अनुकरणीय जीवन के धनी ऋषि भक्त विद्वान श्री इंद्रजीत देव

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ओ३म्

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ऋषि भक्त आर्य विद्वान श्री इन्द्रजित् देव जी आर्यसमाज की लेखों एवं उपदेशों के द्वारा सेवा करने वाले योग्य विद्वान हैं। हम विगत लगभग तीन दशकों से पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख पढ़ते आ रहे हैं। गुरुकुल पौंधा, देहरादून एवं अजमेर के ऋषि मेले में उनके व्याख्यान सुनने का अवसर हमें मिला है। विगत कुछ अवसरों पर आप देहरादून आये हैं। वैदिक साधन आश्रम तपोवन देहरादून एवं गुरुकुल पौंधा के विगत अनेक उत्सवों में आपके दर्शन करने और वार्तालाप करने का संयोग भी हुआ है।

आपका जीवन बहुत ही सरल जीवन है। ऋषि दयानन्द की विचारधारा का देश विदेश में प्रचार प्रसार हो, यह भाव व स्वप्न आपके मन व मस्तिष्क में प्रायः हर क्षण होता है, ऐसा हमें अनुभव होता है। हमारी आपसे पहली भेंट सन् 1997 में कादियां (पंजाब) में मनाई गई पंडित लेखराम बलिदान शताब्दी समारोह के अवसर पर हुई थी। उसके बाद देहरादून एवं अजमेर में आपसे भेंट हुई हैं। गुरुकुल पौंधा व तपोवन आश्रम के विगत उत्सवों में आपसे विस्तृत वार्तालाप करने का अवसर भी हमें मिला है। आपने आर्यसमाज विषयक कुछ महत्वपूर्ण संस्मरण व घटनायें हमें सुनाई थी जिन्हें हम अपने लेखों के माध्यम से कुछ पहले प्रस्तुत कर चुके हैं। गुरुकुल पौंधा के इस वर्ष 2017 के उत्सव के उपलक्ष्य में आप 29 मई, 2017 को देहरादून पधारे थे। यमुनानगर से ही आर्यजगत के प्रतिष्ठित एवं प्रसिद्ध भजनोदपेशक श्री ओम् प्रकाश वर्मा जी भी पधारे थे। श्री वर्मा जी का विगत 25 अप्रैल, 2021 को यमुनानगर में निधन हो गया है। वर्मा जी ने गुरुकुल में अपनी एक कुटिया बनवा रखी है। उनका एक पौत्र ब्रह्मचारी सारांश गुरुकुल पौंधा में शिक्षा प्राप्त कर रहा है। यह पौत्र बहु-प्रतिभावान विद्यार्थी हैं। उत्सव में इस युवा विद्यार्थी की प्रस्तुतियां देखकर हमें बहुत प्रसन्नता होती है। इस उत्सव में हमें तीन दिनों तक श्री इन्द्रजित् देव जी और श्री ओम्प्रकाश वर्मा जी आदि अनेक विद्वानों के दर्शन हो होते रहे थे और इनसे वार्तालाप सहित आर्यसमाज के इतिहास से जुड़ी दुर्लभ बातों को सुनने का अवसर भी मिल था।

श्री इन्द्रजित् देव जी का जन्म लाहौर में 27 मई, सन् 1938 को हुआ। 27 मई 2021 को वह अपनी आयु के का 83 वर्ष पूरे कर 84 वें वर्ष में प्रविष्ट हुए हैं। हम उनके सुस्वस्थ एवं दीर्घ जीवन की कामना करते हैं। आपके पालनकर्ता पिता श्री कृष्ण दास जी और माता श्री भागवन्ती जी हैं जिनकी छत्रछाया में आपका जीवन व्यतीत हुआ। आपने हमें बताया था कि आपके पालक माता-पिता और जन्मदाता माता-पिता दो-दो हैं। यह नाम पालनकर्ता माता-पिता के हैं। आपके पिताजी आर्यसमाजी थे और आर्यसमाज के अनेक आन्दोलनों में आपने भाग लिया था। आपके पिता सन् 1957 के पंजाब हिन्दी रक्षा आन्दोलन में जेल भी गये थे। पंजाब में उन दिनों जब कहीं लाइलाज बीमारी प्लेग का प्रकोप होता था तो आपके पिता उन स्थानों पर जाकर रोगियों की सेवा व उपचार करने में अपनी सेवायें देते थे। आपके 7 भाई एवं दो बहिनों में अब दो भाई दिवंगत हो चुके हैं। प्रायः सभी यमुनानगर व समीप के स्थानों पर निवास करते हैं। आपने सन् 1947 से पूर्व लाहौर में कक्षा चार तक की शिक्षा प्राप्त की थी। 14 अगस्त सन् 1947 को भारत का विभाजन होने पर आपको भारत आना पड़ा। आप अमृतसर आकर रहे और वहां कक्षा दस तक की शिक्षा प्राप्त की। सन् 1947 को भारत में आने पर आपको गरीबी का बहुत समीप से अनुभव हुआ। आपने पंजाब विश्व विद्यालय से प्रभाकर, हिन्दी आनर्स एवं साहित्यरत्न (इलाहाबाद) की परीक्षायें उत्तीर्ण की हैं। आपने पंजाब राज्य के सिंचाई विभाग में नौकरी की। क्लर्क से आरम्भ कर आप आफीस सुपरिटेण्डेंट पद तक पहुंचे। रिश्वत आदि न लेने के कारण आपको ऐसे कामों पर रखा जाता था जहां रिश्वत की गुंजाइश नहीं होती थी। आप लम्बे समय तक हिमाचल प्रदेश में भी सेवारत रहे। श्रीमती सुमनलता जी आपकी सहधर्मिणी थी। 52 वर्ष पूर्व सन् 1969 में आपकी धर्मपत्नी जी की स्टोव जलाते समय दुर्घटना हो जाने से दुःखद मृत्यु हुई थी। आपके एक पुत्र श्री आलोक जी एवं एक पुत्री कविता वाक्चनवी जी हैं। आपकी पुत्री आर्य विदुषी व मनीषी हैं। सम्प्रति वह अमेरिका में निवास कर रही हैं। वह उच्च कोटि की लेखिका एवं सम्पादिका हैं। उनके पति दहन विज्ञान में उच्च कोटि के वैज्ञानिक हैं। पुत्री कविता के विवाह में वर पक्ष की ओर से स्वामी डा. सत्यप्रकाश जी और पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी बारात में आये थे। आपने अपने पुत्र व पुत्री का विवाह जन्मना जाति में न कर गुण, कर्म, स्वभावानुसार किया है एवं दोनों विवाह बिना दहेज लिये व दिये किये हैं।

श्री इन्द्रजित् देव जी पहले उपन्यास एवं हिन्दी कवितायें लिखते थे। सन् 1978 से 1982 के मध्य में आपने आर्यसमाज की पत्र पत्रिकाओं में लेख लिखना आरम्भ किया जो निरन्तर चल रहा है। ‘देव’ आपका काव्य रचना का उपनाम है। कवि नीरज जी को आप अपना प्रेरक कवि मानते हैं। सरकारी सेवा से आप सन् 1993 में सेवा निवृत हुए। आपने सेवा निवृति की तिथि से 3 वर्ष पूर्व ही स्वैच्छिक सेवा निवृति के लिए आवेदन किया था परन्तु उसे स्वीकार नहीं किया गया। इस कारण आपने अपनी सभी अर्जित अवकाश ले लिये थे। आपने रोजड़ में दर्शन योग विद्यालय के अनेक शिविरों में भी भाग लिया है। उन दिनों कुछ काल तक आप वैराग्य की स्थिति में भी रहे।

आचार्य इन्द्रजित् जी यमुनानगर में रहते हैं। सुप्रसिद्ध वयोवृद्ध भजनोपदेशक श्री ओम् प्रकाश वर्मा जी के जीवनकाल में आपकी उनसे घनिष्ठता रही है। आप वर्मा जी से उनसे जीवन के अनुभव सुने हैं। उन पर आधारित आपके लगभग 23 लेख आर्य पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें इतिहास विषयक महत्वपूर्ण जानकारी है। इन लेखों पर आधारित पुस्तक भी अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा कुछ समय पूर्व प्रकाशित हुई है। परोपकारिणी सभा अजमेर के अध्यक्ष कीर्तिशेष डा. धर्मवीर जी के आप बहुत निकट रहे हैं। आपने उनसे जुड़े भी अनेक संस्मरण हमें सुनाये हैं। आपने बताया था कि आर्य विद्वान प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी के परामर्श से उन्होंने परोपकारी मासिक पत्रिका का प्रकाशन पाक्षिक किया था। आप स्थानीय लोगों से मिलते समय व रेल यात्रा करते हुए जिन लोगों के सम्पर्क में आते थे, उनका नाम व पता नोट कर लेते थे और उन्हें परोपकारी पत्रिका प्रेषित करते थे। किसी पाठक का शुल्क न आने पर भी आप पत्रिका को बन्द नहीं करते थे। पत्रिका घाटे में चलती है परन्तु इसकी आपको चिन्ता नहीं थी। आपका मानना था कि पत्रिका के माध्यम से परोपकारिणी सभा विषयक जानकारियां लोगों तक पहुंचती हैं। डा. धर्मवीर जी के साथ आपने देश के दूरस्थ स्थानों की अनेक प्रचार यात्रायें भी की हैं। चार वर्ष पूर्व उनकी बातों से हमने अनुभव किया कि डा. धर्मवीर जी के असामयिक वियोग से परोपकारिणी सभा निष्प्राण सी हो गई थी। हम आशा करते हैं कि अब स्थिति में परिवर्तन होकर सभा की सभी गतिविधियां सामन्य रूप से चल रहीं हैं। परोपकारिणी सभा में जो बड़े बड़े भव्य भवन बने हैं उनका समस्त श्रेय डा. धर्मवीर जी की बुद्धिमत्ता एवं पुरुषार्थ को है। आपने व भजनोपदेशक पं. ओम् प्रकाश वर्मा जी ने हमें बताया था कि डा. धर्मवीर जी आशु उपदेशक थे। उन्हें किसी भी विषय पर व्याख्यान के लिए कहा जाये और उसके लिए दो मिनट पहले ही निवेदन करें तो वह उस पर भी अनेक प्रमाणों व उदाहरणों से प्रभावशाली व्याख्यान देते थे।

श्री इन्द्रजित् देव जी आर्यसमाज के प्रचार प्रसार में मनसा, वाचा कर्मणा लगे हुए हैं। आप स्वस्थ हैं और कोरोना महामारी से पूर्व आर्यसमाज के प्रचार के लिए अनेक स्थानों पर आते जाते रहते थे। आपका जीवन एवं व्यक्तित्व सरल है और सबसे घुल मिल जाते हैं। आपका अध्ययन भी विस्तृत है और आर्यसमाज के इतिहास की बहुत सी घटनायें आपको स्मरण हैं जिनका प्रयोग वह वार्तालाप एवं उपदेशों में करते हैं। हमने उन्हें गुरुकुल या अन्यत्र होने वाले सभी विद्वानों व भजनोपदेशकों के उपदेशों में एक सामान्य श्रोता की भांति बैठे हुए उपदेश व भजन श्रवण करते हुए देखा है। यह गुण बहुत कम उपदेशकों व भजनोपदेशकों में देखने को मिलता है। मंच पर आप तभी जाते हैं कि जब आपको बुलाया जाता है। आर्यसमाज व इसकी संस्थाओं के उत्सव आदि में आप बिना उपदेश के लिए बुलाये ही एक श्रोता के रूप में सम्मिलित होते हैं। गुरुकुल पौंधा व वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून के उत्सवों में आप एक श्रोता के रूप में आया करते थे। यहां के अधिकारी आपकी योग्यता एवं स्वभाव से परिचित हैं। यही कारण था कि आपको भी उपदेश प्रस्तुत करने का अवसर मिलता था जिससे हम आपके उपदेश देने व अन्य गुणों से परिचित हो सके। मई-जून सन् 2017 के गुरुकुल पौंधा के उत्सव में ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका स्वाध्याय शिविर आयोजित किया गया था जिसमें आर्य विद्वान डा. सोमदेव शास्त्री, मुम्बई प्रमुख वक्ता होते थे। उसमें भी श्रद्धेय इन्द्रजित् देव जी एक शिविरार्थी की तरह निर्धारित समय पर अपनी ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पुस्तक लेकर पहुंच जाते थे और पूरा समय बैठते थे। शिविराध्यक्ष डा. सोमदेव शास्त्री जी से कुछ विषयों पर आप प्रेमपूर्वक चर्चा भी करते थे। आपका सरल स्वभाव हमें विशेष रूप से प्रेरणा देता है। हमारे सभी विद्वान ऐसे ही हों तो प्रचार और अधिक बढ़ सकता है।

आर्य विद्वान श्री इन्द्रजित् देव जी का 27 मई को जन्म दिवस था। हम व्यस्तताओं के कारण लेख प्रस्तुत करना भूल गये। अब यह लेख प्रस्तुत कर रहे हैं। हम श्री इन्द्रजित् देव जी को उनके 84 वें जन्म दिवस पर शुभकामनायें देते हैं। ईश्वर की कृपा से वह पूर्ण स्वस्थ रहें एवं दीर्घायु हों। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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