प्रेरणा ले आगे बढ़ै, करे जीवन का कल्याण

बिखरे मोती-भाग 106

चल मनुवा उस देश को,
जहां मिलै आनंद।
प्रकृति से है परे,
वह प्यारा परमानंद ।। 955 ।।

व्याख्या :-
महर्षि पतंजलि ने कहा था कि संसार के सारे क्लेश तन, मन और बुद्घि में है। मन का स्वभाव है-माया (प्रकृति) में रमण करना, और बुद्घि को भी माया में ही लगाये रखना, किंतु जब मन आत्मा को माया (प्रकृति) से परे परमपिता परमात्मा के गम्य क्षेत्र में पहुंचाता है तो व्यक्ति अंतर्मुखी होता है, सारे क्लेशों का निवारण होता है क्योंकि वह तत्क्षण परमानंद के करीब होता है। ऐसे रस की अनुभूति होती है जिसे वाणी व्यक्त करने में तथा लेखनी लिखने में असमर्थ होती है। इसलिए वेद ने परमात्मा को ‘रसो वै स:’ कहा है। अर्थात वह परमात्मा रसों का रस है। वहां आनंद ही आनंद है, जहां सबका प्यारा पिता परमानंद रहता है। रे मन, तू मुझे उस ओर ले चल।  ध्यान रहे बुद्घि का गम्य क्षेत्र प्रकृति है, परमात्मा नही इसलिए बुद्घि से परमात्मा को जाना नही जा सकता है। हां, श्रद्घा और विश्वास के बल पर आत्मप्रज्ञा के प्रकाश में उसको हृदय में अनुभूत किया जा सकता है। वह रसों का रस है, उसे पाकर मनुष्य आनंदमग्न हो जाता है।
जो जन जिम्मेदार हो,
होता वही वफादार।
दिया वचन पूरा करै,
हो गहरा समझदार ।। 956 ।।
व्याख्या :-
परिवार, समाज, राष्ट्र अथवा किसी संगठन में गैर जिम्मेदार लोगों की तो भीड़ होती है, किंतु जो व्यक्ति जिस स्तर पर जितना अपने दायित्व का निर्वहन सजगता और सतर्कता से करता है वह उसी स्तर का मुखिया होता है, प्रभुता का स्वामी होता है, महान होता है। इसके अतिरिक्त उसकी वफादारी (निष्ठा) काबिल-ए-तारीफ और असंदिग्ध होती है, जो उसके प्रभाव क्षेत्र को यश और प्रतिष्ठा से सुरभित करती है, महिमामंडित करती है। जिम्मेदार व्यक्ति की यह खासियत होती है कि वह दिये गये वचन अथवा दायित्व का पालन प्राणपण से करता है, येन-केन प्रकारेण उसे पूरा करता है। उसे अपनी साख और मर्यादा का ध्यान रहता है। इतना ही नही वह परिवार, समाज, राष्ट्र अथवा संगठन के उत्थान के लिए पैनी सूझ-बूझ और दूरदृष्टि से काम लेकर विलक्षण समझदारी का परिचय देता है। समस्याओं के समाधान के लिए साहसिक और अंतिम फैसले लेकर परिवार समाज राष्ट्र अथवा संगठन को नयी दिशा और गति देता है। वह निर्णयों का निर्माता होता है। वह अनेकों के बीच एक जाग्रत पुरूष होता है, जो अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाता है, उससे कभी मुंह नही मोड़ता है। इसलिए यह सूक्ति है-” जाग्रत पुरूष ही अपनी जिम्मेदारी निभाता है, मूर्ख नही। अत: जाग्रत पुरूष बनिये, परिवार, समाज राष्ट्र अथवा संगठन की शोभा बनिये’।
प्रेरणा ले आगे बढ़ै,
करे जीवन का कल्याण।
केवल अपना ही नही,
करते सृष्टि का त्राण ।। 957 ।।
व्याख्या :-
इस परिवर्तनशील संसार में घटनाएं होती रही हैं, हो रही हैं और होती रहेंगी, किंतु विपश्चित व्यक्ति अर्थात अग्रेय बुद्घिवाला व्यक्ति घटना का तात्त्विक विश्लेषण बड़ी सूक्ष्मता तथा सतर्कता से करता हुआ उसकी तह में जाता है और उससे प्रेरणा लेता है।
क्रमश:

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