नन्हे-मुन्ने बच्चों के लिए स्कूल जाने के पहले दिन का इंतजार अब होता जा रहा है कष्टकर

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डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा 

ए फार एपल और अ से अनार तो दूर की बात है, कोरोना महामारी के कारण दुनिया के 14 करोड़ नौनिहाल स्कूलों में अपना पहला कदम भी नहीं रख पाए हैं। इसे कोरोना महामारी का साइड इफेक्ट ही माना जा सकता है। कोविड-19 के चलते जहां चीन ने नवंबर 2019 से ही असर दिखाना शुरू कर दिया था वहीं दुनिया के अनेक देशों खासतौर से यूरोपीय देशों में 2020 की शुरुआत से ही लॉकडाउन का दौर आरंभ हो गया था तो हमारे देश में मार्च के अंत में लॉकडाउन का दौर आरंभ हुआ और सब कुछ बंद हो कर रह गया या यों कहे कि घरों में कैद होकर रह गए। यह सिलसिला लंबा चला और जब थोड़े राहत के अवसर आने लगे तब तक दुनिया के अन्य देशों के साथ ही और भी अधिक भयावहता के साथ कोरोना की दूसरी लहर आ गई जिसका असर अब थोड़ा कम होने लगा है तो कोरोना के नए-नए वेरिएंट और अब तो तीसरी लहर का डर सताने लगा है। तीसरी लहर का असर खासतौर से बच्चों पर रहने की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। दुनिया के कुछ देशों में बच्चों के स्कूल खुलने भी लगे हैं तो अभिभावक डर के कारण बच्चों को स्कूल भेजने में कतराते हुए भी देखे जा रहे हैं।

यूनिसेफ की ताजातरीन रिपोर्ट के अनुसार नौनिहालों का स्कूल में पहले दिन का इंतजार अधिक लंबा होने के साथ ही अब चिंताजनक हो गया है। हमारे देश में बड़े बच्चों खासतौर से छठी के बाद व दसवीं से स्कूलों को खोले जाने का अलग-अलग राज्यों द्वारा निर्णय लिया गया है। अभी पूरी तरह से स्कूलों का खुलना किसी दिवा-स्वप्न से कम नहीं है। कहने को ऑनलाईन व दूरस्थ शिक्षा के माध्यमों को अपनाया जा रहा है पर ऑनलाईन शिक्षा का स्तर तो दूर की बात इसके साइड इफेक्ट अधिक सामने आ रहे हैं। दूसरा यह कि सभी अभिभावकों व बच्चों के पास एंड्राइड फोन हो ही यह भी तो जरूरी नहीं है। ऑनलाईन कक्षाओं के कारण बच्चों के पास मोबाइल आने से कई तरह के दुष्प्रभाव भी सामने आ रहे हैं। खासतौर से अडल्ट साइटों और ऑनलाईन गेमों के चक्कर में बच्चे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। खैर यह तो अलग बात हो गई। पर एक बात साफ हो जानी चाहिए कि कोरोना का असर अभी जाने वाला नहीं है। वैक्सीनेशन के बावजूद इसके प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। अमेरिका में आधे से भी अधिक लोगों के वैक्सीनेशन के बावजूद मॉस्क फ्री करने का नतीजा सामने आ चुका है। ऐसे में कोरोना के प्रति गंभीरता तो रहेगी ही और रहनी भी चाहिए।
स्कूल के पहले दिन का क्रेज बच्चे से भी ज्यादा पेरेंट्स को रहता है। ऐसे में लगभग दो साल पूरी तरह से बर्बाद होने या यों कहें कि स्कूल में पहला कदम रखने वाले बच्चों के दो साल पूरी तरह से खराब हो जाना गंभीर चिंता का विषय है। यूनिसेफ, यूनेस्को और विश्वबैंक ने इस पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। सरकारों से कोरोना प्रोटोकाल की पालना के साथ जल्दी से जल्दी स्कूल खोलने का आग्रह किया जा रहा है। यह सब तब है जब पेरेंट्स में बच्चों को लेकर अत्यधिक अपेक्षाएं और प्रतिस्पर्धा होने लगी है। मजे की बात यह है कि यह हालात तब हुए हैं जब बच्चों को लेकर माता-पिता अति प्रतिस्पर्धा के दौर में चल रहे थे। हालांकि एक तर्क यह दिया जा सकता है कि बच्चा एक साल देरी से पढ़ना आरंभ कर भी देगा तो क्या फर्क पड़ेगा पर यह कहना जितना आसान है उतना आसान है नहीं। दरअसल आज के दौर में बच्चों को लंबा समय तो स्कूली परिस्थितियों से सामंजस्य बैठाने में ही लग जाता है।
बच्चों के पहला कदम स्कूल में नहीं रखने के कारण सीखने की समझ, लिखने की आदत, अन्य बच्चों या यों कहें कि घर से इतर के साथ तालमेल बैठाने, अभिभावकों से अलग कुछ घंटों तक स्कूल में रहने और सीखने सिखाने के दौर से बच्चा वंचित हो रहा है। शिक्षण संस्थाओं को हो रहे नुकसान से इतर देखने के प्रयास हमें करने ही होंगे। क्योंकि अब हालात अलग तरह के होने जा रहे हैं। कोरोना पहले और कोरोना बाद के हालात एकदम भिन्न प्रकार के हो गए हैं। कोरोना के रहते हमें पढ़ाई लिखाई जारी रखने के उपाय खोजने ही होंगे। इसके लिए जहां योग-व्यायाम के लिए समय तय करना होगा तो दूसरी और कक्षाओं में बच्चों के बैठने के बीच डिस्टेंस, सैनेटाइजर और हाथ धोने की समुचित व्यवस्था और मास्क की अनिवार्यता तो रखनी ही होगी। बच्चे के स्वास्थ्य के प्रति भी गंभीर रहना होगा।

स्कूलों को अपना पैटर्न बदलते हुए बच्चों को दो पारियों में बुलाने या उनके समय में थोड़ा बदलाव भी रखा जा सकता है। हालांकि इन सब व्यवस्थाओं के कारण स्कूल प्रबंधन की लागत प्रभावित होगी और वे किसी ना किसी प्रकार से इस अतिरिक्त लागत को वसूलना ही चाहेंगे। यह तो हुई निजी स्कूलों की बात पर सरकारी स्कूलों को भी ठोस प्रयास करने होंगे। अब स्कूलों में पानी, बिजली की माकूल व्यवस्था नहीं होना अधिक समय तक नहीं चल सकेगा। इसी तरह से भले ही समय में बदलाव करना पड़े पर एक कक्षा में सीमित संख्या में ही बच्चों की बैठने की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। कोरोना को देखते हुए स्कूलों में थर्मल स्कैनिंग की व्यवस्था फर्स्टएड की तरह रखनी ही होगी। सरकार को इस तरह का तंत्र विकसित करना होगा जिससे शिक्षण संस्थाएं सुचारू रूप से चल सकें और बच्चों की पढ़ाई का सिलसिला आरंभ हो सके। यह सब इसलिए भी जरूरी हो गया है कि अब धीरे-धीरे अधिकांश गतिविधियां पटरी पर आने लगी हैं। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था और शैक्षणिक गतिविधियों के संचालन को प्राथमिकता देनी ही होगी। दुनिया के 14 करोड़ नौनिहाल तो स्कूल में पहला कदम रखने को तरस गए हैं जिसे अब दूर करना ही होगा।

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