उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के भीतर कुछ हलचल तो है ?

images (10)

रतिभान त्रिपाठी
नेतृत्व किसका होगा, इस पर किसी भी बड़े नेता ने जुबान नहीं खोली है। ऐसे में यह भाजपा का बैकवर्ड-फारवर्ड तिलिस्म भी हो सकता है, जिसे भेद पाना कोई साधारण बात नहीं। भाजपा ऐसे प्रयोग पहले से करती रही है। कई राज्यों में इसके उदाहरण हैं। इस विषय पर मीडिया अपनी माथापच्ची कर रहा है तो विपक्ष अपने तरीके से टांगखिंचाई में लगा हुआ है। सहयोगी पार्टियां अपने हितसाधन में लगी हुई हैं।

राजनीतिक पार्टी है तो राजनीति होगी ही। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के भीतर कुछ हलचल तो है। भाजपा के नेताओं और स्वयंसेवक संघ के महत्वपूर्ण पदाधिकारियों की दिल्ली और लखनऊ के बीच बढ़ रही आवाजाही अंदरखाने की हलचल के सुबूत के तौर पर मानी जा रही है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर पिछले एक पखवाड़े में जिस तरह से बयानबाजी और पार्टी की बैठकें चली हैं, उनसे साफ है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को लेकर फिलहाल भले ही कोई चुनौती नहीं है लेकिन अन्य नेताओं के मन में नेतृत्व की महत्वाकांक्षाएं भी स्वाभाविक रूप से हैं। ‘बात निकली है तो दूर तलक जाएगी, लोग चेहरे पे उदासी का सबब पूछेंगे, और ये पूछेंगे कि तुम इतना परेशां क्यूं हो।’ यह शेर इन दिनों उत्तर प्रदेश की राजनीति में मौजूं हो चला है। भाजपा का अनुशासन इतना तगड़ा है कि कोई खुलकर कुछ बोल नहीं रहा है लेकिन ऐसे सवालों पर भाजपा नेताओं के चेहरे पर एक रहस्यमय मुस्कान उभरती जरूर है।

कोई खुलकर कहे न कहे लेकिन बैकवर्ड बनाम फारवर्ड नेतृत्व भी एक मुद्दा है, जैसा कि पूरे देश में और लगभग हर बड़ी पार्टी में यह दिखता भी है। और उत्तर प्रदेश में यह मुद्दा वैसे भी कम करके नहीं आंका जा सकता क्योंकि भारतीय जनता पार्टी भी इसी के इर्द-गिर्द राजनीति करती दिखी है। मंडल कमीशन की चर्चा और उसके लागू होने के बाद उत्तर प्रदेश में पिछले बत्तीस सालों से हर राजनीतिक पार्टी बैकवर्ड कार्ड के जरिए अपनी राजनीतिक कलाबाजी करती रही है। पहले समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव पिछड़ों की राजनीति के अलमबरदार बनकर उभरे जरूर लेकिन भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व ने यह ताड़ लिया तो अपनी पहली ही सरकार में कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाकर बैठा दिया, जो पिछड़े समुदाय से आते हैं। हालांकि मुलायम सिंह यादव का खेमा कभी यह मानने को तैयार नहीं हुआ कि भारतीय जनता पार्टी पिछड़ों का नेतृत्व करती है या कर सकती है। यह खेमा हमेशा यही कहता रहा कि भाजपा तो अगड़ों की पार्टी है। इसके लिए वह तरह-तरह की दलीलें देता रहा लेकिन अपने रीति-नीति के हिसाब से भाजपा इसका जवाब देती रही है।

पिछले बत्तीस सालों के कालखंड में भारतीय जनता पार्टी को जनता ने पांच बार अपने मुख्यमंत्री बनाने का अवसर दिया, जिनमें शुरुआत में दो बार कल्याण सिंह और फिर राजनाथ सिंह, रामप्रकाश गुप्ता व योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया। जाति और वर्ग के हिसाब से देखा जाए तो दो बार बैकवर्ड लोध जाति, दो बार ठाकुर व एक बार वैश्य वर्ग से मुख्यमंत्री बनाए गए। वैसे भाजपा का चरित्र जातिवादी नहीं रहा है लेकिन देश, काल और परिस्थिति के अनुसार समय-समय पर उसे जातीय या फिर वर्गीय ढांचे का इस्तेमाल करने को मजबूर होना पड़ा। जैसा कि मंडल कमीशन के बाद कांग्रेस भी यही करती नजर आई है।

उत्तर प्रदेश के संदर्भ में बात करें तो करीब साढ़े चार साल पहले जब यहां विधानसभा चुनाव हुए तो उस समय की परिस्थितियों के अनुसार भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य को पार्टी का उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष बनाकर चुनाव लड़ा। आगे की समस्याएं और संदर्भ देखते हुए पार्टी या उसके पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसे भी मानें, ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बना दिया। लेकिन जैसा कि परंपरागत रूप से माना जाता है कि नेतृत्व घोषित हो न हो, प्रदेश अध्यक्ष को ही मुख्यमंत्री पद का सहज दावेदार माना जाता है। ऐसे में केशव प्रसाद मौर्य के मन में उस पद की महत्वाकांक्षा जागना अस्वाभाविक नहीं था। पार्टी या संघ को उत्तर प्रदेश में राम मंदिर और अन्य मुद्दों के हिसाब से उस समय योगी आदित्यनाथ ही उपयुक्त लगे होंगे, तभी उन्हें यह दायित्व दिया गया था।

मुख्यमंत्री बनाए जाने पर योगी आदित्यनाथ ने खुद को समर्थ साबित करने की कोशिश की। अनेक क्षेत्रों में काम करते हुए उत्तर प्रदेश को कई मामलों में नंबर वन बनाया। उन्होंने गुजरात मॉडल की तर्ज पर यूपी मॉडल खड़ा किया। लेकिन उनकी सरकार में उप मुख्यमंत्री होते हुए भी केशव प्रसाद मौर्य ने खुद को अप्रासंगिक नहीं होने दिया। खुद तो ताकतवर बने ही रहे, पिछड़ों को भी जोड़ते हुए पार्टी की ताकत बनाए रखी। ऐसा माना जाता है कि इसके पीछे पार्टी की ही रणनीति रही होगी। हालांकि पिछड़ा कार्ड चलते हुए भाजपा ने एक बार फिर कुर्मी बिरादरी से स्वतंत्रदेव सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया लेकिन वह कुछ कमाल दिखा नहीं पाए।

भाजपा का पिछड़ा समुदाय केशव प्रसाद के ही इर्द-गिर्द घूमता नजर आया। पार्टी में अब भी वह उन्हें ही अपना स्वाभाविक नेता मानता है। ऐसे में जब आगे चुनाव की बात शुरू हो और नेतृत्व का सवाल उठे तो पार्टी के भीतर जब बैकवर्ड बनाम फारवर्ड का खेल शुरू होना ही है। भाजपा यही दिखाना भी चाहती होगी। पार्टी हाईकमान योगी आदित्यनाथ का उपयोग तो करना चाहता है लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बुनावट के हिसाब से बैकवर्ड कार्ड भी हाथ से जाने नहीं देना चाहता। इन हालात में पार्टी नेतृत्व को केशव प्रसाद मौर्य ही बैकवर्ड नेता के रूप में नजर आते हैं।

अब आते हैं हाल की बयानबाजी पर जब केशव प्रसाद मौर्य बरेली पहुंचकर यह कहते हैं कि अगला नेता कौन होगा, यह पार्टी का संसदीय बोर्ड तय करेगा। इसके बाद देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का बयान आता है कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को कोई चुनौती है क्या? इस पर चर्चा चल ही रही थी एक-दो दिन बाद पार्टी में पिछड़ों के एक और नेता स्वामी प्रसाद मौर्य बयान देते हैं कि चुनाव किसके नेतृत्व में होगा या चुनाव बाद नेता कौन होगा, यह पार्टी का संसदीय बोर्ड तय करेगा।

यानी स्वामी प्रसाद एक तरह से केशव प्रसाद मौर्य के सुर में सुर मिलाते नजर आते हैं। यह बयानबाजी वायरल हो ही रही थी कि पूर्व नौकरशाह और एमएलसी अरविंद कुमार शर्मा जो भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष भी बना दिए गए हैं, की एक चिठ्ठी सोशल मीडिया पर तैरने लगती है। यह चिठ्ठी प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह को लिखी गई है। चिठ्ठी का मजमून यह है कि अगला चुनाव योगी आदित्यनाथ और स्वतंत्र देव के नेतृत्व में होगा। उसमें यह बात भी शामिल है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता 2013-14 की तरह अब भी बरकरार है। राजनीतिक पंडित इसका कुछ और ही मतलब निकालते हुए नजर आ रहे हैं।

इसी दौरान संघ के बड़े-बड़े नेता प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में बैठकें करके अपनी अलग रणनीति बना रहे हैं तो भाजपा के बड़े-बड़े नेता बीएल संतोष, राधा मोहन सिंह व अन्य इन दिनों लखनऊ में बैठक पर बैठक करते दिख रहे हैं।

आशीर्वाद समारोह के बहाने केशव प्रसाद मौर्य के घर संघ के नेता कृष्ण गोपाल, दत्तात्रेय होसबोले, अनिल कुमार का पहुंचना, इस मौके पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पहली बार अपने पड़ोसी के घर जाना आदि बातें भी राजनीतिक चश्मे से ही देखी गईं। लेकिन नेतृत्व किसका होगा, इस पर किसी भी बड़े नेता ने जुबान नहीं खोली है। ऐसे में यह भाजपा का बैकवर्ड-फारवर्ड तिलिस्म भी हो सकता है, जिसे भेद पाना कोई साधारण बात नहीं। भाजपा ऐसे प्रयोग पहले से करती रही है। कई राज्यों में इसके उदाहरण हैं। इस विषय पर मीडिया अपनी माथापच्ची कर रहा है तो विपक्ष अपने तरीके से टांगखिंचाई में लगा हुआ है। सहयोगी पार्टियां अपने हितसाधन में लगी हुई हैं। उप मुख्यमंत्री बनने से लेकर बारी-बारी मुख्यमंत्री बनने तक उनकी अपनी सौदेबाजी चल रही है। यानी कुल मिलाकर यह चुनावी चकल्लस है। ऐसे माहौल में दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी उत्तर प्रदेश में चुनावी नेतृत्व या अगले नेतृत्व पर क्या खेल दिखाएगी, यह समझ पाना फिलहाल दूर की कौड़ी है।

Comment:

vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betamiral giriş
betamiral giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
galabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betamiral giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betkare giriş
noktabet giriş
betsat giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betorder giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
galabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
galabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betasus giriş
betplay giriş
betplay giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
betasus giriş
betkare giriş
betkare giriş
noktabet giriş
restbet güncel
imajbet giriş
imajbet güncel giriş
betparibu giriş
betparibu giriş
betnano giriş
betparibu giriş
betparibu giriş
fikstürbet giriş
fiksturbet giriş
fiksturbet
betplay giriş
betplay
betplay giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betplay giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betkare giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
biabet giriş
betnano giriş
betparibu giriş
efesbet giriş
efesbetcasino giriş
efesbetcasino giriş
maxwin giriş
betnano giriş
betnano giriş