तो क्या ‘हीरों’ के लिए इतने बड़े हरे जंगल को नष्ट कर देंगे ?

सौरभ जैन

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिला स्थित बकस्वाहा के जंगल में पिछले दिनों देश का सबसे बड़ा हीरा भंडार होने की खबर सामने आई। हीरे के इस भंडार को पाने के लिए अब वहां के 382.131 हेक्टेयर जंगल को खत्म करने की योजना है। बकस्वाहा के इस जंगल को बचाने के लिए सोशल मीडिया मंचों पर पर्यावरण प्रेमी इन दिनों मुहिम चला रहे हैं।

बकस्वाहा के जंगलों में 3.42 करोड़ कैरेट हीरा होने का अनुमान लगाया जा रहा है। अब तक तो मध्य प्रदेश के पन्ना की खदानों को देश का सबसे बड़ा हीरा भंडार होने का गौरव प्राप्त था। पन्ना में तकरीबन 22 लाख कैरेट हीरे हैं, जिनमें से 13 लाख कैरेट निकाले जा चुके है। पन्ना की तुलना में बकस्वाहा में 15 गुना ज्यादा हीरा निकलने का अनुमान है। बकस्वाहा जंगल में वन विभाग द्वारा की गई पेड़ों की गिनती के अनुसार पेड़ों की संख्या 2,15,875 है। इनमें 40 हजार पेड़ तो सागौन के ही हैं। इसके अलावा केम, पीपल, तेंदू, जामुन, बहेड़ा, अर्जुन जैसे औषधीय पेड़ भी हैं।

वन रिपोर्ट 2019 के अनुसार देश का सबसे बड़ा वन क्षेत्र वाला राज्य मध्य प्रदेश है। इसका वन क्षेत्रफल 77,482 वर्ग किलोमीटर है। बकस्वाहा का सघन वन से घिरा यह क्षेत्र जैव विविधता से भी परिपूर्ण है। एमपी जियोलॉजी एंड माइनिंग और रियो टिंटो कंपनी की रिपोर्ट (2017) में इस क्षेत्र में तेंदुआ, भालू, बारहसिंगा, हिरण, मोर सहित कई वन्य प्राणियों के मौजूद होने की बात कही गई थी। इतना ही नहीं इस क्षेत्र में लुप्त हो रहे गिद्ध के भी होने की बात कही गई थी। मगर दिसंबर, 2020 में छतरपुर वन विभाग अधिकारियों ने जो रिपोर्ट दी, उसमें यह सारे जाने कहां गायब हो गए। मतलब यह कि जब हीरे नहीं थे, तो जंगल में सारे पशु-पक्षी थे, लेकिन हीरा भंडार सामने आते ही जीव-जंतु खुद-ब-खुद यहां से हट गए कि हीरा खनन के नियमों में वे रुकावट न बनें।

बकस्वाहा में सबसे बड़ा हीरा भंडार मिलने की खबर जरूर हाल की है, मगर हीरा भंडार की खोज के प्रयास वहां दो दशक से चल रहे हैं। इस स्थान का सर्वे सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया की कंपनी रियो टिंटो ने किया था। यह वही कंपनी है, जिसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की वजह से इसके अपने देश में ब्लैक लिस्टेड किया जा चुका था। सर्वेक्षण के दौरान नाले के किनारे किंबरलाइट पत्थर की चट्टान मिलने से हीरा भंडार होने की संभावनाओं का जन्म हुआ। एक दशक बाद मई, 2013 में कंपनी सर्वे के लिए यहां आई और बिना किसी से पूछे ही 800 से हरे पेड़ काट डाले। इस घटना पर वन विभाग ने उसके तीन ट्रैक्टर जब्त किए थे। मई, 2017 में संशोधित प्रस्ताव पर पर्यावरण मंत्रालय के अंतिम फैसले से पहले ही कंपनी ने यहां काम करने से इनकार कर दिया था।

रियो टिंटो के इनकार के बाद राज्य की सरकार ने इस जंगल में खनन के लिए नई नीलामी करते हुए सबसे अधिक बोली लगाने वाली एस्सेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड को यह जमीन 50 साल की लीज पर दे दी है। अब सरकार 62.64 हेक्टेयर जंगल को चिह्नित कर खदान बनाने के लिए देना चाहती है, जबकि कंपनी की डिमांड जंगल के 382.131 हेक्टेयर की है, ताकि बाकी 205 हेक्टेयर जमीन पर वह खदानों से निकले मलबे को डंप कर सके।

2500 करोड़ रुपए निवेश वाले इस प्रॉजेक्ट में कई सवाल खड़े हो रहे हैं। अधिकारियों ने बकस्वाहा तहसील में ही 382.131 हेक्टेयर राजस्व जमीन को वनभूमि में डायवर्ट करने का प्रस्ताव दिया है। 2.15 लाख पेड़ वाले इस जंगल को खत्म करके नया जंगल बसाने की योजना किसी सब्जबाग से कम नहीं लगती। नए क्षेत्र में पेड़ लगाने की बातों में कितनी सचाई होगी, इस बात का अंदाजा प्रदेश में 2017 में नर्मदा किनारे छह करोड़ पौधे लगाने के दावे से समझा जा सकता है। वन विभाग के सर्वे में इन पौधों में से 80 फीसदी के मुरझाने की बातें सामने आ चुकी है। जाहिर है, जमीन से अधिक कागजों पर पौधारोपण हुआ।

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