बिजली बोर्डों तले पल रहा है अंधेरा

electric problem 2डा. भरत झुनझुनवाला

जनता की क्रय शक्ति बढ़ेगी तो बिजली बोर्डों की वसूली बढ़ेगी और इनके द्वारा बिजली को खरीद कर सप्लाई करना लाभ का सौदा हो जाएगा। राज्यों के बिजली बोर्डों का प्रभावी प्रबंधन आज भी हमारे समक्ष एक बड़ी चुनौती है। राज्यों के बिजली बोर्डों के प्रबंधन को भी ठीक करना चाहिए। वास्तव में ये जानबूझ कर लोड शेडिंग करते हैं। ये पहले बिजली की चोरी कराते हैं और शार्टेज बनाते हैं, फिर लोड शेडिंग करते हैं। इससे जनमानस में बिजली की सप्लाई बढ़वाने की प्रवृत्ति बनती है। इन्हें अधिक बिजली खरीदकर उसे अधिक कालाबाजारी करने के अवसर मिल जाते हैंज्प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश के नागरिकों को सातों दिन 24 घंटे बिजली उपलब्ध कराने के वादे की हाल में समीक्षा की गई। समीक्षा के दौरान यह बात सामने आई कि देश में पर्याप्त मात्रा में बिजली उपलब्ध है, परंतु राज्यों के बिजली बोर्ड इसे खरीद कर उपभोक्ता को सप्लाई नहीं कर रहे हैं। देश में बिजली की खरीद बिक्री इंडिया एनर्जी एक्सचेंज में होती है, यहां बिजली उत्पादक कंपनियां बिजली ऑफर करती हैं और बिजली बोर्ड इसे खरीदते हैं। एक्सचेंज पर वर्तमान में बिजली का दाम लगभग तीन से साढ़े तीन रुपए के बीच में है। बिजली बोर्डों द्वारा बिजली को छह से आठ रुपए तक बेचा जा रहा है। दो रुपए में खरीद कर छह से आठ रुपए में बेचना इनके लिए लाभ का सौदा हैं। परंतु इस लाभ को कमाने के स्थान पर ये लोड शेडिंग कर रहे हैं। कारण यह कि बोर्डों द्वारा जो बिजली सप्लाई की जाती है, उसमें बड़ा हिस्सा चोरी हो जाता है। कुछ राज्यों में ट्रांसमिशन लोस 40 से 50 प्रतिशत है। इसके अलावा एक अहम तथ्य यह भी कि बोर्ड द्वारा जो बिल जारी किए जाते हैं, उनमें से आधे की ही वसूली हो पाती है। दूर क्षेत्रों में बसे गांव तक बिजली पहुंचाने में खर्च ज्यादा आता है। बिजली की लाइनें डालनी पड़ती हैं, ट्रांसफार्मर लगाने पड़ते हैं तथा सब-स्टेशन बनाने पड़ते हैं। फलस्वरूप बिजली को सप्लाई करना बोर्ड के लिए घाटे का सौदा हो गया है। जितनी अधिक बिजली सप्लाई की जाएगी, उतना बोर्ड का घाटा बढ़ेगा।

अत: कहा जा सकता है कि बिजली की वास्तविक डिमांड ज्यादा है, परंतु बोर्डों की अकर्मण्यता के कारण यह डिमांड बाजार में नहीं पहुंच रही है। इस दृश्य के विपरीत मेरा अनुमान है कि बोर्डों द्वारा 24 घंटे बिजली की सप्लाई की जाए तो भी बिजली की मांग में विशेष वृद्धि नहीं होगी। पहला कारण है कि पांच रुपए से अधिक दाम पर लोगों की बिजली खरीदने की इच्छा नहीं है। दि एनर्जी रिसर्च इंस्टीच्यूट द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि शहरी उपभोक्ता बिजली के लिए पांच रुपए प्रति यूनिट अदा करने को तैयार हैं और किसान मात्र तीन रुपए। इससे ऊपर दाम पर ये उपभोक्ता बिजली की खपत कम करेंगे, जैसे एयर कंडीशनर के स्थान पर डेजर्ट कूलर लगाएंगे। दूसरा कारण है कि बड़े उपभोक्ताओं ने कैप्टिव पावर प्लांट लगा लिए हैं। पेपर फैक्टरी के एक मालिक ने बताया कि धान की भूसी से वह दो रुपए में स्वयं बिजली का उत्पादन कर रहे हैं। ऐसे में उद्योगों में बिजली की डिमांड घटती जाएगी। तीसरे बिजली की जो चोरी हो रही है, उस बिजली की भी खपत की जा रही है। बोर्ड सुचारू रूप से चलने लगे तो यह बिजली नंबर दो से नंबर एक में ट्रांसफर हो जाएगी। चोरी कम होने से बिजली की मांग पर कोई असर नहीं पड़ेगा। चौथे जिन क्षेत्रों की बिजली काटी जाती है वे राजनीतिक अथवा आर्थिक दृष्टि से कमजोर होते हैं। अत: यदि इन्हें 24 घंटे बिजली सप्लाई की गई, तो भी मांग में ज्यादा वृद्धि नहीं होगी, चूंकि इनके पास क्रय शक्ति नहीं है। अत: मेरा अनुमान है कि बोर्डों के सुचारू रूप से काम करने पर बिजली की मांग में लगभग मात्र 10 प्रतिशत की वृद्धि होगी

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