अग्नि कोख में पलती अम्मा
़ संजय पंकज

चूल्हा हो या हो घर आँगन
सब में खटती जलती अम्मा !
धूप संग दिन रात उसी के
जिसमें जलती गलती अम्मा !
खुली देहरी हवा बाहरी
जब भी घर के प्रतिकूल गई
असमय देख पसीने माथे
अम्मा अपना दुख भूल गई
बिस्तर से बिस्तर तक पहुँची
तब तक केवल चलती अम्मा !
कभी द्वार से लौट न पाए
कोई भी अपने – बेगाने
घर भर में हिम बोती है जो
उसके हिस्से झिड़की ताने
गोमुख की गंगा होकर भी
अग्नि-कोख में पलती अम्मा !
कैसी भी हो विपदा चाहे
उम्मीद दुआओं की उसको
बिना थके ही बहते रहना
सौगंध हवाओं की उसको
चंदा-सा उगने से पहले
सूरज जैसी ढलती अम्मा !
पीर-पादरी-पंडित-मुल्ला
मंदिर-मस्जिद औ’ गुरुद्वारे
हाथ उठाए आँचल फैला
माँग रही क्या साँझ-सकारे
वृक्ष-नदी-गिरि शीश झुकाती
जितना झुकती फलती अम्मा !
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