*सुपर्णखाओं को अबला बनाने का यह कुत्सित प्रयास भारत की संस्कृति पर कुठाराघात*

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🙏बुरा मानो या भला 🙏

—मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”

आजकल मैं दिल्ली में हूँ, दिल्ली यानी भारतवर्ष की राजधानी। जिसमें प्रतिवर्ष विदेशों से लाखों-हजारों लोग भारत के दर्शन करने आते हैं। वह यहां भारत की प्राचीन संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों को देखने, समझने और सीखने के लिए उत्सुक रहते हैं। क्योंकि पूरे विश्व में भारतीय परम्पराओं, संस्कृति और नारी का सम्मान किया जाता है।
लज्जा भारतीय नारी का आभूषण है। भारतीय नारी ही भारतीय संस्कृति की वास्तविक परिचायक है। उसकी वेशभूषा, उसकी लज्जा और उसकी अपने धर्म के प्रति जागरूकता ही भारतीय नारी की पहचान है।
लेकिन दिल्ली में मानो यह सब अब गए वक़्त की बात हो गई हैं। सड़कों पर अपने पुरुष मित्र (ब्वॉयफ्रेंड) के हाथों में हाथ डालकर घूमती युवतियां/महिलाएं, जिनके वस्त्र इतने पारदर्शी हैं कि आप उनके अंतः वस्त्रों का रंग और और डिजाइन भी साफ-साफ देख सकते हैं। समझ नहीं आता कि जो वस्त्र उन्होंने पहने हुए हैं वह उनके अंगों को ढकने के लिए हैं अथवा अंगों का प्रदर्शन करने के लिए हैं। आधे-अधूरे कपड़ों में, कानों में इयरफोन लगाकर, मोबाइल पर अंग्रेजी भाषा में गिटर-पिटर करते हुए सड़कों पर बेपरवाह चलती हुई यह “भारतीय नारियां” किस प्रकार के “भारत का दर्शन” करा रही हैं, यह समझ से पूरी तरह बाहर ही है। दिल्ली आकर ऐसा लगता ही नहीं कि आप भारतवर्ष की राजधानी दिल्ली में हैं, बल्कि ऐसा महसूस होता है कि आप “इंडिया” की कैपिटल “देहली” में हैं।
सबसे अधिक बेशर्मी तो तब दिखाई जाती है जब कोई युवा जोड़ा सार्वजनिक स्थलों पर अपने “अंग प्रदर्शन” के साथ-साथ “प्रेम प्रदर्शन” भी करने लगता है और अश्लीलता, फूहड़ता और नग्नता की समस्त सीमाओं को लांघता हुआ अपने आपको “गौरवांवित” अनुभूत करता है। विडम्बना देखिये कि इस “सार्वजनिक प्रेम प्रदर्शन” का कोई विरोध नहीं करता क्योंकि यदि कोई करना भी चाहता है तो कथित महिला अधिकार मंच, वामी और कांगी, इसको नारियों की स्वतंत्रता का हनन सिद्ध करने लगते हैं।
“नारी स्वतंत्रता” के नाम पर “भारतीय नारी” को आज लज्जा, शालीनता और मर्यादा से मुक्त कर दिया गया है। आज की नारी को शालीन वस्त्रों से स्वतंत्र कर दिया गया है। एक समय था जब दुःशासन और दुर्योधन ने द्रौपदी का चीरहरण किया था। आज प्रतिदिन “मॉर्डन” और “बोल्डनेस” की आड़ में न जाने कितनी द्रौपदियों का चीरहरण हो रहा है। और उस पर तुर्रा यह है कि साहब “देखने वाले” की नीयत में खोट है। एक अर्धनग्न युवती अपने ब्वॉयफ्रेंड की कमर में हाथ डाले उससे लगभग चिपकी हुई सड़क पर चल रही है, उसकी कोई ग़लती नहीं है। पारदर्शी वस्त्रों को पहनकर “आमंत्रण मुद्रा” में चलने वाली युवती का कोई दोष नहीं है। दोपहिया वाहन पर अपने पुरुष मित्र के साथ “आलिंगनबद्ध” होकर चलने वाली “भारतीय नारी” में कोई दोष ढूंढना भी एक हिमाक़त ही है।
अगर कोई सज्जन पुरूष ऐसी फूहड़ता, अश्लीलता और नंगेपन पर आपत्ति व्यक्त करने का प्रयास करता भी है तो उसपर “पुरुष मानसिकता”, “तालिबानी मानसिकता” और “नारी विरोधी मानसिकता” जैसे अनेकों टैग लगाकर उसे कटघरे में खड़ा करने का हरसम्भव प्रयास किया जाता है।

यहाँ विडम्बना यह है कि सरकार द्वारा महिलाओं को असीमित अधिकार दे दिए गए हैं, जिनका सदुपयोग कम बल्कि दुरूपयोग अधिक होता है। अति अधुनिकता की अंधी दौड़ और अपने को आधुनिक और बोल्ड दिखाने की होड़ में हम यह भूल रहे हैं कि धीरे-धीरे हम और हमारी संस्कृति रसातल में नीचे और नीचे धँसती जा रही है।
दुःख की बात तो यह है कि आज का तथाकथित बुद्धजीवी वर्ग इस प्रकार के फूहड़पन, भौंडेपन और अश्लीलता को आधुनिकता का चोला पहनाकर सुरक्षित और संरक्षित करने का हरसम्भव प्रयास कर रहा है और उसमें वह निरन्तर सफलता भी प्राप्त कर रहा है।
परन्तु हम भूल रहे हैं कि जब नारी का नैतिक और चारित्रिक पतन होता है तो वह दो कुलों का नाश करती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सीता जैसी नारी पूजनीय है, परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि सुपर्णखा को भी आप पूजने लगेंगे।

लेकिन आज का बुद्धिजीवी सुपर्णखा को “अबला नारी” बनाकर उसको पूजनीय, और मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम और उनके अनुज श्री लक्ष्मण को “नारी विरोधी” बताने पर आमादा है। सुपर्णखाओं को अबला बनाने का यह कुत्सित प्रयास भारतीय संस्कृति, सभ्यता, संस्कारों और परम्पराओं पर कुठाराघात है। हमें समय रहते इसे समझना और सम्भलना होगा।

🖋️ मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

*विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

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