गौ रक्षा की दिशा में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण आदेश

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गौ रक्षा को लेकर उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद स्थित उच्च न्यायालय ने जो निर्णय दिया है उसकी जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। 01 सितंबर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण मामले में टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी भी व्यक्ति के द्वारा गौ मांस खाना उसका मौलिक अधिकार नहीं है। माननीय उच्च न्यायालय की इस टिप्पणी से भारत की उस सांस्कृतिक परंपरा की रक्षा करने में सहायता मिलेगी जो प्रत्येक प्राणी की रक्षा करने को अपना सांस्कृतिक मौलिक और वैश्विक मानस का पवित्र अधिकार मानती है। ‘पशून पाहि’ कहने वाले वेद ने गायों के लिए यह स्पष्ट कहा है कि ‘गावो विश्वस्य मातर:’ – अर्थात गाय विश्व की माता है।
    जिस भारत देश में गाय के प्रति इतनी श्रद्धा रखी जाती हो कि उसे सारे संसार की माता कहकर सम्मानित किया जाता हो, उसमें जीभ के स्वाद के लिए गाय के अस्तित्व को समाप्त करने की अनुमति किसी भी वर्ग संप्रदाय या व्यक्ति को नहीं दी जा सकती । यही मौलिक तत्व भारतीय सामासिक संस्कृति का वह चेतन तत्व है जिसकी रक्षा करना और जिसके प्रचार प्रसार के लिए प्रत्येक नागरिक को अधिकार देना भारत का संविधान सुरक्षित करता है। ऐसे में माननीय उच्च न्यायालय के द्वारा यह स्पष्ट करना भी बहुत महत्वपूर्ण है कि जीभ के स्वाद के लिए किसी के प्राणों को नहीं लिया जा सकता। जीवन जीने का अधिकार सभी को है ।
  भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भी यही कहता है कि संसार में मानव को ही नहीं बल्कि सभी प्राणियों को जीवन का अधिकार  मौलिक अधिकार ईश्वर प्रदत्त अधिकार  के रूप में उपलब्ध है। भारत की महान सांस्कृतिक विरासत के इसी मौलिक चिंतन को आज यथार्थ में खुली हवा में सांस लेने के लिए उचित परिवेश देते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि बुड्ढी बीमार गाय भी कृषि के लिए उपयोगी है उसकी हत्या की अनुमति भी किसी को नहीं दी जा सकती। यदि गाय को मारने वाले को छोड़ा गया तो वह फिर अपराध करेगा। वास्तव में माननीय न्यायालय के इस आदेश से दम घोंटती भारतीय संस्कृति को नई प्राण ऊर्जा प्राप्त हुई है।
गोवध निषेध या पशु हत्या निषेध जैसे जितने भी कानून इस समय देश में प्रचलित हैं, उनमें सभी में एक महत्वपूर्ण कमी यह रही है कि यदि पशु अनुपयोगी हो गया है या बुड्ढा हो गया है या गाय दूध नहीं देती है तो उसके वध की अनुमति दी जा सकती है, इसी का लाभ उठाकर गोवंश को समाप्त करने की हर संभव कोशिश गौ हत्यारे करते रहे हैं। इस संदर्भ में माननीय उच्च न्यायालय का यह कहना भी बहुत ही सारगर्भित और प्रशंसनीय है कि गाय को सरकार राष्ट्रीय पशु घोषित करे। जिसे हिन्दू माता के रूप में सम्मान देते हैं। जिससे गाय से हिंदुओं की आस्था जुड़ी है और आस्था पर चोट करने से देश कमजोर होता है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि  गोरक्षा का काम केवल एक धर्म संप्रदाय का नहीं है और न ही गायों को सिर्फ धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए, बल्कि गाय भारत की संस्कृति है और संस्कृति की रक्षा का कार्य देश के प्रत्येक नागरिक का है। पूरे विश्व में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां सभी संप्रदायों के लोग रहते हैं। देश में पूजा पद्धति भले अलग-अलग हो, लेकिन सबकी सोच एक है। सभी एक-दूसरे के धर्म का आदर करते हैं। यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव ने संभल के जावेद की जमानत अर्जी खारिज करते हुए दिया है।
न्यायालय ने कहा कि देश के 29 में से 24 राज्यों में गोवध प्रतिबंधित है। एक गाय जीवनकाल में 410 से 440 लोगों का भोजन जुटाती है। वहीं, गोमांस से केवल 80 लोगों का पेट भरता है। मानव जीवन में गाय के महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए महाराजा रणजीत सिंह ने गो हत्या पर मृत्यु दंड देने का आदेश दिया था। यही नहीं, कई मुस्लिम और हिंदू राजाओं ने गोवध पर रोक लगाई थी। गाय का मल व मूत्र असाध्य रोगों में लाभकारी है। गाय की महिमा का वेदों-पुराणों में बखान किया गया है। रसखान ने कहा है कि ‘उन्हें जन्म मिले तो नंद के गायों के बीच मिले।’ गाय की चर्बी को लेकर मंगल पांडेय ने क्रांति की थी। संविधान में भी गो संरक्षण पर बल दिया गया है।
      न्यायालय ने कहा, सरकार को संसद में बिल लाकर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करना होगा। उन लोगों के विरुद्ध कड़े कानून बनाने होंगे जो गाय को नुकसान पहुंचाने की बात करते हैं। दंडित करने का कानून उनके लिए भी बने जो छद्मवेशी होकर गोरक्षा की बात गोशाला आदि बनाकर करते हैं लेकिन गाय की सुरक्षा से उनका कोई सरोकार नहीं होता। उनका एकमात्र उद्देश्य पैसा कमाना है। गो संरक्षण और संवर्धन का काम केवल एक मत और संप्रदाय का नहीं है। बल्कि गाय भारत की संस्कृति है और संस्कृति को बचाने का काम भारत के हर नागरिक को करना चाहिए, फिर चाहे वह किसी धर्म या पंथ का हो। सैकड़ों उदाहरण हमारे देश में हैं जब-जब हम अपनी संस्कृति को भूले हैं विदेशियों ने हम पर आक्रमण कर गुलाम बनाया और आज भी न चेते तो अफगानिस्तान पर निरंकुश तालिबान का आक्रमण और कब्जे को हमें नहीं भूलना चाहिए।
    भारत में यद्यपि प्राचीन काल से गाय के प्रति श्रद्धा भावना रही है ,परंतु हिंदू समाज की धार्मिक आस्था पर चोट करते हुए एक संप्रदाय ने इसे बड़ी तेजी से मिटाने का काम किया है । गाय के महत्व को समझकर अमेरिका जैसे देशों ने भी इसका सम्मान किया है । जिस के संबंध में हमें कुछ आंकड़ों पर विचार करना चाहिए । हमें ज्ञात होना चाहिए कि कोलंबस ने सन 1492 में जब अमेरिका की खोज की तो वहां कोई गाय नही थी, केवल जंगली भैंसें थीं। जिनका दूध निकालना लोग नही जानते थे, मांस और चमड़े के लिए उन्हें मारते थे। कोलंबस जब दूसरी बार वहां गया तो वह अपने साथ चालीस गायें ले गया। गोवंश की वृद्धि के लिए वह दो सांड भी साथलेता गया । कोलंबस गाय के प्रति बहुत श्रद्धा भाव रखता था। उसने ऐसा केवल इसलिए किया था कि वहां गाय का अमृतमयी दूध उसे निरन्तर मिलता रहे।
  ‘श्रुति सौरभ’ नामक पुस्तक के लेखक शिव कुमार शास्त्री जी हमें बताते हैं कि सन 1525 में गाय वहां से मैक्सिको पहुंची। 1609 में जेम्स टाउन गयी, 1640 में गायें 40 से बढ़कर तीस हजार हो गयीं। 1840 में डेढ़ करोड़ हो गयीं। 1900 में चार करोड़, 1930 में छह करोड़ साढ़े छियासठ लाख और 1935 में सात करोड़ 18 हजार 458 हो गयीं। अमेरिका में सन 1935 में 94 प्रतिशत किसानों के पास गायें थीं, प्रत्येक के पास 10 से 50 तक उन गायों की संख्या थी।
भारत के बारे में विचार करते हैं कि भारत में गाय का कितना महत्व है और अब इसकी स्थिति क्या हो चुकी है ? गर्ग संहिता के गोलोक खण्ड में भगवद-ब्रह्म-संवाद में उद्योग प्रश्न वर्णन नाम के चौथे अध्याय में बताया गया है कि जो लोग सदा घेरों में गौओं का पालन करते हैं, रात दिन गायों से ही अपनी आजीविका चलाते हैं, उनको गोपाल कहा जाता है। जो सहायक ग्वालों के साथ नौ लाख गायों का पालन करे वह नंद और जो 5 लाख गायों को पाले वह उपनंद कहलाता है। (जो लोग कृष्ण जी को माखन चोर कहते हैं उन मूर्खों को यह समझना चाहिए कि बाबा नंद के यहां पर 900000 से अधिक गाय थीं। तभी उन्हें नंद की उपाधि प्राप्त हुई थी। जिसके घर में गायों की इतनी बड़ी संख्या हो ,उसके यहां पर मक्खन कितना होगा ? यह बात बहुत विचारणीय है । यदि इसके उपरांत भी उसके बच्चे मक्खन चुराएं तो इससे बड़ा उपहास और कोई हो नहीं सकता ) जो दस लाख गौओं का पालन करे उसे वृषभानु कहा जाता है और जिसके घर में एक करोड़ गायों का संरक्षण हो उसे नंदराज कहते हैं। जिसके घर में 50 लाख गायें पाली जाएं उसे वृषभानुवर कहा जाता है। इस प्रकार ये सारी उपाधियां जहां व्यक्ति की आर्थिक संपन्नता की प्रतीक है, वहीं इस बात को भी स्पष्ट करती हैं कि प्राचीन काल में गायें हमारी अर्थव्यवस्था का आधार किस प्रकार थीं। साथ ही यह भी कि आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्तियों के भीतर गो भक्ति कितनी मिलती थी? इस प्रकार की गोभक्ति के मिलने का एक कारण यह भी था कि गोभक्ति को राष्ट्रभक्ति से जोड़कर देखा जाता था। गायें ही मातृभूमि की रक्षार्थ अरिदल विनाशकारी क्षत्रियों का, मेधाबल संपन्न ब्राह्मण वर्ग का, कर्त्तव्यनिष्ठ वैश्य वर्ग का तथा सेवाबल से युक्त शूद्र वर्ग का निर्माण करती थीं।
    मेगास्थनीज ने अपने भारत भ्रमण को अपनी पुस्तक ‘इण्डिका’ में लिखा है। वह लिखते हैं कि चंद्रगुप्त के समय में भारत की जनसंख्या 19 करोड़ थी और गायों की संख्या 36 करोड़ थी। (आज सवा अरब की आबादी के लिए दो करोड़ हैं ) अकबर के समय भारत की जनसंख्या बीस करोड़ थी और गायों की संख्या 28 करोड़ थी। 1940 में जनसंख्या 40 करोड़ थी और गायों की संख्या पौने पांच करोड़ जिनमें से डेढ़ करोड़ युद्घ के समय में ही मारी गयीं।
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 1920 में चार करोड़ 36 लाख 60 हजार गायें थीं। वे 1940 में 3 करोड़ 94 लाख 60 हजार रह गयीं। अपनी संस्कृति के प्रति हेयभावना रखने के कारण तथा गाय को संप्रदाय (मजहब) से जोड़कर देखने के कारण गोभक्ति को भारत में कुछ लोगों की रूढ़िवादिता माना गया है।
यही कारण है कि भारत में गौ वंश का तेजी से विनाश किया गया। वोटों की राजनीति और तुष्टिकरण के खेलने गोवंश को विनष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यदि अमेरिका  जैसी रफ्तार से भारत में भी गोवंश का विकास होता तो आज भारत में कितनी गाय हो सकती थीं? यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इसके साथ ही यह भी विचार करने योग्य बात है कि उन करोड़ों अरबों गायों से आज की कृषि भी कितनी उन्नत होती ? अनेकों बीमारियों का घर बन चुका भारत गाय के दूध, दही, छाछ, मक्खन आदि के रहते अपने यौवन को बर्बाद होने से भी बचा लेता । काश ! अब भी हम माननीय उच्च न्यायालय के उक्त आदेश के अनुसरण में गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करते हुए पूर्ण गऊ हत्या निषेध की दिशा में ठोस निर्णय ले सकें तो भी दयनीय होती भारत की दशा को सुधारा जा सकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक :  उगता भारत

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