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गुजरात में भाजपा का नया चेहरा नया दांव

प्रस्तुति : श्रीनिवास आर्य (एडवोकेट)

शनिवार, 11 सितम्बर को जब पूरी दुनिया अमेरिका और तालिबान के रिश्तों की उलझन और वैश्विक राजनीति पर उसके असर की समीक्षा में लगी थी, तब भारत की राजनीति में एक अलग किस्म की हलचल मच गयी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के गृह राज्य गुजरात में भाजपा सरकार का नेतृत्व कर रहे मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने अचानक अपने इस्तीफे की घोषणा की।

गुजरात में अगले साल के अंत में चुनाव होने हैं, यानी अभी कम से कम साल भर का वक्त विजय रूपाणी के पास था। फिर भी उन्होंने भाजपा के एक वफादार सिपाही की तरह यह कहते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी कि भाजपा के भीतर कार्यकर्ताओं की ज़िम्मेदारियां बदलती रहती हैं। गौरतलब है कि 2014 में जब नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर प्रधानमंत्री का पद संभाला था, तो उनकी जगह आनंदी बेन पटेल को मुख्ममंत्री बनाया गया था। लेकिन 2016 में विजय रूपाणी यह जिम्मेदारी दी गई। 2017 के चुनाव के बाद भी मुख्यमंत्री पद उनके पास ही रहा, लेकिन 2022 के चुनाव के पहले भाजपा ने यह बड़ा फेरबदल किया है।

भाजपा इस वक्त जिस तरह की राजनीति कर रही है, उसमें यह फैसला चौंकाता नहीं है। हाल ही में उत्तराखंड में इसी तरह त्रिवेन्द्र सिंह रावत से मुख्यमंत्री की कुर्सी लेकर तीरथ सिंह रावत को सौंपी गयी थी और उसके बाद पुष्कर धामी को। उत्तराखंड की राज्यपाल को भी बदल दिया गया। असम में जीत के बावजूद सर्वानंद सोनोवाल को दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बनाया। कर्नाटक में आपरेशन लोटस सफल रहने के बावजूद बी.एस.येदियुरप्पा से मुख्यमंत्री पद ले लिया गया। विजय रूपाणी को पदच्युत करने का फैसला भी ऐसा ही है। अब उनकी जगह भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाया गया है। यह निर्णय भी भाजपा के तौर-तरीकों के अनुरूप ही है। किसी कमज्ञात चेहरे को अचानक कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने का भाजपाई तरीका लोगों का जाना-पहचाना है। मनोहरलाल खट्टर हों या बिप्लव देव या फिर भूपेंद्र पटेल, इनका कम चर्चित होना ही इन्हें शायद कुर्सी का हकदार बना गया।

अब सवाल ये है कि भाजपा को अचानक इस तरह मुख्यमंत्रियों को बदलने की जरूरत क्यों पड़ी। तो इसका पहला कारण यही दिखता है कि भाजपा किसी कीमत पर हाथ आई सत्ता को गंवाना नहीं चाहती है। उत्तराखंड में जिस तरह त्रिवेन्द्र सिंह रावत के खिलाफ आवाज उठने लगी थी और कुंभ के आयोजन के बाद तीरथ सिंह रावत की कुप्रबंधन को लेकर जो आलोचना हुई, उस वजह से भाजपा उत्तराखंड चुनाव में कोई जोखिम नहीं लेना चाहती थी। सत्ता खोने का यही डर गुजरात में भी भाजपा को है। विजय रूपाणी सरकार ने कोरोना काल में हालात संभालने में जो लाचारगी दिखाई, उससे जनता की नाराजगी स्वाभाविक थी। हाल ही में संपन्न हुए सूरत नगरीय निकाय चुनावों में आम आदमी पार्टी ने 27 सीटें हासिल की थीं, जबकि गुजरात में आप का कोई खास जनाधार नहीं है, इससे भाजपा चिंता में पड़ गई थी। लेकिन जनाक्रोश के साथ-साथ जातिगत समीकरण श्री रूपाणी की विदाई का दूसरा कारण बना। रूपाणी जैन सुमदाय से आते हैं जिसकी आबादी राज्य में सि$र्फ दो प्रतिशत है, वहीं बड़ा राजनीतिक आधार रखने वाला पाटीदार समुदाय में भाजपा के प्रति नाराज़गी है। इसलिए भी विजय रूपाणी को बदला गया।

विजय रूपाणी के सत्ता से हटने का तीसरा कारण खुद नरेन्द्र मोदी हो सकते हैं। गुजरात मोदीजी का गढ़ रहा है। 2001 में केशुभाई पटेल के बाद जब मोदीजी के हाथ में गुजरात की कमान आई तो राष्ट्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी नाम अल्पज्ञात ही था। लेकिन जल्द ही उन्होंने गुजरात मॉडल और विकास की एक ऐसी अवधारणा खड़ी की, जो उनकी सत्ता को सुरक्षित रखने के लिए अभेद्य कवच जैसी साबित हुई।

गुजरात में उनके कार्यकाल में भाजपा की पकड़ मजबूत होती गई और विदेश तक भाजपा समर्थकों का दायरा बढ़ा। उद्योगपतियों को भाजपा के समर्थन में खड़ा करने में मोदीजी ने खास भूमिका निभाई और दिल्ली तक का सफर सफलतापूर्वक तय किया। दिल्ली में भी एक के बाद दूसरा कार्यकाल भाजपा को मिला। लेकिन इस दौरान गुजरात में भाजपा की सरकार होते हुए भी राजनैतिक अस्थिरता बनी रही, क्योंकि मुख्यमंत्री बदलते गए। एक के बाद एक तीन मुख्यमंत्रियों को बदलकर शायद मोदीजी यह संदेश देना चाहते हैं कि वे भले दिल्ली बैठे हों, लेकिन उनके नाम का ही सिक्का गुजरात में भी चलेगा। अब ये देखना दिलचस्प होगा कि भूपेन्द्र पटेल इस सिक्के को किस तरह चलाते हैं।

वैसे राजनीतिशास्त्र के अध्येताओं और बाकी राजनैतिक दलों के लिए भाजपा का यह कौन बनेगा मुख्यमंत्री वाला खेल इस विश्लेषण के लिए काफी रोचक है कि आखिर भाजपा में बिना हूं-चूं किए मुख्यमंत्री बदल कैसे जाते हैं। दरअसल भाजपा एक मजबूत कैडर वाला दल है, जहां सिपाही सेनापति के हुक्म पर ही कदम आगे बढ़ाते हैं सिर कटाने के लिए प्रस्तुत हो जाते हैं। जबकि कांग्रेस जैसे दलों में आंतरिक लोकतंत्र न होने की शिकायत करते रहने के बावजूद नेता इस कदर अंदरूनी कलह मचाते हैं कि सत्ता जाने की आशंका होने लगती है। बहरहाल गुजरात में मुख्यमंत्री बदलने के दांव से आगामी चुनाव में कितना फायदा भाजपा को मिलता है और क्या भाजपा गुजरात में समयपूर्व चुनाव की घोषणा करती है, ये जल्द पता चल जाएगा।

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