अनोखी और निर्णय लेने में तीव्र बुद्धि प्रकट करने वाली प्रतिभा के धनी थे प्रणब मुखर्जी

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ललित गर्ग 

प्रणब दा के राजनीतिक जीवन की अनेक विशेषताएं एवं विलक्षणताएं रही हैं। कानून, सरकारी कामकाज की प्रक्रियाओं और संविधान की बारीकियों की बेहतरीन समझ रखने वाले प्रणब दा 2014 के बाद नई भाजपा सरकार से अच्छे संबंध बनाने में सफल रहे।

‘भारत रत्न’, भारतीय राजनीति के शिखरपुरुष एवं पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जिन्दगी और मौत के बीच संघर्ष करते हुए आखिर हमें छोड़कर चले गए। उनका राजनीतिक जीवन पांच दशक से भी लंबा रहा। उनके विरल व्यक्तित्व के इतने रूप हैं, इतने कोण हैं, इतने आयाम हैं कि उन्हें एक छवि में बांधना संभव है। जिस पर भी कौतूहल यह है कि जो सबसे बड़े आयाम हैं, वे तो इन सब परिभाषाओं के बाहर ही छूट गये। और वे हैं भारतीय लोकचेतना के लाड़ले नायक! राष्ट्रीयता के पोषक!! विविधता में एकता के प्रेरक !!! विरोधी विचारों में समन्वय-सेतु!!!! उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के इतने लंबे दौर में लगभग हर महत्त्वपूर्ण मंत्रालय की जिम्मेदारी को अनूठे ढंग से संभाली। न केवल भारत में बल्कि दुनिया में अपने राजनीतिक कौशल एवं विलक्षण प्रबन्धन क्षमता से अपनी स्वतंत्र पहचान कायम की, विशेषतः विश्वस्तर पर उन्हें सबसे ज्यादा पहचान भारत के वित्तमंत्री के रूप में मिली। खासतौर पर 2008 की भयावह मंदी से बाहर निकालने में जिस तरह मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्रीय हुनर को याद किया जाता है उसी तरह मंदी से उबारने के काम के क्रियान्वयन के लिए प्रणब मुखर्जी का नाम लिया जाता है। न्यूयॉर्क से प्रकाशित पत्रिका, यूरोमनी के एक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 1984 में दुनिया के पाँच सर्वोत्तम वित्त मन्त्रियों में से एक प्रणब मुखर्जी भी थे। प्रणव दा एक अत्यंत शिष्ट, परिपक्व, संयत और मुखर राजनेता रहे हैं। वे भारतीय राजनीति में ‘अजातशत्रु’ के रूप में रहे। फिर भी एक बड़ा सत्य तो यही है कि प्रणब दा जैसे राजनेता युगों में एक होते हैं।

राष्ट्रपति के रूप में प्रणब मुखर्जी को विद्वता और शालीन व्यक्तित्व के लिए याद किया जाता है। उन्होंने अपने कार्यकाल में लीक से हटकर अनूठे एवं अविस्मरणीय फैसले लिए। राष्ट्रपति पद के साथ औपचारिक तौर पर लगाए जाने वाले ‘महामहिम’ के उद्बोधन को उन्होंने खत्म करने का निर्णय लिया। रायसीना की पहाड़ी पर बने राष्ट्रपति भवन में अब तक कई राष्ट्रपतियों ने अपनी छाप छोड़ी है। उनमें राष्ट्रपति के रूप में प्रणब दा का कार्यकाल ऐतिहासिक, यादगार, गैरविवादास्पद और सरकार से बिना किसी टकराव का रहा। आमतौर पर राष्ट्रपति को भेजी गईं दया याचिकाएं लंबे समय तक लंबित रहती हैं लेकिन प्रणब मुखर्जी कई आतंकवादियों की फांसी की सजा पर तुरंत फैसले लेने के लिए याद किए जाएंगे। मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब और संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी की सजा पर मुहर लगाने में प्रणब मुखर्जी ने बिलकुल भी देर नहीं लगाई। राष्ट्रपति के तौर पर 5 साल के अपने कार्यकाल के दौरान प्रणब मुखर्जी ने राजनीतिक जुड़ाव से दूर रहकर काम किया। प्रणब दा जब केंद्र सरकार में थे तो उन्हें सरकार के संकटमोचक के तौर पर देखा जाता था, जब वे बातचीत के जरिए विभिन्न समस्याओं का समाधान निकालने वाले में माहिर माने जाते थे। पांच दशक के राजनीतिक जीवन में, जिसमें उन्होंने असंख्य शब्द कहे, एक भी अभद्र टिप्पणी उनकी आप याद नहीं कर सकते।
प्रणब दा के राजनीतिक जीवन की अनेक विशेषताएं एवं विलक्षणताएं रही हैं। कानून, सरकारी कामकाज की प्रक्रियाओं और संविधान की बारीकियों की बेहतरीन समझ रखने वाले प्रणब दा 2014 के बाद नई भाजपा सरकार से अच्छे संबंध बनाने में सफल रहे। देश की राजनीतिक परिस्थितियों, देश की घटनाओं से वे अपने आपको अवगत रखते थे। प्रधानमंत्री की विशेष पहल पर उन्होंने शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति भवन परिसर में बने स्कूल में छात्रों को पढ़ाया भी। इन्होंने राष्ट्रपति भवन में एक संग्रहालय का भी निर्माण करवाया, जहां आम लोग अपनी इस विरासत को देख सकते हैं।

प्रणब मुखर्जी का जन्म 11 दिसंबर 1935 में पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में हुआ था। कामदा किंकर मुखर्जी और राजलक्ष्मी मुखर्जी के घर जन्मे प्रणव का विवाह बाइस वर्ष की आयु में 13 जुलाई 1957 को शुभ्रा मुखर्जी के साथ हुआ था। उनके दो बेटे और एक बेटी- कुल तीन बच्चे हैं। पढ़ना, बागवानी करना और संगीत सुनना- उनके व्यक्तिगत शौक भी हैं। उन्होंने शुरुआती पढ़ाई बीरभूम में की और बाद में राजनीति शास्त्र और इतिहास विषय में एमए किया। उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री भी हासिल की। वे 1969 से 5 बार राज्यसभा के लिए चुने गए। बाद में उन्होंने चुनावी राजनीति में भी कदम रखा और 2004 से लगातार 2 बार लोकसभा के लिए चुने गए। उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत साल 1969 में हुई, जब भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मदद से उन्होंने सन् 1969 में राजनीति में प्रवेश किया, जब वे कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा के लिए चुने गए। सन् 1973 में वे केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिए गए और उन्हें औद्योगिक विकास विभाग में उपमंत्री की जिम्मेदारी दी गई। प्रणब दा ने अपनी आत्मकथा लिखा है कि वे इंदिरा गांधी के बेहद करीब थे और जब आपातकाल के बाद कांग्रेस की हार हुई, तब वे इंदिरा गांधी के साथ उनके सबसे विश्वस्त सहयोगी बनकर उभरे।
दक्षिण भारत में जो कांग्रेस का जनाधार बनकर उभरा वह भी इनकी मेहनत एवं राजनीतिक कौशल का परिणाम था। सन् 1980 में वे राज्यसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता बनाए गए। इस दौरान मुखर्जी को सबसे शक्तिशाली कैबिनेट मंत्री माना जाने लगा और प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में वे ही कैबिनेट की बैठकों की अध्यक्षता करते थे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था, पर तब कांग्रेस पार्टी ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री चुन लिया। 1984 में राजीव गांधी सरकार में उन्हें भारत का वित्तमंत्री बनाया गया। बाद में कुछ मतभेदों के कारण प्रणब मुखर्जी को वित्तमंत्री का पद छोड़ना पड़ा। वे कांग्रेस से दूर हो गए और एक समय ऐसा आया, जब प्रणब मुखर्जी ने एक नई राजनीतिक पार्टी बनाई। उन्होंने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस का गठन किया। दरअसल, वे अपने मत में स्पष्ट थे और अपना विरोध दर्ज करवाना जानते थे इसलिए उन्होंने राजीव गांधी से दूरी बनाई। वीपी सिंह के कांग्रेस छोड़ने के बाद पार्टी की स्थिति डांवाडोल हो गई। बाद में कांग्रेस ने प्रणब मुखर्जी पर फिर भरोसा जताया और उन्हें मनाकर फिर पार्टी में लाया गया और उनकी पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया।
प्रणब मुखर्जी को पीवी नरसिंहराव सरकार ने योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया। बाद में उन्हें विदेश मंत्री की जिम्मेदारी भी दी गई। 1997 में उन्हें संसद का उत्कृष्ट सांसद चुना गया। ये वो दौर था, जब कांग्रेस का जनाधार सिकुड़ने लगा था। केंद्र में मिली-जुली सरकारों का दौर चल रहा था और राष्ट्रीय राजनीति बदलाव के दौर से गुजर रही थी। लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें लोकसभा में सदन का नेता बनाया गया, क्योंकि तब प्रधानमंत्री राज्यसभा के सदस्य थे। वरिष्ठ सदस्य होने के नाते गठबंधन सरकार में अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियों को साथ लेकर चलने में प्रणब मुखर्जी की अहम भूमिका रहती थी। प्रणब मुखर्जी 23 वर्षों तक कांग्रेस पार्टी की कार्यसमिति के सदस्य भी रहे। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता होने के कारण अनेक अवसर ऐसे आये, जब लोग उन्हें भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देख रहे थे, मगर नियति को शायद कुछ और मंजूर था। वे 2009 से 2012 तक मनमोहन सरकार में फिर से वे भारत के वित्तमंत्री रहे। जब कांग्रेस ने उन्हें अपना राष्ट्रपति उम्मीदवार चुना, तब उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया। देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले वे पश्चिम बंगाल के पहले व्यक्ति बने। वे भारतीय अर्थव्यवस्था और राष्ट्र निर्माण पर कई पुस्तकें लिख चुके हैं। उन्हें पद्मविभूषण और ‘उत्कृष्ट सांसद’ जैसे पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। उनके कार्यकाल को एक प्रखर राजनेता के राजनय के उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा।

हाल ही में एक किताब के विमोचन के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुस्तक ‘प्रेसीडेंट प्रणब मुखर्जी ए स्टेट्समैन एट द राष्ट्रपति भवन’ को जारी किया। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रणब मुखर्जी के साथ अपने भावनात्मक जुड़ाव का उल्लेख किया और कहा कि प्रणब दा ने उनका ऐसा ख्याल रखा, जैसा कोई पिता अपने बेटे का रखता हो। प्रणब दा ने भी इस बात को स्वीकारा कि दोनों के बीच कभी मतभेद की नौबत नहीं आई, हालांकि दोनों की विचारधाराएं अलग-अलग हैं। वे लोकतांत्रिक मूल्यों की जीवंतता के लिये प्रयासरत रहे। संसद के काम में रुकावट पर उन्होंने चिंता जताई और कहा कि विपक्षी दलों को सदन को काम करने देना चाहिए।
मुखर्जी को पार्टी के भीतर तो सम्मान मिला ही, सामाजिक नीतियों के क्षेत्र में भी काफी सम्मान मिला है। अन्य प्रचार माध्यमों में उन्हें बेजोड़ स्मरणशक्ति वाला, आंकड़ाप्रेमी और अपना अस्तित्व बरकरार रखने की अचूक इच्छाशक्ति रखने वाले एक राजनेता के रूप में वर्णित किया जाता है। प्रणब मुखर्जी को 26 जनवरी 2019 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

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