आजादी के अमृत महोत्सव ने हमें याद दिलाए देश के प्रति अपने कर्तव्य

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ललित गर्ग

एक संकल्प लाखों संकल्पों का उजाला बांट सकता है यदि दृढ़-संकल्प लेने का साहसिक प्रयत्न कोई शुरू करे। अंधेरों, अवरोधों एवं अक्षमताओं से संघर्ष करने की एक सार्थक मुहिम हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में आजादी के अमृत महोत्सव के रूप में 12 मार्च 2021 को शुरू हुई थी।

इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस की 75वीं वर्षगांठ को भारत सरकार ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के तौर पर मना रही है। 15 अगस्त 1947 को भारत, ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र हुआ था। आजादी के 75 साल का ये जश्न 12 मार्च 2021 से शुरू हो चुका है जो 75 सप्ताह तक चलेगा। 15 अगस्त 2023, 78वें स्वतंत्रता दिवस पर अमृत महोत्सव का समापन होगा। इस दौरान भारत सरकार व राज्य सरकारों द्वारा देशवासियों की जनभागीदारी से अलग-अलग आयोजन किये जाएंगे। हजारों-हजारों सूर्यों से अधिक तेजस्वी भारत की स्वतंत्रता को लोक-जीवन में स्थापित किये जाने की आवश्यकता को महसूस करते हुए एक ओर आजादी के जश्न मनाये जायेंगे, जिसमें कुछ कर गुजरने की तमन्ना होगी तो अब तक कुछ न कर पाने की बेचैनी भी दिखाई देगी।

आजादी का अमृत महोत्सव भारत की विरल उपलब्धि है, हमारी जागती आंखों से देखे गये स्वप्नों को आकार देने का विश्वास है तो जीवन मूल्यों को सुरक्षित करने एवं नया भारत निर्मित करने की तीव्र तैयारी है। अब होने लगा है हमारी स्वतंत्र चेतना का अहसास। जिसमें आकार लेते वैयक्तिक, सामुदायिक, सामाजिक, राष्ट्रीय एवं वैश्विक अर्थ की सुनहरी छटाएं हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बहुत कुछ बदला मगर चेहरा बदलकर भी दिल नहीं बदला। विदेशी सत्ता की बेड़ियां टूटीं पर बन्दीपन के संस्कार नहीं मिट पाये और राष्ट्रीयता प्रश्नचिन्ह बनकर आदर्शों की दीवारों पर टंग गयी थी, उसे अब आकार लेते हुए देखा जा रहा है। जिस संकीर्णता, स्वार्थ, राजनीतिक विसंगतियों, आर्थिक अपराधों, शोषण, भ्रष्टाचार एवं जटिल सरकारी प्रक्रियाओं ने अनंत संभावनाओं एवं आजादी के वास्तविक अर्थों को धुंधला दिया था, अब उन सब अवरोधक स्थितियों से बाहर निकलते हुए हम अपना रास्ता स्वयं खोजते हुए न केवल नये रास्तों बल्कि आत्मनिर्भर भारत, नये भारत एवं सशक्त भारत के रास्तों पर अग्रसर हैं। अब आया है उपलब्धि भरा वर्तमान हमारी पकड़ में। अब लिखी जा रही है कि भारत की जमीन पर आजादी की वास्तविक इबारत।
एक संकल्प लाखों संकल्पों का उजाला बांट सकता है यदि दृढ़-संकल्प लेने का साहसिक प्रयत्न कोई शुरू करे। अंधेरों, अवरोधों एवं अक्षमताओं से संघर्ष करने की एक सार्थक मुहिम हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में आजादी के अमृत महोत्सव के रूप में 12 मार्च 2021 को शुरू हुई थी। उनके दूसरे प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सुखद एवं उपलब्धि भरी प्रतिध्वनियां सुनाई दे रही हैं। हमने मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के मन्दिर के शिलान्यास का दृश्य देखा। मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल में जता दिया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति वाली सरकार अपने फैसलों से कैसे देश की दशा-दिशा बदल सकती है, कैसे कोरोना जैसी महाव्याधि को परास्त करते हुए जनजीवन को सुरक्षित एवं स्वस्थ रख सकती है, कैसे महासंकट में भी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त होने से बचा सकती है, कैसे राष्ट्र की सीमाओं को सुरक्षित रखते हुए पड़ोसी देशों को चेता सकती है।
संघर्षों से जूझने की क्षमता भारत को अपने स्वतंत्रता के उदयकाल से ही प्राप्त है। इसके सामने आज तक जैसी परिस्थितियां उत्पन्न हुई हैं, अवरोध उपस्थित करने वाली शक्तियां उसके सामने टिकने का साहस नहीं कर पाईं। जिसको जन्मघूटी के साथ ही राष्ट्रीयता के संस्कार मिल जाये, वह कभी हार नहीं सकता, अपनी आजादी पर आने वाले हर खतरों एवं हमलों को परास्त करने की उसमें क्षमताएं हैं। आजाद भारत के निर्माताओं ने जिस सूझबूझ, कर्मठता, साहस के साथ परिस्थितियों से लोहा लिया, वह इतिहास का एक क्रांतिकारी पृष्ठ है। मोदी उसी पृष्ठ के एक चमकते राष्ट्रनायक हैं। स्वतंत्रता एवं सहअस्तित्व वाली मोदी की विदेश नीति इतनी स्पष्ट है कि आज दुनिया में भारत का परचम फहरा रही है। उनकी दृष्टि में कोरे हिन्दू की बात नहीं होती, ईसाई, मुसलमान, सिख की बात भी नहीं होती है, उनकी नजर में मुल्क की एकता सर्वोपरि है। उनके निर्णय उनके इतिहास, भूगोल, संस्कृति की पूर्ण जानकारी के आधार पर होते हैं।
हम महसूस कर रहे हैं कि निराशाओं के बीच आशाओं के दीप जलने लगे हैं, यह शुभ संकेत हैं। एक नई सभ्यता और एक नई संस्कृति करवट ले रही है। नये राजनीतिक मूल्यों, नये विचारों, नये इंसानी रिश्तों, नये सामाजिक संगठनों, नये रीति-रिवाजों और नयी जिंदगी की हवायें लिए हुए आजाद मुल्क की एक ऐसी गाथा लिखी जा रही है, जिसमें राष्ट्रीय चरित्र बनने लगा है, राष्ट्र सशक्त होने लगा है, न केवल भीतरी परिवेश में बल्कि दुनिया की नजरों में भारत अपनी एक स्वतंत्र हस्ती और पहचान लेकर उपस्थित है। चीन की दादागिरी और पाकिस्तान की दकियानूसी हरकतों को मुंहतोड़ जवाब पहली बार मिला है। किसी भी राष्ट्र की ऊंचाई वहां की इमारतों की ऊंचाई से नहीं मापी जाती बल्कि वहां के राष्ट्रनायक के चरित्र से मापी जाती है। उनके काम करने के तरीके से मापी जाती है।
आजादी के 75वें वर्ष में पहुंचते हुए हम अब वास्तविक आजादी का स्वाद चखने लगे हैं, आतंकवाद, जातिवाद, क्षेत्रीयवाद, अलगाववाद की कालिमा धुल गयी है, धर्म, भाषा, वर्ग, वर्ण और दलीय स्वार्थों के राजनीतिक विवादों पर भी नियंत्रण हो रहा है। इन नवनिर्माण के पदचिन्हों को स्थापित करते हुए कभी हम प्रधानमंत्री के मुख से कोरोना महामारी जैसे संकटों को मात देने की बात सुनते हैं तो कभी गांधी जयन्ती के अवसर पर स्वयं झाडू लेकर स्वच्छता अभियान का शुभारंभ करते हुए मोदी को देखते हैं। मोदी कभी विदेश की धरती पर हिन्दी में भाषण देकर राष्ट्रभाषा को गौरवान्वित करते हैं तो कभी “मेक इन इंडिया” का शंखनाद कर देश को न केवल शक्तिशाली बल्कि आत्म-निर्भर बनाने की ओर अग्रसर करते हैं। नई खोजों, दक्षता, कौशल विकास, बौद्धिक संपदा की रक्षा, रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन, श्रेष्ठ का निर्माण-ये और ऐसे अनेकों सपनों को आकार देकर सचमुच मोदीजी हमारी स्वतंत्रता को सुदीर्घ काल के बाद सार्थक अर्थ दे रहे हैं।

आजादी का यह उत्सव उन लोगों के लिए एक आह्वान है जो अकर्मण्य, आलसी, निठल्ले, हताश, सत्वहीन बनकर सिर्फ सफलता की ऊंचाइयों के सपने देखते हैं पर अपनी दुर्बलताओं को मिटाकर नयी जीवनशैली की शुरुआत का संकल्प नहीं स्वीकारते। इसीलिए आजादी के अमृत महोत्सव का यह जश्न एक संदेश है कि-हम जीवन से कभी पलायन न करें, जीवन को परिवर्तन दें, क्योंकि पलायन में मनुष्य के दामन पर बुजदिली का धब्बा लगता है जबकि परिवर्तन में विकास की संभावनाएं सही दिशा और दर्शन खोज लेती हैं। आजादी का दर्शन कहता है- जो आदमी आत्मविश्वास एवं अभय से जुड़ता है वह अकेले ही अनूठे कीर्तिमान स्थापित करने का साहस करता है। समय से पहले समय के साथ जीने की तैयारी का दूसरा नाम है स्वतंत्रता का बोध। दुनिया का कोई सिकंदर नहीं होता, वक्त सिकंदर होता है इसलिए जरूरी है कि हम वक्त के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना सीखें।
हमें राष्ट्रीय जीवन में नैतिकता एवं आत्मनिर्भरता को स्थापित करने के लिए समस्या के मूल को पकड़ना होगा। हम पत्तों और फूलों के सींचन पर ज्यादा विश्वास करते हैं, जड़ के अभिसिंचन की ओर कम ध्यान देते हैं इसलिए पत्र और पुष्प मुरझा जाते हैं। इसलिये हम आत्मनिर्भर नहीं हो पाए। नरेन्द्र मोदी समस्याओं के मूल को पकड़ने के लिये जद्दोजहद कर रहे हैं। वे पत्तों और फूलों को सींचने की बजाय जड़ को सींच रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां समस्यामुक्त जीवन जी सकें। आजादी के अमृत महोत्सव का उत्सव मनाते हुए यही कामना है कि पुरुषार्थ के हाथों भाग्य बदलने का गहरा आत्मविश्वास सुरक्षा पाये। एक के लिए सब, सबके लिए एक की विकास गंगा प्रवहमान हो। आजादी का सही अर्थ है स्वयं की पहचान, सुप्त शक्तियों का जागरण, आत्मनिर्भरता एवं वर्तमान क्षण में पुरुषार्थी जीवन जीने का अभ्यास।

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