महर्षि दयानन्द ने देश व धर्म के लिए माता-पिता-बन्धु-गृह व अपने सभी सुखों का स्वेच्छा से त्याग किया

-विश्व इतिहास की अन्यतम् घटना-

भारत संसार में महापुरूषों को उत्पन्न करने वाली भूमि रहा है। यहां प्राचीन काल में ही अनेक ऋषि मुनि उत्पन्न हुए जिन्होंने वेदानुसार आदर्श जीवन व्यतीत किया। इन ऋषियों में से कुछ के नाम ही विदित हैं।  अनेक ऋषि मुनियों ने महान कार्यों को किया परन्तु उन्होंने न तो अपना आत्म वृतान्त ही लिखा और न ही अपनी कोई पहचान ही साहित्य आदि के माध्यम से देश में छोड़ी। समय व्यतीत होने के साथ कुछ ऋषियों ने कुछ ग्रन्थों का सृजन वा रचना की। उनके साहित्य में इतिहास में हुए कुछ प्रमुख ऋषियों के नामों का उल्लेख है। इसी प्रकार से इन ऋषियों के ग्रन्थों पर कुछ अन्य ऋषियों ने भाष्य आदि टीकायें लिख कर अपने समय के जन साधारण का कल्याण किया। इनमें भी कुछ ऐतिहासिक ऋषियों के नाम सुरक्षित हैं। महर्षि बाल्मिकी ने रामायण लिखकर स्वयं, श्री रामचन्द्र जी, रामायण काल के कुछ ऋषियों व राजाओं आदि के नाम व इतिहास सुरक्षित किए हैं। रामायण के बाद सबसे बड़ा व प्रमुख इतिहास ग्रन्थ हमारे पास महाभारत है। इसमें उस काल के अनेक राजाओं व विद्वानों का वर्णन है जिनमें से एक अति प्रतिष्ठित महापुरूष श्री कृष्ण हैं। महाभारत काल के बाद युधिष्ठिर के वंशज अनेक राजा महाराजा हुए। इन सबके विस्तृत नाम व वृतान्त आदि तो सुरक्षित नहीं हैं परन्तु महर्षि दयानन्द की कृपा से सत्यार्थ प्रकाश में एक सूची मिलती है जिसमें राजा युधिष्ठिर की वंश परम्परा में क्षेमक तक राजाओं व उनके राज्यकाल का विवरण वर्ष, महीनों व दिन तक की गणना किया हुआ मिलता है। यह कुल 30 पीढि़यों के 1770 वर्ष 11 मास व 10 दिनों का संक्षिप्त व संकेतित इतिहास व विवरण है। इसके बाद के राजाओं से लेकर सम्वत् 1249 विक्रमी तक राजा यशपाल के शासनकाल तक का विवरण सत्यार्थप्रकाश में अंकित सूची में है। इस प्रकार अब से लगभग 823 वर्ष पूर्व तक के राजाओं का विवरण महर्षि दयानन्द की कृपा से आज देश की जनता के लिए सुलभ हुआ है। जब भारत की ज्ञान विज्ञान से युक्त वेद कालीन प्राचीन धर्म व संस्कृति पर विचार करते हैं तो हमें अनेक धार्मिक ग्रन्थों के रचयिता ऋषि मुनियों सहित आदर्श राजा श्री राम, योगेश्वर श्री कृष्ण, राजनीति के आचार्य महात्मा चाणक्य, स्वामी शंकराचार्य और महर्षि दयानन्द जी का ज्ञान होता है जिन्होंने अपने अपने समयों में महान कार्य कर इस देश व विश्व के धर्म व संस्कृति के वातावरण को प्रभावित किया। आज के इस लेख में हम स्वामी दयानन्द सरस्वती जी पर कुछ विचार कर रहे हैं।

महर्षि दयानन्द ने सन् 1847 में अपनी आयु के  बाईसवें वर्ष में सच्चे शिव, मृत्यु पर विजय और सद्ज्ञान की प्राप्ति के लिए गृह त्याग किया था।  सन् 1860 में वह मथुरा में प्रज्ञाचक्षु गुरू विरजानन्द की कुटिया में पहुंचे और लगभग 3 वर्षों में उनसे आर्ष व्याकरण, वेद एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन पूरा कर सन् 1863 में गुरू की प्रेरणा व आज्ञा से देश व धर्म के सुधार के लिए कार्यक्षेत्र में प्रविष्ट हुंए। उन्होंने नवम्बर, 1869 में काशी नरेश की मध्यस्थता में काशी के लगभग 30 विद्वानों से मूर्तिपूजा पर इतिहास प्रसिद्ध शास्त्रार्थ किया था। इस शास्त्रार्थ में लगभग 50 हजार लोग उपस्थित थे। पौराणिक विद्वान मूर्तिपूजा को वेद विहित सिद्ध नहीं कर सके थे। तदन्तर उन्होंने धर्म व वेद प्रचार के निमित्त मौखिक उपदेश व वार्तालाप सहित शास्त्रार्थ आदि द्वारा प्रचार किया और अपने मन्तव्यों के प्रचारार्थ सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, गोकरूणानिधि, व्यवहारभानु आदि अनेक ग्रन्थ लिखे। यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि उन्होंने हिन्दी की महत्ता के कारण इतिहास में प्रथमवार धार्मिक विषयों को संस्कृत के स्थान पर हिन्दी भाषा में प्रस्तुत किया जिसका सुप्रभाव यह हुआ कि सामान्य व्यक्ति भी धर्म के मर्म को जानने में समर्थ हुआ और धर्म पर पण्डितों का एकाधिकार समाप्त हुआ। वैदिक धर्म के प्रचार व प्रसार के लिए उनके प्रमुख कार्यों में 10 अप्रैल, सन् 1875 को मुम्बई के काकड़वाड़ी स्थान पर प्रथम आर्य समाज की स्थापना सहित सत्यार्थ प्रकाश और वेद भाष्य का प्रणयन आदि कार्य प्रमुख थे।

स्वामी जी जहां जहां वेद प्रचार हेतु जाते थे, उनके प्रवचनों में सम्मिलित लोगों में से अनेक उनसे अपना जीवन वृतान्त सुनाने का निवेदन करते थे। उन्होंने अगस्त, 1875 में पूना में दिये गये अपने प्रवचनों में से एक प्रवचन में अपने जीवन का वृतान्त प्रस्तुत किया था। इसके बाद थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापक कर्नल अल्काट की प्रेरणा व निवेदन पर उन्होंने अप्रैल, 1879 में अपना संक्षिप्त जीवनवृत्त लिखा। इस जीवनवृत्त के आरम्भ में उन्होंने लिखा है कि गृह त्याग के प्रथम दिन से ही जो मैंने लोगों को अपने पिता का नाम और अपने कुल का स्थान बताना अस्वीकार किया इसका यही कारण है कि मेरा कत्र्तव्य मुझे इस बात की आज्ञा नहीं देता। यदि मेरा कोई सम्बन्धी मेरे इस वृत्त से परिचय पा लेता तो वह अवश्य मेरे ढूंढने का प्रयत्न करता। इस प्रकार उनसे दो-चार होने पर मेरा उन के साथ घर जाना आवश्यक हो जाता। सुतरा एक बार पुनः मुझे धन हाथ में लेना पड़ता अर्थात् मैं गृहस्थ हो जाता। उनकी सेवा-शुश्रूषा भी मुझे करनी योग्य होती। और इस प्रकार उनके मोह में पड़कर सर्व सुधारों का वह उत्तम काम जिसके लिये मैंने अपना जीवन अर्पण किया है, तथा जो मेरा यथार्थ उद्देश्य है, जिसके अर्थ स्वजीवन-बलिदान करने की किंचित् चिन्ता नहीं की, और अपनी आयु (जीवन) को बिना मूल्य जाना, और जिसके अर्थ मैंने अपना (अपने जीवन का) सब कुछ स्वाहा करना अपना मन्तव्य समझा, अर्थात् देश का सुधार और धर्म का प्रचार, वह (मेरा) देश पूर्ववत् अन्धकार में पड़ा रह जाता। यहां महर्षि दयानन्द ने प्रसंगवश अपनी मृत्यु से साढ़े चार वर्ष पहले अपने जीवन का उद्देश्य बताने के साथ अपने मन की कुछ निजी बातें भी प्रकट की हैं जो कि अत्यन्त महत्वपूर्ण है और वही हमारे लेख का मुख्य विषय हैं।

उपर्युक्त पंक्तियों में महर्षि दयानन्द कह रहे हैं उन्होंने सर्व सुधारों के उत्तम काम के लिए ही अपना जीवन अर्पण किया है और यही उनका उद्देश्य है। आगे स्पष्ट कर सर्व सुधार से तात्पर्य उन्होंने देश का सुधार और धर्मं का प्रचार बताया है। महर्षि दयानन्द के इस वाक्य से ज्ञात होता था कि उनके समय में देश में अनेक क्षेत्रों में अन्धविश्वास, रूढि़वाद एवं पाखण्ड आदि अनेक विकृतियां विद्यमान थीं जिनसे देश कमजोर व अवनत हो गया था। इनका सुधार कर वह देश को सशक्त बनाना चाहते थे। देश का एक उत्कृष्ट वेदविद्यावान ब्रह्मचारी, अनेक शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमताओं से युक्त ऋषि तुल्य व्यक्ति देश के सुधार के लिए बिना किसी निजी प्रयोजन अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करता है, यह इतिहास की अपने प्रकार की अपूर्व घटना है। यहां हमें श्री रामचन्द्र जी की स्मृति हो आई। उन्होंने अपने पिता के वचनों की रक्षा के लिए वन जाना स्वीकार किया था। वहां प्रयोजन पिता के वचन थे। उनका विवाह हो चुका था और वनवास की अवधि में भी उनके अपने परिवार से सम्बन्ध बने रहे थे। श्री कृष्ण जी ने महाभारत के युद्ध में प्रमुख भूमिका निभाई। इसका कारण उनके पाण्डवों से संबंध थे। वह वैदिक विद्वान, योगी और राजनीतिज्ञ थे और सत्य व धर्म की रक्षा के लिए एक राजा होकर वह इस युद्ध में प्रवृत्त हुए थे। श्री कृष्ण जी ने विवाह भी किया और प्रद्युम्न के रूप में एक संस्कारित योग्य सन्तान को भी प्राप्त किया था। लेकिन स्वामी दयानन्द देश व धर्म के लिए अपने माता-पिता, धन, सम्बन्धों, विवाह, सन्तान, शारीरिक सुख व अपने जीवन आदि सभी कुछ को ईश्वर, देश व धर्म के लिए त्याग कर रहे हैं। अपने महानतम उद्देश्य की पूर्ति के प्रति वह श्री रामचन्द्र जी व श्री कृष्ण जी के समान ही योग्य, सक्षम व समर्थ थे। इस कार्य को उन्होंने प्राणपण से किया। इसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिली और अपने उद्देश्य के लिए ही उन्होंने मात्र 58 वर्ष 8 महीने के अल्प जीवन में ही अपना बलिदान किया। उन्होंने जो कार्य किया वह इतिहास में अभूतपूर्व है। स्वामी दयानन्द के कार्यों व बलिदान का महत्व इस कारण भी है कि भारतवासी धर्म के यथार्थ व सत्य स्वरूप को भूल चुके थे। ईश्वर के स्वरूप व उपासना का ज्ञान भी भारतवासियों को नहीं था। यज्ञ का स्वरूप विकृत कर दिया गया था और सत्य स्वरूप का किसी को ज्ञान ही नहीं था। इसी कारण बौद्धमत अस्तित्व में आया और सनातन वैदिक धर्म का पराभव हुआ। देश में बाल विवाह होते थे जिससे विवाहित बालक-बालिकाओं की मृत्यु दर वृद्धि को प्राप्त हो रही थी। निस्तेज व अल्पजीवी सन्तानें उत्पन्न होती थीं। विधवाओं की दुर्दशा हो रही थी। स्त्रियों व दलितों के अध्ययन के अधिकारों तक को छीन लिया गया था। वेदों के यथार्थ विद्वान होना बन्द हो गये थे। सभी मनुष्यों का धर्म एक है। इस एक धर्म की अनेकानेक अन्धविश्वासों से युक्त शाखायें एवं प्रशाखायें उत्पन्न हो गईं थीं जो भोले-भाले लोगों का शोषण करती थीं। ब्राह्मण वर्ण व वर्ग को सभी प्रकार के अधिकार थे, अन्याय करने पर भी दण्ड का कोई विधान नहीं था और अन्यों पर अन्याय व शोषण किया जाता था। देश को कृत्रिम जन्मना-जाति व उपजातियायें में बांट दिया गया था जिससे देश कमजोर हुआ व हो रहा है। इन सब सामाजिक दोषों को दूर करने के साथ स्वामी दयानन्द ने वेदों का सत्य स्वरूप प्रकाशित किया, स्त्रियों व शूद्रों को वेदाध्ययन का अधिकार दिया, सभी सामाजिक विषमतायें एवं अन्याय दूर किये और ईश्वर का सच्चा स्वरूप प्रस्तुत कर उसकी सच्ची उपासना और यज्ञों का उद्धार किया। देश व विश्व का इतना उपकार करने पर भी देश के लोगों ने उनके उपकार बदला उन का अपमान, विरोध, अनेक बार उन्हें विष देकर तथा उनके प्राण लेकर दिया। हमें समझ में नहीं आता कि हम अपनी जाति को क्या कहें जो अपने ही त्राता के प्राणों का घात करती है। यहां यह उक्ति चरितार्थ होती है ‘तू खाक उसे करना चाहे जो तेरा बेड़ा पार करे।’ अतः स्वामी दयानन्द ने सर्वसुधारों के लिए अपने प्राण देकर अपने वचनों को सत्य सिद्ध किया जिसका उल्लेख उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया था। हम अनुभव करते हैं कि उनके उपकारों से देश कभी उऋ़ण नहीं हो सकता।

अपने वचनों में स्वामी दयानन्द जी ने यह भी कहा है कि सुर्वसुधारों के अर्थ उन्होंने स्वजीवन-बलिदान करने का किंचित् विचार व चिन्ता नहीं की, और अपनी आयु (जीवन) को बिना मूल्य जाना, और जिसके अर्थ उन्होंने अपना सब कुछ स्वाहा करना अपना मन्तव्य समझा, अर्थात् देश का सुधार और धर्म का प्रचार, अन्यथा देश पूर्ववत् अन्धकार में पड़ा रह जाता। महर्षि के यह वाक्य भी उनके जीवन एवं कार्यों पर दृष्टि डालने पर सत्य सिद्ध होते हैं। महर्षि दयानन्द के अनुयायियों को यह देखकर दुःख होता है कि यह देश सत्य को जानने के प्रति सजग न होकर उदासीन है। सत्य का ग्रहण तो देशवासी तभी कर सकते हैं जबकि इन्हें सत्य गुरूओं का सान्निध्य व मार्गदर्शन प्राप्त हो। इसके लिए तो वैदिक साहित्य के अध्ययन की आवश्यकता है। अनार्ष ग्रन्थों को पढ़कर इन मत-पन्थ-सम्प्रदाय वादियों की बुद्धि भी इन मतों के अनुकुल हो गई है। मत-मतान्तरों के असत्य विचारों को पढ़ने व सुनने पर भी उनके मन में शंकायें  उत्पन्न नहीं होती? सत्य ज्ञान वेद के विरूद्ध सभी मत-मतान्तर अनेक असत्य व मिथ्या बातों का प्रचार करते हैं और उनके अनुयायी आंखें बन्द कर उन्हें स्वीकार कर लेते हैं जिससे ईश्वर व धर्म के विषय में सर्वत्र अन्धकार छाया हुआ है। अतः हमें महर्षि दयानन्द का तप व पुरूषार्थ पूर्ण सार्थक हुआ प्रतीत नहीं होता। आज भी चालाक व स्वार्थी लोग भोले भाले धर्मभीरू लोगों का शोषण करते हैं। उनमें से कुछ के अनैतिक कार्य भी समाज के सामने आते रहते हैं परन्तु देश की जनता फिर भी उदासीन रहती है। लोगों की इस मनोवृत्ति और अकर्मण्यता ने भविष्य में सत्य वैदिक धर्म की उन्नति पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। महर्षि दयानन्द के तप व पुरूषार्थ की पूर्ण सफलता न होने से देश के लिए भविष्य में विडम्बना सिद्ध हो सकती है जैसे कि पहले भी बनी है। अतः वेदों के प्रचार प्रसार की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है। हम महर्षि दयानन्द के उन वाक्यों जिसमें उन्होंने अपनी भावनाओं को प्रकट किया और वैसा कर धर्म व देशोन्नति के लिए बलिदान हुए, नमन करते हैं। आज की परिस्थितियों में धर्म व देश सुधार के लिए हमें सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन और उसके अनुरुप सत्य मान्यताओं का प्रचार ही अभीष्ट लगता है। हम आशा करते हैं कि देश के प्रबुद्ध जन महर्षि दयानन्द के वैदिक साहित्य का निष्पक्ष रूप से अध्ययन कर धर्म व संस्कृति की रक्षा तथा देशोन्नति के लिए अपने कर्तव्य का निर्धारण कर उसका पालन करेंगे।

आज की परिस्थितियों में प्रासंगिक वैदिक विद्वान पं. राजवीर शास्त्री जी की जुलाई, 1998 में लिखी पंक्तियां प्रस्तुत हैं। वह लिखते हैं कि स्वाध्यायशील पाठकों और वेदभक्त आर्यपुरुषों के समक्ष दयानन्द-सन्देश मासिक पत्र का श्रावणी पर्व पर वेद-विशेषांक प्रस्तुत करते हुए जहां हमें अतीव प्रसन्नता हो रही है वहीं हमें वेद के प्रति अनास्था रखने वालों के प्रति सजगता एवं सतर्क रहने के लिए प्रोत्साहन भी मिल रहा है। उन्नीसवीं शताब्दी में हमारे अन्दर वेद-ज्योति ने सन्मार्ग दर्शन होने से हमें सचेत किया था, आज वही ज्योति जिसने समस्त मतमतान्तर-वादियों के भीषण दुर्गों को ध्वस्त करके सत्य को ग्रहण करने के लिए उद्यत किया था, उन्हीं वेदानुयायियों को शिथिल, उपेक्षित, उत्साहहीन देखकर अत्यन्त दुःख भी होता है। इसका कारण स्वाध्यायहीनता व श्रद्धाहीनता भी है किन्तु अर्थ और काम की आसक्ति प्रमुख है। आज का मानव भौतिक चकाचौंध में इतना अधिक व्यस्त हो गया है कि जो आर्यजनता एक सजग-प्रहरी बनकर काम कर रही थी, वह भी उदासीन हो गयी है। महर्षि मनु ने सृष्टि के आरम्भ में ही आर्य जाति को सचेत करते हुए लिखा था-‘अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते। धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः।।’ अर्थात् धर्म का ज्ञान उन व्यक्तियों को नहीं होता, जो अर्थ और काम अथवा कांचन कामिनी में आसक्त हैं और धर्म की जिज्ञासा रखने वालों को वेद ही परम प्रमाण है। महर्षि दयानन्द ने धर्म की जिज्ञासा को शान्त करने वाले परम प्रमाण वेदों को ही अपने प्रचार का मुख्य साधन बनाया था। आज भी वेद पूर्णरुपेण प्रासंगिक एवं व्यवहारिक है। वेदविहित व वेदानुकुल ही धर्म और वेद विरुद्ध सब कुछ अधर्म व पाप है।

लेख को विराम देते हुए आर्य महाकवि श्री वीरेन्द्र कुमार राजपूत की महर्षि दयानन्द पर कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैंः

जिसने गुरुदेव चरित्र पढ़ा,  निज मानस  जन्म सुधार लिया।

वह लौह सुवर्ण बना जिसने,   इस पारस को पहचान लिया।

पथ-भ्रष्ट अमीचन्द था, जिसका ऋषि ने  हाथ संभाल लिया,

गुरु ने जग से चलते-चलते जग को गुरुदत्त प्रदान किया।।

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