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शिक्षा/रोजगार

परिवर्तन के पथ प्रदर्शक बनें शिक्षक

प्रो. एनके सिंह

मैं हमेशा से ऐसा करता आया हूं और शिक्षक समुदाय को भी यही सलाह देता हूं कि शिक्षण दिल से होना चाहिए, न कि दिमाग से। यह तभी संभव है, जब आप अपने जीवन के अनुभवों को दिल से महसूस करते हो और इन अनुभवों को लेकर अपने भीतर ही शोध में मशगूल रहते हों। महात्मा बुद्ध और शंकराचार्य ने तो कभी नोट्स पढक़र या पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन के जरिए अपने शिष्यों को विद्या नहीं दी। इसके बावजूद उन्होंने दुनिया में बदलाव की एक अविरल धारा बहाई थीज्अभी हाल ही में हमने बड़ी धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ शिक्षक दिवस मनाया। इस दिन मुझे भी मेरे कई शिष्यों के बधाई संदेश मिले, लेकिन अहम सवाल यह कि क्या इस दिन को मनाने के बस यही मायने हैं। किसी भी दिन को साल के एक निश्चित तारीख को मनाना पश्चिमी सभ्यता की निशानी है। इस तरह विशेष  अवसर मनाकर उन लोगों को याद किया जाता है, जिन्हें हम अपने जीवन में भुलाते जा रहे हैं। मैं जब कनाडा के शहर मोंट्रियल में यूएन एजेंसी के साथ काम कर रहा था, तो एक दिन मेरे बॉस ने हंसते हुए कहा, ‘ये लोग वर्ष के एक दिन मातृ दिवस के तौर पर मनाते हैं, लेकिन जब मैं पंजाब में जाता हूं, तो एक दिन के लिए भी अपनी मां से न मिलूं तो वह नाराज हो जाती हैं। इसके बाद जब अगली बार मैं उनसे मिलता हूं तो वह पंजाबी में बोलती हैं, ‘मैं की मर गई हां’। भारतीयों के लिए हर दिन मातृत्व दिवस है।  यही बात हू-ब-हू शिक्षक दिवस पर भी लागू होती है, क्योंकि उनसे केवल तभी शिक्षा नहीं मिलती जब वह कक्षा ले रहे होते हैं, बल्कि यह एक निरंतर प्रक्रिया है। शिक्षक महज कक्षा में ही बच्चों को पाठ नहीं पढ़ाते, बल्कि उनके जीवन में विश्वास व सिद्धांतों के प्रति भी शिक्षार्थियों का मार्गदर्शन करते हैं। वह अपने जीवन के मूल्यों को विद्यार्थियों के जीवन में उतारने का भी प्रयास करते हैं। भारत की यदि बात की जाए तो यहां शुरू से ही पठन-पाठन की एक प्रभावशाली परंपरा रही है। हमारे करीब पांच हजार वर्ष पुराने ग्रंथ इस बात की पुष्टि करते हैं कि गुरुओं द्वारा शिष्यों को उपनिषदों और गीता जैसे पवित्र ग्रंथों की शिक्षा दी जाती थी। जब मैंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति हासिल करने वाली पुस्तक ‘दि डायलॉग विद येती’ लिखी थी, तो मैंने अपने विचारों की मूल भावना को पाठकों तक पहुंचाने के लिए संवाद का सहारा लिया था। इस किताब के शुरू में नचिकेता की कहानी पर प्रकाश डाला गया है, जो अपने पिता के कहने पर मृत्यु रूपी देवता के द्वार पर शिक्षा के लिए इंतजार करते हैं। एक लंबे व्रत के बाद वह मृत्यु के देवता को खुश कर देते हैं। उनसे प्रसन्न हुए यमराज उनसे उनकी इच्छा पूछते हैं। तब नचिकेता ने कहा कि मैं आपसे जीवन और मृत्यु के रहस्य जानना चाहता हूं। यमराज ने इसके बदले में उनके समक्ष दुनिया भर के सुख साधन और दौलत देने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उस युवा ने उसे ठुकरा दिया और ब्रह्म ज्ञान की मांग उनके समक्ष रखी। अंतत: यमराज उन्हें यह रहस्य बताने के लिए राजी हो जाते हैं। यह आज भी यम-नचिकेता संवाद के रूप में हमारे पास उपलब्ध है। आज से करीब दो वर्ष पूर्व बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय स्तर के सेमिनार में मुख्य वक्ता के लिए मुझे निमंत्रित किया गया था। उस दौरान मैंने पाया कि विभिन्न देशों के वक्ता पावर प्वाइंट पे्रजेंटेशन सरीखी तैयारियों के साथ मंच पर गए, लेकिन मैं हमेशा की तरह बिना किसी पूर्व तैयारी के ही आया था। जब प्रस्तुति के लिए मेरी बारी आई, तो मैंने इस कथन के साथ शुरुआत की कि अन्य माननीय वक्ताओं की भांति मैं पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन के साथ मंच पर नहीं आया हूं, लेकिन मेरे पास कुछ पावरफुल प्वाइंट जरूर हैं। मेरे इतने कहने पर ही सारा सदन सहज रूप से ही तालियों की गूंज से भर गया। अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए मैंने बिना पूर्व तैयारी से संवाद को चुना। अगले दिन मीडिया ने भी इसे विशेष तौर पर प्रकाशित किया। मैं हमेशा से ऐसा करता आया हूं और शिक्षक समुदाय को भी यही सलाह देता हूं कि शिक्षण दिल से होना चाहिए, न कि दिमाग से। यह तभी संभव है, जब आप अपने जीवन के अनुभवों को दिल से महसूस करते हो और इन अनुभवों को लेकर अपने भीतर ही शोध में मशगूल रहते हों। महात्मा बुद्ध और शंकराचार्य ने तो कभी नोट्स पढक़र या पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन के जरिए अपने शिष्यों को विद्या नहीं दी। इसके बावजूद उन्होंने दुनिया में बदलाव की एक अविरल धारा बहाई थी। मुझे आज भी याद है कि किस तरह से हमारे दर्शन शास्त्र के शिक्षक कई बार प्रभावी ढंग से विचारों की प्रस्तुति के जरिए हमारे दिलोदिमाग पर एक गहरी छाप छोड़ देते थे। एक शिक्षक को इस बात की भलीभांति समझ होनी चाहिए कि वह शिक्षण कार्य के लिए कौन सा तरीका अपनाता है। शिक्षार्थियों के हितों का ख्याल रखते हुए उन्हें एक ऐसा मार्ग अपनाना चाहिए, जिससे वे अपने शिष्यों का ज्ञान और मूल्य प्रभावशाली ढंग से प्रदान कर सकें। मैंने दिल्ली में अपनी पोती दिवा से पूछा कि ऐसा कौन सा गुण है जो शिक्षक में होना सबसे जरूरी है। उसने तपाक से जवाब दिया, ‘एक शिक्षक को अपने शिष्य की अच्छी समझ होनी चाहिए।’ एक नौंवी कक्षा में पढऩे वाली लडक़ी में मुझे यह बात एक सरल लहजे में समझा दी और मुझे इस बुनियादी हकीकत का पता चल सका। इस समझ में समानुभुति का तत्त्व भी निहित होता है। इसके कारण एक अध्यापक खुद को अपने विद्यार्थियों के स्थान पर रखकर देखता है। इससे वह अपने शिष्यों की ताकतों व कमजोरियों को अच्छे से समझ पाता है। यह सामान्य अनुभूति से काफी अलग अनुभूति है। बच्चों में आम तौर पर ऐसी भावना बन चुकी होती है कि उन्हें व उनकी समस्याओं को सुनने के लिए उनके शिक्षकों के पास पर्याप्त समय नहीं होता। एक अच्छे शिक्षक को खुद और अपने शिष्य की एक बेहतर परख होती है। इसीलिए मैं स्वयं भी सहभागितापूर्ण पाठन का बेहतर मानता हूं और दूसरे शिक्षकों को भी यही तरीका अपनाने के लिए सलाह देता हूं। सिर्फ कक्षा में पाठ पढ़ाना और घर के लिए गृहकार्य दे देने को मैं अध्यापन का उचित तरीका नहीं मानता। एक शिक्षक को ऐसे विद्यार्थी तैयार करने होंगे, जो देश के रचनात्मक भविष्य में सहयोगी बन सकें। नरेंद्र मोदी एक ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो अच्छे शिक्षक भी हैं। शिक्षक दिवस के अवसर पर उन्होंने कुशाग्र बुद्धि के दर्शन भी करवाए। इस अवसर पर उन्होंने जो कहा वह याद रखने योग्य बात है कि शिक्षक कभी सेवानिवृत्त नहीं होता, क्योंकि वह जीवन भर सीखता और सिखाता रहता है। शिक्षक में ज्ञान अर्जित करने और बांटने में गहरी रुचि लेनी चाहिए। इसके अलावा उन्हें विद्यार्थियों की क्षमता और दृष्टिकोण को अच्छे से समझना चाहिए, ताकि उन्हें उचित उपलब्धियों तक पहुंचाने के लिए सटीक मार्गदर्शन किया जा सके। एक अच्छा शिक्षक हमेशा शिक्षार्थियों को प्रेरित करते हुए उनके दिलोदिमाग पर एक सकारात्मक छाप छोड़ता है, क्योंकि विद्यार्थीं जीवन ही सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए सबसे उचित समय होता है।बस स्टैंडपहला यात्री : हिमाचल प्रदेश में बंदरों और अन्य जंगली जानवरों ने किसानों का जीना दुभर कर दिया है। सरकार ने उन्हें पकडऩे के लिए जो पिंजरे मंगवाएं थे, वे आज भी खाली पड़े हैं। आखिर सरकार कर क्या रही है?दूसरा यात्री : संभवत: अब वह किसानों को इन पिंजरों में बंद करने की सोच रही है, ताकि उन्हें बंदरों से बचाया जा सके।

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