क्या मोदी और शाह का आभामंडल पार्टी के अंदर कमजोर हुआ है ?

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अवधेश कुमार

नरेंद्र मोदी सरकार और बीजेपी इस समय जिन विकट परिस्थितियों और कठिन चुनौतियां से घिरी है कुछ महीनों पूर्व तक उसकी कल्पना नहीं थी। आप सोचिए, सामान्य स्थिति में अगर तृणमूल कांग्रेस के नेता दावा करते कि बीजेपी के अनेक विधायक, सांसद और नेता हमारे संपर्क में हैं और वे शीघ्र पार्टी में शामिल होंगे तो बीजेपी का प्रत्युत्तर कैसा होता? मुकुल रॉय को तृणमूल से लाकर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया, वे पार्टी छोड़ कर चले गए। बीजेपी न उनको रोक सकी और न ठीक से प्रतिवाद कर रही है। यह मुद्रा मोदी और शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी के चरित्र के बिल्कुल विपरीत है। ऐसा लगता है जैसे पार्टी कुछ ऐसी औषधियां ले चुकी है जिससे शारीरिक और मानसिक रूप से सुन्न की अवस्था में है। कर्नाटक में मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा के खिलाफ असंतोष सिर से ऊपर जाता दिखा तो केंद्र से अरुण सिंह को भेजना पड़ा। यह नौबत आनी ही नहीं चाहिए थी। उत्तर प्रदेश में केंद्रीय नेतृत्व द्वारा स्पष्ट संकेत दे दिए जाने के बावजूद कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही विधानसभा चुनाव लड़ा जाएगा, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य कह रहे हैं कि नेतृत्व का फैसला केंद्र करेगा।

अन्य पार्टियों के लिए यह सामान्य घटना हो सकती है लेकिन वर्तमान बीजेपी के लिए नहीं। मोदी के शीर्ष पर आने के बाद ऐसा लगा जैसे बीजेपी का कायाकल्प हो गया है। न असंतोष के सार्वजनिक स्वर, न चिल्ल पों, न दिल्ली आकर केंद्रीय नेतृत्व से कोई बड़ी शिकायत। सच कहा जाए तो मार्च तक सरकार और पार्टी दोनों स्तरों पर निश्चिंतता का का माहौल था। नेतृत्व मान चुका था कि लंबे समय तक किसी बड़ी राजनीतिक चुनौती का सामना नहीं करना पड़ेगा। हालांकि यह कहना ठीक नहीं है कि मोदी और शाह का आभामंडल पार्टी के अंदर कमजोर हुआ है लेकिन कोरोना की दूसरी लहर और बंगाल चुनाव परिणाम ने नेतृत्व, सरकार और पार्टी को लेकर समर्थकों के भीतर धारणा, मनोविज्ञान और व्यवहार के स्तर पर बहुत कुछ बदल दिया है। यह स्थिति विदेशों में भी है। भारत की सीमाओं से परे संपूर्ण विश्व में नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत छवि पिछली कई सरकारों से ज्यादा सकारात्मक रही है लेकिन कोरोना संकट के समय स्वास्थ्य ढांचे की जो विकृत तस्वीर उभरी, उसने मोदी और सरकार दोनों की छवि पर गहरा आघात है।

विरोधी इसका हरसंभव लाभ उठाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। यह सही है या गलत, इस पर दो राय हो सकती है लेकिन जब देश में विचारधारा और राजनीति की आर-पार की लड़ाई हो रही है तो विरोधी ऐसा करेंगे। आप भी ऐसा करते रहे हैं। अगर चुनाव के पहले आपने तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के लिए दरवाजा खोला तो सत्ता में आने के बाद वह भी अपने तरीके से प्रतिघात करेगी। बीजेपी की दृष्टि से फिर यहां यह मूल प्रश्न उठाना होगा कि आखिर कुछ महीने पहले तक व्यवस्थित राजनीति करती, अपने समर्थकों का उत्साह बनाए रखने में सफल दिख रही पार्टी से चूक कहां हो गई?

कुछ बातें साफ दिखती हैं। मसलन, पश्चिम बंगाल में अपेक्षित सफलता न मिलने के बाद क्या होगा इसका आकलन पार्टी ने नहीं किया। जब आकलन नहीं किया तो उसके प्रत्युत्तर की तैयारी भी नहीं की गई। दूसरे, कोरोना फिर हमला कर सकता है इसके बारे में तो पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता लेकिन स्वास्थ्य सेवा प्रबंधन और राजनीतिक प्रबंधन की तैयारी होनी चाहिए थी। अगर आपने पूर्वानुमान नहीं लगाया कि परिस्थितियां कठिन या विपरीत होने पर विरोधी पूरी शक्ति से हमलावर होंगे तो इसे साधारण चूक नहीं माना जा सकता।

आज की स्थिति में दलीय और गैर दलीय विरोधियों के अंदर यह विश्वास मजबूत हुआ है कि संगठित अभियान जारी रखें तो मोदी सरकार और बीजेपी को विचलित और पराजित किया जा सकता है। अगर विरोधियों का आत्मविश्वास मजबूत हो तो मुकाबला करना कठिन हो जाता है। कोई भी पार्टी इन परिस्थितियों का मुकाबला अपने समर्थकों व कार्यकर्ताओं के बल पर ही कर सकती है। बीजेपी इस स्तर पर भी कठिन दौर से गुजर रही है। बीजेपी समर्थकों में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है जो तथ्यों और विचारों पर ध्यान देने के बजाय भावुकता में फैसला करते हैं। चुनाव के ठीक बाद बंगाल की वर्तमान परिस्थितियों में राष्ट्रपति शासन नहीं लग सकता है, न कोई दूसरी संवैधानिक कार्रवाई हो सकती है लेकिन उनके ऐसे समर्थकों की सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देख लें। वे कह रहे हैं कि ऐसी कमजोर सरकार नहीं देखी, आखिर धारा 356 क्यों है, मोदी और शाह ने वोट लेकर कार्यकर्ताओं को मरने के लिए छोड़ दिया है…, ऐसी पार्टी को समर्थन देने का कोई मतलब नहीं आदि-आदि। जब राजनीतिक सेनानी ही मोर्चा लेने को तैयार नहीं तो लड़ाई सफलता की ओर अग्रसर कैसे होगी?

कोरोना के कारण पिछले वर्ष उत्पन्न परिस्थितियों व कृषि कानून विरोधी आंदोलन में विरोधियों के तेवर से सत्तारूढ़ होने के नाते बीजेपी को चौकन्ना हो जाना चाहिए था। उसे व्यवस्था करनी चाहिए थी कि अगर भविष्य में कोरोना या किसी अन्य संकट को संभालने में सरकार उलझे तो पार्टी राजनीतिक समस्याओं व चुनौतियों को स्वाभाविक तरीके से संभाल सके। इसके लिए उसे मोदी और शाह का मुंह ताकने की आवश्यकता ना हो।

सामान्य प्रबंधन काफी नहीं
राज्यों में पार्टी नेतृत्व के विरुद्ध असंतोष तो फिर भी संभल जाएगा लेकिन इसके परे परिस्थितियां सामान्य प्रबंधन से संभालने की सीमा से बाहर निकल चुकी है। आज का सच यही है कि पार्टी अब तक हुई क्षति को नियंत्रित करने में सफल नहीं है। ऐसे में लगता नहीं कि बगैर शौक थेरपी के बीजेपी संभल पाएगी। वास्तव में सरकार और बीजेपी के साथ मोदी और शाह के लिए उत्पन्न चुनौतियां आपातस्थिति के बहुस्तरीय प्रबंधन और लंबे समय की सुनियोजित प्रखर सक्रियता की मांग कर रही हैं और इसके लिए शॉक थेरपी आवश्यक लग रहा है।

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