13 अगस्त जयंती पर विशेष    :       माई एहों पूत जण जेंहो दुर्गादास

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माई एहों पूत जण जेंहो दुर्गादास
भारतीय इतिहास में वीर शिरोमणि दुर्गादास के नाम को कभी परिचय की आवश्यकता नहीं रही. मारवाड़ के इस वीरपुत्र और मातृभूमि पर अपने सम्पूर्ण जीवन को न्यौछावर कर देने वाले जुझारू यौद्धा को केवल मारवाड़ की धरती और सम्पूर्ण देश में फैले राठौर बंधू ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण हिंदू समाज और इस राष्ट्र का कण कण उन्हें याद करके धन्य हो उठता है. आज उनके जन्मदिवस पर पूरा देश और विशेषतः मारवाड़ की धरती इस महान यौद्धा को कृतज्ञतापूर्वक याद करके उसे नमन करती है. आज भी मारवाड़ के गाँवों में बड़े-बूढ़े लोग बहू-बेटी को आशीर्वाद स्वरूप यही दो शब्द कहते हैं और वीर दुर्गादास को याद करते है कि “माई ऐहा पूत जण जेहा दुर्गादास, बांध मरुधरा राखियो बिन खंभा आकाश” अर्थात् हे माता! तू वीर दुर्गादास जैसे पुत्र को जन्म दे जिसने मरुधरा (मारवाड़) को बिना किसी आधार के संगठन सूत्र में बांध कर रखा था. दुर्गादास को वीर दुर्गादास बनाने का श्रेय उसकी माँ मंगलावती को ही जाता है जिसने जन्मघुट्टी देते समय ही दुर्गादास को यह सीख दी थी कि “बेटा, मेरे धवल (उज्ज्वल सफेद) दूध पर कभी कायरता का काला दाग मत लगाना.”
मुगलों के दमनकारी कालखंड में जब13 अगस्त1638 को जोधपुर रियासत के सालवा कला में वीर दुर्गादास का जन्म हुआ. उस समय समृद्ध,संपन्न, और विशाल धनाड्य राज्य मारवाड़ का कोई स्वामी, सामंत या सेनापति नहीं था. चारों ओर औरंगजेब के कुटिल विश्वासघात की भेंट चढा समाज त्राहि त्राहि कर रहा था जनता कठोर दमन चक्र में फंसी थी. सर्वत्र आतंक लूट-खसोट, हिंसा और भय की विकराल काली घटा छाई थी. उस समय मारवाड़ ही नहीं पूरा भारत मुग़ल आक्रान्ताओं के अत्याचार, शोषण,दमन,जबरन धर्मांतरण,धर्म स्थलों ऊपर हमले और उनके खजानों को लूटने की घटनाओं को सहन कर कर के घोर आर्तनाद कर रहा था. भारत माता के छलनी आँचल की संकटमय स्थिति में वीर दुर्गादास राठौर के पौरुष और पराक्रम की आंधी चली. इस वीर की चमकती तलवार और अनथक परिश्रम का परिणाम था कि मारवाड़ आजाद हुआ और खुले आकाश में सुख की सांस लेने लगा. दुर्गादास एक ऐसे देशभक्त का नाम है जिनका जन्म से मृत्यु पर्यंत संघर्ष का जीवन रहा. इस बालक की कहानी ऐसे कठोर तप और कर्मयुद्ध की श्रेष्ठ कहानी है जो शिशु दुर्गादास व उसकी माँ को घर से निकालने से शुरू होती है.
जन्म से ही माँ के हाथ से निडरता की घुट्टी पीने वाला दुर्गादास अपनी इस जन्मजात निडरता के कारण ही महाराजा जसवंत सिंह का प्रमुख अंगरक्षक बन गया था और यही अंगरक्षक आगे चलकर उस समय संपूर्ण मारवाड़ का रक्षक बन गया था जब जोधपुर के महाराज जसवंत सिंह के इकलौते पुत्र पृथ्वीसिंह को औरंगजेब ने षड्यंत्र रचकर जहरीली पोशाक पहनाकर मार डाला. इस आघात को जसवंत सिंह नहीं सह सके और स्वयं भी मृत्यु को प्राप्त हो गए थे. इस अवसर का लाभ उठाते हुए औरंगजेब ने जोधपुर पर कब्जा कर लिया और सारे शहर में लूटपाट, आगजनी और कत्लेआम होने लगा और देखते ही देखते नगर को उजाड़ बना दिया गया. मारवाड़ के मूल निवासी भय और आतंक के मारे शहर छोड़ अन्यत्र चले गए थे. इस काल में ही हिंदु भूमि के मूल निवासियों पर इन बाहरी विदेशी आक्रमणकारी शासको ने शोषण की पराकाष्ठा स्वरुप औरंगजेब ने जजिया लगा दिया था; राजधानी जोधपुर सहित सारा मारवाड़ तब अनाथ हो गया था.
मारवाड़ के प्रतिष्ठित राजा पृथ्वी सिंह को कुटिलता पूर्वक धोखे से जहरीली पोशाक पहनाकर मारने की दुखद घटना के पश्चात जब रियासत के सरदारों ने मुग़ल आक्रांता औरंगजेब से से आग्रह किया कि वे पृथ्वीसिंह के पुत्र अजीतसिंह को मारवाड़ की गद्दी का उत्तराधिकारी स्वीकार करें तब औरंगज़ेब ने योजनापूर्वक ऐसा नहीं किया क्योंकि वह तो मारवाड़ को मुग़ल साम्राज्य में मिलाना चाहता था, अतएव उसने यह शर्त रखी कि अजीतसिंह मुसलमान बन जाएँ तो उसे मारवाड़ की गद्दी का उत्तराधिकारी माना जा सकता है. इस बात से नाराज वीर दुर्गादास ने वीरता पूर्वक औरंगज़ेब के समक्ष चुनौती प्रस्तुत कर दी और उससे युद्ध के लिए उद्दृत हो गए. तब मुग़ल आक्रांता और बर्बर शासक औरंगजेब ने अजीतसिंह और उसकी विधवा माँ को पकड़ने के लिए मुग़ल सैनिक भेजे, किन्तु चतुर वीर दुर्गादास ने औरंगज़ेब की यह चाल विफल कर दी. दुर्गादास ने कुछ राठौर सैनिकों को मुग़ल सैनिकों का सामना करने के लिए भेज दिया तथा स्वयं रानियों और शिशु को दिल्ली स्थित महल से निकालकर सुरक्षित जोधपुर ले गया. औरंगज़ेब ने जोधपुर पर क़ब्ज़ा करने के लिए विशाल मुग़ल सेना से हमला कर दिया तब 1680 में जो युद्ध हुआ, उस में मारवाड़ की तरफ से राठौरों का नेतृत्व दुर्गादास ने बड़ी ही बहादुरी से किया. दुर्गादास के कुशल और रणनीतिक चातुर्य का ही कमाल था कि औरंगज़ेब का पुत्र शहजादा अकबर राजपूतों से मिल गया. किन्तु वीर दुर्गादास के सामने समस्याएँ ही समस्याएँ थीं. सबसे बड़ी समस्या तो जहाँ भावी राजा के लालन-पालन व पढ़ाई-लिखाई की थी औरउनको औरंगजेब की नजरों से बचाने व उनकी सुरक्षा की थी. इतिहास साक्षी है कि दुर्गादास ने विपरीत परिस्थितियों में भी उनकी वे संपूर्ण व्यवस्थाएँ की. भले ही इस कार्य के संपादन में दुर्गादास को अपने माँ -भाई-बहनों, यहाँ तक कि पत्नी तक का भी बलिदान देना पड़ा. अरावली पर्वत श्रृंखला की वे कंदराएँ, गुफाएं और जंगल उन वीर और वीरांगनाओं के शौर्यपूर्ण बलिदान की साक्षियाँ दे रही हैं, जहाँ अजीत सिंह की सुरक्षा के लिए राठौरों योद्धाओं और वीर दुर्गादास के परिवार ने दुश्मनों से संघर्ष करते हुए उन्होंने अपने आपको बलिदान कर दिया था. इतिहास कुछ और होता यदि मराठा राजा सम्भा जी ने वीर दुर्गादास का कहा मानकर मुगलों से संघर्ष की राह पकड़ी होती किन्तु खेद कि ऐसा हो न पाया. दक्षिण में शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजी से मिलकर और पंजाब के गुरुओं का आशीर्वाद लेकर संगठित रूप में परकीय सत्ता को उखाड़ फेंकने की योजना थी दुर्गादास की. परंतु औरंगजेब की पौत्री सिफतुन्निसा के प्रेम में पड़कर राजा अजीत सिंह ने अपने ही संरक्षक का निष्कासन करके इतिहास में काला धब्बा लगा दिया. किन्तु धन्य है वीरवर दुर्गादास जिन्होंने उस वक्त भी अजीत सिंह को आशीर्वाद और मंगलकामना करते हुए ही वन की ओर प्रस्थान किया था. उज्जैन में क्षिप्रा के तट पर 22 नवम्बर 1718 को इस महान देशभक्त ने अंतिम सांस ली.
वीर शिरोमणि दुर्गादास कहीं के राजा या महाराजा नहीं थे परंतु उनके चरित्र की महानता इतनी ऊंची उठ गई थी कि वह अनेक पृथ्वीपालों,प्रजापतियों,राजों,महाराजोंऔर सम्राटों से भी ऊंचे हो गये और उनका यश तो स्वयं उनसे भी ऊंचा होकर अजर अमर गाथा बन गया है. आज उनकी जयंती के अवसर पर उन्हें सादर नमन,प्रणाम और कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से पुण्य स्मरण.

 


प्रवीण गुगनानी, guni.pra@gmail.com

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