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बिसोन्दू का यह सघन हरा भरा वृक्ष ग्रेटर नोएडा के बूढ़े मकोड़ा गांव की निशानी स्थल पर खड़ा हुआ है। बिशोन्दू का यह वृक्ष दिल्ली एनसीआर का कल्पवृक्ष है इसकी पत्तियां छोटी नुकीली होती हैं। भयंकर गरम सूखे वातावरण में भी हरा-भरा रहता है जैसे ही सावन लगता है इसके जामुन के आकार के फल पकने लगते हैं जिसे सदियों से ग्रामीण हाथ पैरों के फंगल बैक्टीरियल इन्फेक्शन में इस्तेमाल करते थे बहुत रामबाण इलाज है तमाम त्वचा के संक्रमण में यदि मैं कहूं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ब्लैक फंगस का भी इलाज इस पर अनुसंधान से हासिल किया जा सकता है।

आज जहां यह पेड़ खड़ा हुआ है ग्रेटर नोएडा एक अन्य बड़े गांव साकीपुर से निकल कर उसके आदिम पूर्वजों ने सबसे पहला मकोड़ा गांव इसी वृक्ष के आसपास आबाद हुआ था जिसे बूढ़ा मकोड़ा कहते हैं फिर मकोड़ा गांव बसा। आज बूढे मकोड़ा गांव में कोई आबादी नहीं है केवल खेती की बची ही कुछ जमीन है मूल आबादी मकोड़ा गांव में ही रहती है। गांवो के बसने उजड़ने का इतिहास बड़ा ही रोचक तो कभी-कभी त्रासदी पूर्ण भी होता है कभी प्राकृतिक आपदाएं इसमें कारण बनती थी तो कभी गांव के संस्थापक सांझे पूर्वजों दो भाइयों परिवार समूह का विवाद इसमें कारण बन जाता था। पहले विवादों में गांव बट जाते थे अब तो केवल परिवार ही प्रभावित होते हैं।साकीपुर गौतम बुध नगर के बांगर हिस्से में है लेकिन साकीपुर से 5 ,6 और गाँव निकले जो खादर की भूमि में बसे। मूल गांव से निकलकर जब कोई गांव उल्लेखनीय दूरी पर बसता है तो उस गांव का नाम भी उस गांव के संस्थापक परिवर्तित कर देते थे लेकिन जब ऐसा स्थापित गाँव किसी अनाहक कारणों से कुछ ही समय अंतराल में उसे विस्थापित करना पड़ता था तो गांव के नाम पर कोई परिवर्तन नहीं होता था केवल मूल गांव के साथ बूढ़ा गाँव विशेषण के तौर पर जोड़ दिया जाता था। गौतम बुध नगर में ऐसा ही अजीब संयोग कासना मंडल के घरबरा गांव तथा बूढ़ा घरबरा गांव के बीच मिलता है लेकिन जहां बुढे मकोड़ा गांव में कोई इंसानियत आबादी मानव निर्मित सरचना नहीं है वही बूढ़े घरबरा गाव में आबादी है। बूढ़ा घरबरा गांव चारों ओर से हजारों बबूल के वृक्षों के बीच छुपा हुआ एक गांव है जिसकी एक सीमा कासना इंडस्ट्रियल एरिया से मिलती है। ऐसा ही एक अजीब गौरवशाली किस्सा जो सत्य है मेरे गांव तिलपता करनवास से जुड़ा हुआ है । करणवास गांव जिसको शताब्दियों पहले उसके मूल निवासी भूमिहार ब्राह्मण त्यागी समाज के लोग उसे छोड़कर पलायन कर गए थे यह गांव खारी गोत्र की गुर्जरों को सौंप दिया था खारी गोत्र के गुर्जरों ने उस गांव में ना बस कर अपना नवीन गांव 14वीं शताब्दी में बसाया था जो आज का तिलपता गाँव है सच्चाई तो यह है पश्चिम उत्तर प्रदेश के अधिकांश गांव भूमिहार अयाचक गौड ब्राह्मणों के गाँव थे जिसके विषय में कहा जाता है यह गांव पांडवों के वंशज जनमेजय ने नागयज्ञ में ब्राह्मणों को दान में दिए थे गुर्जर जाट जैसे समुदाय पश्चिम भारत राजस्थान गुजरात से आकर यहां कालांतर में आबाद हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में त्यागी लैंड सिमटता चला गया, जाट गुर्जर लैंड बढ़ता चला गया जाट गुर्जर अन्य समुदायों का यह प्रवास 10 वीं शताब्दी के बाद ही पश्चिम भारत से दिल्ली एनसीआर गंगा यमुना के खादर में हुआ है अधिकांश। बहरहाल करणवास गांव जिसके पुरातात्विक अवशेष आज भी खोदना खुर्द तिलपता गांव के बीच मैं मिलते हैं मिट्टी के पात्र अवशेष जिस में शामिल है। हमारे पूर्वज ने जब अपना नया गांव बसाया तो मूल गांव करनवास के सम्मान में उसके टाइटल को अपने नवीन गांव के साथ जोड़ लिया तो नया नाम मिला तिलपता करनवास।करनवास गांव किसी प्राकृतिक आपदा में नहीं उजडा था यह दो समुदायों के बीच एक सामाजिक अनुबंध था। करनवासवास गांव के त्यागीयो को गाजियाबाद के मोरटा गाव जमीदार रहीस तंग करता था कनवास ग्राम की त्यागीयो की बेटी जो उसके साथ ब्याई हुई थी उस के साथ दुर्व्यवहार करता था करनवास गांव के त्यागीयो ने प्रवासी हमारे पूर्वजों से अनुरोध किया कि आप हमें उस के आतंक से मुक्ति दिलाई तो खारी गोत्र के गुर्जरों ने उस दुष्ट त्यागी जमीदार रहीस को सबक सिखाया उसका वध किया प्रजा को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। इस घटनाक्रम के पश्चात कनवास गांव के त्यागी समाज के मन में यह गैर वाजिब आशंका घर कर गई यह लोग जब उस दुष्ट को सबक सिखाते सकते हैं तो हम यदि भविष्य में इनकी रीति नीति के अनुसार नहीं चले तो कहीं हमारा भी यह अंजाम ना हो जाए अनावश्यक आशंका से उन्होंने रातों-रात गांव खाली कर दिया। स्वाभिमानी बहादुर क्षत्रिय खारी गोत्रीय गुर्जरों ने भी ऐसे त्यागे हुए गांव में बसना उचित नहीं समझा अपना अलग गाव 14 वीं शताब्दी में तिलपता बसाया केवल करणवास उस गांव के नाम को ही अपने गांव के साथ प्रयोग किया। 3 वर्ष पश्चात ही पड़ोसी का पल्ला से अपनी फूफी के लड़के जो भाटी गोत्र का गुर्जर था उसे बुला लिया आज दोनों ही गोत्र के गुर्जर गांव में मिल जुल कर रहते हैं दोनों ही गोत्र में भाईचारा है तिलपता के खारी भाटी गोत्र के गुर्जर विवाह संबंध में एक दूसरे के गोत्र को सम्मान देते हुए बचाते हैं अर्थात दोनों के लिए एक दूसरे के गोत्र में नातेदारी स्थापित करना नैतिक तौर पर वर्जित है यह 700 साल पुरानी परंपरा है नैतिक चारित्रिक पतन के आज के युग में यह विवाह संबंध से जुड़ी हुई परंपरा कितनी व्यवहारिक अव्यवहारिक सुविधाजनक या परेशान जनक है समाजशास्त्रीय तौर पर यह अलग चर्चा चिंतन का विषय हो सकता है। एक्स एक्स एक्स करवा काम में कनवास काम भी तड़पता के साथ सरकार के राजस्व अभिलेखों में दर्ज है लेकिन हमारे गांव का पड़ोसी गांव श्यौराजपुर अनूठा गांव है इस गांव का आज भी सरकारी अभिलेख में कोई उल्लेख नहीं है कर संग्रह भूमि सुधार बंदोबस्त के राजस्व दस्तावेजों में। अर्थात वैधानिक दस्तावेज साक्षी इस गांव का कोई नहीं है लेकिन मौके पर जीता जागता गांव भी मौजूद है गांव के बाशिंदे भी मौजूद है। जो विभिन्न क्षेत्रों में नाम कमा रहे हैं। गांव के साथ जुड़े हुए ऐसे सैकड़ों गंगा जमुना के बीच महज बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में स्थापित छोटे से जिले गौतम बुध नगर से जुड़े हुए हैं तो सोचिए भारत में छह लाख से अधिक गांव है तो असंख्य ऐसे रोचक किस्से होंगे। गांव की दास्तान के समांतर वृक्षों की दास्तान भी चलती है ।आज विश्व पर्यावरण दिवस है आप सभी को विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

आर्य सागर खारी✍✍✍

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