कहते हैं। इसके मामले अधिक सामने आते हैं।

मानसून में रखें खास एहतियात

पेप्टिक अल्सर का सबसे प्रमुख कारण एच. पायरोली बैक्टीरिया है, जिसका संक्रमण मल और गंदे पानी से फैलता है। बरसात के मौसम में गंदगी की समस्या दूसरे मौसमों के मुकाबले अधिक होती है। शारीरिक सक्रियता कम होने और रोग प्रतिरोधक तंत्र में होने वाले बदलाव भी इसके कारण बन सकते हैं।

अधिक तला-भुना, मसालेदार भोजन और चाय-कॉफी लेना पेट में एसिड के स्तर को प्रभावित करता है। इसके संक्रमण से बचने का सबसे आसान और सस्ता तरीका साफ-सफाई का खास ध्यान रखना है।

लक्षण

पेट में दर्द होना इसका प्रमुख लक्षण है। खाली पेट होने पर यह दर्द और तेज हो जाता है। पेट का एसिड अल्सरग्रस्त कोशिकाओं पर असर डालने लगता है। रात के समय पेट में जलन बढ़ जाती है। कुछ मामलों में खून की उल्टी होना, मल का रंग गहरा हो जाना, जी मिचलाना, भार में तेजी से कमी आना या भूख प्रक्रिया में बदलाव आने जैसे लक्षण भी देखने को मिलते हैं।

ये देते हैं अल्सर को बुलावा

– हेलिकोबैक्टर पायरोली बैक्टीरिया का संक्रमण।

– तनाव व डायबिटीज।

– आनुवंशिक कारण।

– अत्यधिक मात्रा में पेट में एसिड का स्राव।

– तैलीय और मसालेदार भोजन अधिक खाना।

– अधिक मात्रा में शराब, कैफीन और तंबाकू का सेवन।

– ऑस्टियोपोरोसिस के उपचार के लिये ली जाने वाली दवाएं। लंबे समय तक ज्यादा मात्रा में दर्द निवारक दवाओं, एस्प्रिन और ज्वलनरोधक दवाओं का सेवन करना।

समय रहते उपचार है जरूरी

पेप्टिक अल्सर के कारण एनीमिया, अत्यधिक रक्तस्राव और लंबे समय तक बने रहने पर स्टमक कैंसर की आशंका बढ़ जाती है। आंतरिक रक्तस्राव होने के कारण शरीर में खून की कमी हो जाती है। पेट या छोटी आंत की दीवार में छेद हो जाते हैं, जिससे आंतों में गंभीर संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। पेप्टिक अल्सर पेट के ऊतकों को भी क्षतिग्रस्त कर सकता है, जो पाचन मार्ग में भोजन के प्रवाह में बाधा पहुंचाता है। इस कारण  पेट जल्दी भर जाना, उल्टी होना और वजन कम होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

दवा से मिलता है आराम

पेप्टिक अल्सर का उपचार आसान है। कई मामलों में एंटीबायोटिक दवाएं, एंटा एसिड व दूसरी दवाओं से ही आराम आ जाता है। घरेलू उपचार भी इसमें काफी राहत पहुंचाते हैं।

यह न खाएं

– चाय, कॉफी और सोडा का सेवन न करें। इससे पेट में एसिड का उत्पादन बढ़ जाता है, जो अल्सर  को बढ़ाता है।

– अधिक तेल और मसालेदार भोजन न खाएं।

– ऐसे खाद्य पदार्थ, जिनमें साइट्रिक एसिड की मात्रा अधिक होती है, अल्सर के दौरान इनके सेवन से पेट के घावों को नुकसान पहुंचता है। नीबू, मौसंबी, संतरा, अंगूर, अनन्नास, फलों का जूस, जैम और जैली में सिट्रिक एसिड अधिक होता है।

– लाल मांस, मैदे से बनी चीजें, सफेद ब्रेड, चीनी, पास्ता और प्रोसेस्ड फूड भी कम से कम खाएं।

– खान-पान में साफ-सफाई का ध्यान रखना जरूरी है। खुले में रखे खाद्य पदार्थों को खाने से बचें। देर से कटा रखा हुआ सलाद न खाएं। खाने से पहले हाथ जरूर धोएं।

क्या कहते हैं आंकड़े

– जिन लोगों का ब्लड ग्रुप ए होता है, उनमें कैंसरयुक्त स्टमक अल्सर होने की आशंका अधिक होती है, हालांकि इसका कारण अभी स्पष्ट नहीं है।

– स्वीडन में हुए एक शोध के अनुसार जो लोग सप्ताह में तीन बार दही का सेवन करते हैं, उन लोगों में अल्सर होने की आशंका उन लोगों से कम होती है, जो इसका सेवन नहीं करते।

– विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पेप्टिक अल्सर के 50 प्रतिशत मामलों का कारण एच. पायलोरी बैक्टीरिया होता है।

– डेनमार्क में हुए एक अध्ययन के अनुसार जो लोग नियमित रूप से एक्सरसाइज करते हैं, उनमें पेप्टिक अल्सर होने की आशंका कम होती है।

– हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार जो लोग प्रतिदिन एक नाशपति का सेवन करते हैं, उनमें छोटी आंत का अल्सर होने की आशंका 31 प्रतिशत कम होती है।

(हमारे विशेषज्ञ डॉ. जी.एस. लाम्बा, मुख्य गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट, श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट। डॉ. सुमित मृग, प्राइमस हॉस्पिटल, सीनियर कंसल्टेंट एंड एच.ओ.डी. ई.एन.टी एंड कॉक्लेअर इम्लांट)

इन्हें खाने से मिलेगी राहत  

खान-पान का ध्यान रख कर ना केवल पेट में अल्सर बढऩे से रोका जा सकता है, बल्कि हमेशा के लिए इसका शिकार होने से भी बचा जा सकता है।

– केले में एंटी बैक्टीरियल तत्व प्रचुरता में होते हैं, जो पेट के अल्सर को बढऩे से रोकते हैं। नाश्ते के बाद केला खाएं।

– नाशपति में फ्लेवोनॉएड और एंटी-ऑक्सीडेंट काफी मात्रा में होते हैं, जो अल्सर के लक्षणों को कम करने में सहायता करते हैं। यह एच. पायलोरी के संक्रमण को भी रोकती है। इसमें फाइबर होते हैं, जो पाचन तंत्र को दुरुस्त रखते हैं। नियमित रूप से नाशपति का सेवन करने वालों में छोटी आंत का अल्सर होने की आशंका काफी कम हो जाती है।

– पत्ता गोभी में एस. मेथाइलमेथियोनिन होता है, जिसे ‘विटामिन यू’ भी कहा जाता है। अल्सर पेट के पीएच में असंतुलन के कारण होता है और विटामिन यू शरीर को एल्कलाइन करने में सहायता करता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसमें अमीनो एसिड ग्लुटामिन भी पाया जाता है, जो पाचन नली की म्युकोसल लाइनिंग को मजबूत करता है और पेट की ओर रक्त के प्रवाह को सुधारता है। यह ना केवल अल्सर को रोकता है, बल्कि घावों को भी तेजी से भरता है।

– नाश्ते के पहले एक चम्मच शहद जरूर खाएं। शहद बैक्टीरिया से लड़ता है, डिहाइड्रेशन से बचाता है और शरीर में नमी बनाए रखता है। यह ऊतकों को क्षतिग्रस्त होने से बचाता है और नए ऊतकों की विकास प्रक्रिया तेज करता है।

– फूलगोभी खाएं, इसमें सल्फोराफैन होता है। यह पाचन मार्ग के बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है।

– रोज अपने खाने के साथ एक-दो कलियां लहसुन की खाएं। इसमें एंटी-अल्सर गुण होते हैं।

– दही में ‘अच्छे बैक्टीरिया’ होते हैं, जो एच.पायलोरी के विकास को रोकते हैं। घावों को भरने में सहायता करते हैं।

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