भारतीय स्वाधीनता का अमर नायक राजा दाहिर सेन, अध्याय – 9 (क) गद्दारी और राजकुमार जयशाह का आपद्धर्म

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गद्दारी और राजकुमार जयशाह का आपद्धर्म

राजधानी में शत्रु के हमले के प्रति पूर्णतया सावधान होकर बैठे राजा दाहिर सेन अपने वीर सैनिकों के भरोसे शत्रु का सामना करने की तैयारियों में व्यस्त थे। उनके दिशा निर्देशों के अनुसार दोनों राजकुमारियां और राजपरिवार के अन्य सदस्य जनता के बीच जाकर जिस प्रकार देशभक्ति का परिवेश बनाने में लगे हुए थे, उसके अच्छे परिणाम आ रहे थे। यद्यपि इसी समय कुछ छुपे हुए ‘गद्दार’ भी अपना खेल खेल रहे थे, जिनके प्रति राजा को कोई सूचना नहीं थी। इन दोनों के प्रति हमने पूर्व के अध्याय में प्रकाश डाला है।
जब राजा को यह सूचना प्राप्त हुई कि अरब आक्रमणकारियों की सेना देवल के निकट पहुँच चुकी है तो उन्होंने अपनी सेना को भी रणस्थली के लिए प्रस्थान करने का आदेश दिया। राजा को अपने भुजबल और सैन्यबल पर तो भरोसा था ही, साथ ही अपने राज्य के सभी अधिकारियों, सेनापतियों, प्रान्तपतियों, सूबेदारों और जनसामान्य पर भी पूर्ण भरोसा था कि वे सब इस शत्रु के विरुद्ध उनकी सहायता करेंगे और जैसी स्थिति शत्रु की पूर्व के आक्रमण में हुई थी उससे भी बुरी स्थिति शत्रु को इस बार देखनी पड़ेगी। राजा को किसी ‘ज्ञानबुद्ध’ जैसे नीच अधर्मी और देशद्रोही के द्वारा इस समय गद्दारी करने की तनिक भी जानकारी नहीं थी।

सेना ने किया युद्ध भूमि के लिए प्रस्थान

राजा का निर्देश पाकर देशभक्ति, शौर्य व साहस के भावों से भरी सेना युद्धभूमि के लिए प्रस्थान कर देती है। हमारी सेना का प्रत्येक सिपाही पूरे आत्मविश्वास के साथ शत्रु की ओर बढ़ता जा रहा था। उन्हें अपने भुजबल पर पूर्ण विश्वास था कि शत्रु को इस बार भी वह पराजित ही करेंगे। उन्हें माँ भारती के सम्मान के प्रति अपने कर्तव्य पूर्णतया याद थे। कहा जाता है कि जब मानवता के हित में कोई अच्छा कार्य किया जाता है अर्थात ऐसा कार्य जिससे मानवता का भला होता हो ,अपने देश, धर्म व संस्कृति की रक्षा होती हो और मानवता के शत्रु दल का विनाश होता हो ,तब एक ऐसी ऊर्जा भीतर से मिलती अनुभव होती है जिसका कोई अन्त नहीं होता। उस अन्तहीन ऊर्जा पर सवार होकर या उससे ऊर्जान्वित होकर जब कोई व्यक्ति या सैनिक रणस्थली की ओर बढ़ता है तो उसका उत्साह देखते ही बनता है। हमारे वीर सैनिकों के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा था । जिसके वशीभूत होकर वह यह प्रतिज्ञा करके घर से निकले थे कि युद्धभूमि से या तो विजयी होकर लौटेंगे या फिर बलिदान देकर अपना नाम बलिदानियों में सम्मिलित करा देंगे।

“संकल्प एक धार कर
चले वीर अभियान पर,
त्याग देंगे होम कर
सर्वस्व निज देश पर।।

नहीं रोक सकता कोई हमको ,
ना झुका सकता कोई हमको ।
चाहे शत्रु कितना बलवान हो,
हम मिटा देंगे उसके दम को।।”

सैनिकों के हाव भाव और चेहरे की भाव भंगिमा इस समय पूर्णतया वीर रस के भावों से भरी हुई थी। उनका आत्मविश्वास कहीं से भी हल्का या डिगा हुआ नहीं था। उनके चेहरे का तेज अपनी अलग ही छटा बिखेर रहा था तो उनकी बाजुएं जिस प्रकार देशभक्ति के नारों पर फड़कती थीं उन्हें देखकर ऐसा लगता था कि वह आज शत्रु को कहीं से भी खोजकर लाने में संकोच नहीं करेंगे। उनके साथ जो बाजा बजता चल रहा था उससे निकलने वाली वीर रस की धुन वातावरण को और भी अधिक देशभक्ति पूर्ण बना रही थी। हमारे सैनिकों के उत्साह और देशभक्ति के भाव को देखकर लग रहा था कि जैसे आज देवगण भी स्वर्ग से पुष्प वर्षा कर रहे हैं। क्योंकि जीवन्मुक्त देवगण यह देखकर अत्यंत हर्षित और प्रसन्नचित्त हो रहे होंगे कि भारत के वीर सैनिकों का यह दल आज उन आतंकवादियों का विनाश करने जा रहा है जो देव संस्कृति अर्थात वैदिक संस्कृति का विनाश कर देना चाहते हैं।

लोगों का उत्साह देखते ही बनता था

चारों ओर राजा दाहिर सेन और राजकुमार जयशाह के नारों का उद्घोष हो रहा था। जिनसे पता चलता था कि सारा सिंध प्रान्त अपने राजा दाहिर सेन की वीरता और देशभक्ति को हृदय से प्रणाम कर रहा है और अपने राजा के सम्मान को अपना सम्मान समझता है। उन लोगों के भाव स्पष्ट बता रहे थे कि शत्रु विनाश और अपने राजा की विजय ही उनका एकमात्र लक्ष्य था। जिसके लिए वह अपना सर्वस्व होम करने तक के लिए तैयार थे। तभी तो हमारे यह सभी वीर सैनिक अपने राजा के संकेत को ही अपने लिए आज्ञा समझकर युद्ध क्षेत्र की ओर बढ़ रहे थे।
-उनके कदमों में जोश था,
– चेहरे पर ओज था,
– माथे पर तेज था,
-आंखों में शेर की सी घूर थी,
-भुजाओं में फड़कन थी और
– ह्रदय में आत्मविश्वास था।
आज के युद्ध का नेतृत्व भी राजकुमार जयशाह के हाथों में था । राजकुमार अपनी वीरता का लोहा पहले युद्ध में मनवा चुके थे। इसलिए उनके नेतृत्व पर सिन्ध की सेना को पूर्ण भरोसा था कि वह आज भी एक नया इतिहास रचाएंगे और शत्रु को उसके किए का दण्ड अवश्य देंगे।
राजकुमार जयशाह भी शत्रु को उसके किए का दण्ड देने के दृष्टिकोण से बड़ी वीरता के साथ आगे बढ़ते जा रहे थे । उन्हें शत्रु का दोबारा भारत पर आक्रमण करने का दुस्साहस कतई सहन नहीं था। वह चाहते थे कि इस बार शत्रु को न केवल उसके किए का दण्ड भुगतना पड़े अपितु उसे इतनी कठोर सजा दी जाए कि वह दोबारा माँ भारती की ओर आंख उठाकर देखने का साहस भी ना कर सके।
राजकुमार क्रोध मिश्रित आत्मविश्वास को लिए आगे बढ़ रहे थे। इसके साथ ही साथ प्रतिशोध की ज्वाला भी उनके हृदय में धधक रही थी। शत्रु के बार-बार सीमा पर आने के दुस्साहस को वह इस बार मसल देना चाहते थे उनकी मचलन स्पष्ट बता रही थी कि वह अपने शत्रु पर शेर की भांति झपट्टा मारने की सोच रखते थे।

राजकुमार को अपनी विजय पर पूर्ण विश्वास था

राजकुमार का आत्मविश्वास भी पूर्णतया यह कहानी बयान कर रहा था कि वह विजयी होकर ही लौटेंगे।
माँ भारती के उस वीर पुत्र को तनिक भी यह आभास नहीं था कि इस बार शत्रु के साथ उनके गद्दार मिल चुके हैं। जो माँ भारती के सम्मान का सौदा कर चुके हैं और यदि इस युद्ध में सिंध के राजा दाहिर सेन और उनकी सेना की पराजय होती है तो इसके लिए भी गद्दार शत्रु के साथ मिल चुका है । योजना इस प्रकार बन चुकी है कि चाहे जो हो जाए पर इस बार शत्रु और गद्दार का ‘मनोवांछित उद्देश्य’ पूर्ण होना चाहिए। राजकुमार अपने सैन्य अधिकारियों के साथ कई बार जोशीली वार्ता में भी व्यस्त हो जाते और युद्ध क्षेत्र में शत्रु को अपनी व्यूह रचना में घेरने के बारे में भी विचार विनिमय करने लगते । सैन्य अधिकारी भी पूरी गर्वीली भाषा में अपने सेनापति और राजकुमार का साथ देते और उन्हें इस बात के लिए आश्वस्त करते कि हम पूर्णतया शत्रु को घेरने में सक्षम हैं और इस बार उसकी स्थिति वैसी ही कर देंगे जैसी राजकुमार और राजा चाहते हैं।

उद्घोष बढ़ाते जोश को जोशीले थे वीर।
जोश शोभता वीर में ज्यों नदिया में नीर।।

जब राजा दाहिर सेन की सेना के वीर सिपाही ‘सिन्धु देश की जय’, ‘महाराज दाहिर सेन की जय’, ‘राजकुमार जयशाह की जय’ के नारे लगाते तो वातावरण और भी अधिक देशभक्ति पूर्ण बन जाता। इस पर राजकुमार जयशाह को भी बहुत अधिक गर्व और गौरव की अनुभूति होती । वह शत्रु को कड़ा पाठ पढ़ाने के लिए और भी अधिक उतावले हो उठते थे।
राजकुमार चाहते थे कि जितना शीघ्र हो उतनी शीघ्रता से शत्रु का अन्त कर दिया जाए।
राजा दाहिर सेन का वीर दल अब युद्ध भूमि के निकट पहुँच चुका था। युद्ध भूमि में प्रवेश करते ही उन्होंने एक बार फिर जोरदार ढंग से ‘सिंधु देश की जय’ , ‘राजा दाहिर सेन की जय’, ‘राजकुमार जयशाह की जय’ – के नारे लगाए।

मच गया शत्रु दल में हड़कंप

भारतीय सैन्य दल की वीरता के उद्घोष को सुनकर शत्रु दल में हड़कंप मच गया। शत्रु दल के जिन सैनिकों ने भारतीय वीरों के ऊंचे स्वर में लगने वाले ऐसे ओजपूर्ण नारों को आज से पहले नहीं सुना था उनका तो कलेजा निकलने को हो गया। इसके साथ ही जिन अरब सैनिकों ने अबसे पूर्व भी भारतीय वीर पुत्रों के उद्घोष को सुना था, उन्हें भी पुराने दिनों के बीते पलों की यादों ने घेर लिया । कलेजा उनका भी बाहर को निकलने को था। क्योंकि उन्हें पता था कि इस युद्धघोष के पश्चात भारत के सैनिक किस प्रकार शत्रु की सेना का अन्त करते हैं ? – और अब जबकि वह घड़ी उनके सामने आने ही वाली है तो कुछ पता नहीं कि उनकी जीवन लीला कितनी देर की है ? ऐसे विचारों से वह भी घबरा गए ।
युद्ध भूमि अब युद्ध के लिए सज चुकी थी। बस, थोड़ी सी चिंगारी की आवश्यकता थी। अब उसी की प्रतीक्षा की जा रही थी कि कौन सा पक्ष युद्ध के लिए पहल करे ?
भारतीय पक्ष अपनी उस आदर्श परम्परा का निर्वाह करना चाहता था, जिसमें वह निरपराध लोगों पर अपनी ओर से कभी आक्रमण नहीं करता था। यद्यपि भारत की यह भी परम्परा रही है कि जो सेना या शत्रु दल भारत के वीर सैनिकों से युद्ध भूमि में लड़ने के लिए आ खड़ा हो, वह फिर कभी उसका मित्र नहीं हो सकता और ना ही उसके रक्त बहाने में भारत के वीरों ने कभी कोई किसी प्रकार का संकोच किया। भारत के वीर योद्धाओं ने युद्ध के मैदान में खड़े शत्रुओं को मानवता का शत्रु समझकर उनसे धर्म युद्ध करना ही उचित माना है। आज भी उन्हें शत्रु दल से धर्म युद्ध करना था । यह धर्म युद्ध मानवता के कुछ मूल्यों को लेकर होने वाला था। जिसमें यह तय होने वाला था कि मानवता का रक्त बहाना उचित है या रक्त बहाने वालों का रक्त बहाना उचित है ? इतिहास बड़ी निकटता से और बड़ी गंभीरता से इन पलों को निहार रहा था, क्योंकि उसे रक्त बहाने वालों का रक्त बहाना उचित है या मानवता का रक्त बहाना उचित है ? – इस प्रश्न का उत्तर जो देना था।

जब युद्ध सिर पर हो खड़ा तब एक ही संकल्प लो।
न सांझ वतन की होने देंगे – मन में यही ठान लो ।।
हम कदम से कदम मिलाकर , बढ़ते रहेंगे चाव से। सर्वस्व देंगे निज देश को हृदय के पवित्र भाव से।।

अरबी आक्रमणकारियों की सेना देवल के किले के बाहर ही डेरा डाले हुए पड़ी थी । दोनों सेनाओं के सेनानायक आक्रमण करने के लिए अब पूरी तरह तैयार थे। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण पल थे जब शत्रु पक्ष को कोई भी यह समझाने वाला नहीं था कि वे मानवता के विरुद्ध अपराध करने वाले इस युद्ध को रोक दें और अपनी लूट और स्वार्थ की प्रवृत्ति को त्याग कर स्वदेश लौट जाएं।
– युद्ध कितना मानवीय है या कितना दानवीय है ? -कितना प्रासंगिक हो गया है और कितना अप्रासंगिक है ?
– युद्ध का औचित्य और अनौचित्य क्या है ?
इसे समझाने और बताने वाले तो केवल भारत में ही होते रहे हैं। जो मानवता के हितों को सर्वोपरि रखते रहे हैं । हमें युद्ध की गंभीरता, युद्ध की आवश्यकता, युद्ध के औचित्य और युद्ध के अनौचित्य पर गंभीरता से चिंतन करते थे और जब दो सेनाएं कहीं युद्ध क्षेत्र में इस प्रकार आमने सामने आ जाती थीं तो उनके युद्ध के प्रयोजन को समझकर ऐसे गंभीर व्यक्तित्व उन्हें युद्ध से कई बार रोक दिया करते थे। उन्हें कठोर शब्दों में यह चेतावनी दे दिया करते थे कि वे दोनों ही धर्म के रास्ते पर नहीं हैं । इसलिए उन दोनों को ही युद्ध क्षेत्र से पीछे हट जाना चाहिए और यदि उन दोनों में से कोई एक गलत होता था तो उसको भी गलत कहने वाले गम्भीर व्यक्तित्व हुआ करते थे। इतना ही नहीं यदि कोई ‘अर्जुन’ युद्ध के मैदान से भागने का प्रयास करता था तो उस ‘अर्जुन’ को युद्ध क्षेत्र में डटे रहकर मानवता के विरुद्ध कार्य करने वाले शत्रुओं का विनाश करने के प्रति सजग करने के अपने छत्रिय धर्म का पालन करने वाला भी कोई हमारे पास ‘श्रीकृष्ण’ होता था। पर आज ऐसा कुछ भी नहीं था।

(हमारी यह लेख माला मेरी पुस्तक “राष्ट्र नायक राजा दाहिर सेन” से ली गई है। जो कि डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा हाल ही में प्रकाशित की गई है। जिसका मूल्य ₹175 है । इसे आप सीधे हमसे या प्रकाशक महोदय से प्राप्त कर सकते हैं । प्रकाशक का नंबर 011 – 4071 2200 है ।इस पुस्तक के किसी भी अंश का उद्धरण बिना लेखक की अनुमति के लिया जाना दंडनीय अपराध है।)

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत एवं
राष्ट्रीय अध्यक्ष : भारतीय इतिहास पुनर्लेखन समिति

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