परिवर्तन के दौर से गुजरते संस्कृति और कानून

images (8)

 

जब भारत गुलामी के दौर में था, तो कई ऐसे कानून बने जिनके जरिये यहाँ की मूल जनता को कुचला जा सके। इनके कारण जो चीज़ें हमारी संस्कृति का हिस्सा थी, उनमें से कई लापता होने लगी। जब शास्त्रों और शस्त्रों पर प्रतिबन्ध लगने लगे तो कई कलाओं को उनका रूप बदलकर जीवित रखा गया। उदाहरण के लिए युद्ध कलाओं में प्रयुक्त होने वाले बिहार के परी-खांडा और ओड़िसा आदि के छाऊ को हम अब नृत्य कलाओं के रूप में जानते हैं। संविधान में “संस्कृति” पर कोई विशेष चर्चा नहीं थी। इसलिए दशकों तक किसी को याद ही नहीं आया कि देश तो केवल एक संस्कृति से जुड़ा है! धर्म, भाषा, परम्पराएं सभी संस्कृति के तारों से जुड़ी होती हैं।

हाल ही में सरकार बहादुर ने पुराने कई नियमों को बदला। इस क्रम में मणिपुर के थांग-ता, पंजाब के गटका, केरल के कलारीपयट्टू और महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश के मल्लखंभ को भी खेलों में शामिल किये जाने की घोषणा हुई। अभी भी छाऊ और परी-खांडा इससे बाहर ही हैं, लेकिन कहा जा सकता है कि चलिए शुरुआत तो हुई! असम के क्षेत्र में स्वतंत्रता मिलने से पहले मुस्लिम लीग की सरकारों ने मदरसों का प्रांतीयकरण कर डाला था। एक सेक्युलर सरकार को मजहबी शिक्षा पर क्यों खर्च करना चाहिए, पता नहीं। अगर खर्च करती भी है, तो केवल एक मजहब के लिए ही ये विशेषाधिकार क्यों? सभी को ऐसी सुविधा क्यों नहीं दी जा रही, ये भी भी नहीं मालूम।
जो भी हो, आज हेमंत बिसवा शर्मा असम में मदरसों के प्रांतीयकरण को वापस लिए जाने का प्रस्ताव ला रहे हैं। ऐसे कई कानून थे जो भारत के मूल निवासियों का नहीं, उनपर शासन करने चले आये विदेशियों का हित साधते थे। करीब हजार वर्षों से हिन्दुओं ने ऐसे शासन (या कहिये शोषण) के विरुद्ध प्रतिरोध जारी रखा। जब तक तलवारों-बंदूकों से सामना होता रहा, युद्ध कलाओं को छाऊ जैसे नृत्यों का रूप देकर लड़ने की क्षमता को जीवित रखा गया। जब फ्रांसिस ज़ेवियर जैसे हत्यारे किताबों को जलाते और हिंसा के जरिये धर्म-परिवर्तन में लगे थे, तब कुछ लोगों ने धर्म ग्रंथों को याद करके भी उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा। आततायियों का दमन जैसे-जैसे बढ़ता रहा, ऐसे प्रयास और तेज ही होते रहे।

कानूनों के जरिये ऐसा कैसे किया जा सकता है, इसका सबसे आसान उदाहरण तो हाल ही में दिल्ली में पटाखे फोड़ने के लिए बनाया गया काला कानून था। जनता ने इस वर्ष उस कानून की भी गांधीवादी तरीके से “सविनय अवज्ञा” कर डाली। मगर क्या इतने भर से ये रुक जायेगा? ये पहली बार नहीं हो रहा था, ना ही ये अंतिम बार था। अगर 1955 के दौर की “हिन्दू मैरिज बिल” पर आई बहसें देख लें तो उतने से ही ये साफ़ हो जाता है कि ऐसा होता आया है। उस दौर में एनसी चटर्जी जो कि भूतपूर्व लोकसभा अध्यक्ष कॉमरेड सोमनाथ चटर्जी के पिता और हिन्दू महासभा के नेता थे, वो इस बिल के विरोध में बहस करते नजर आ जाते हैं। पिछले वर्षों का हिसाब देखें तो कुछ समय पहले तक के आंकड़ों के मुताबिक मोदी जी की सरकार औपनिवेशिक दौर के 1800 कानून (एक दिन में नौ कानूनों की दर से) ख़त्म कर चुकी थी।

ऐसे कानूनों से विदेशियों की फेंकी बोटियों पर पलने वाली एक जमात को बड़ा फायदा होता था। कैसे? इसे अर्थशास्त्र और मार्केटिंग की भाषा में “एंट्री बैरियर” कहते हैं। ये कानून ऐसे थे जिनसे नए लोगों को किसी क्षेत्र में प्रवेश करने का अवसर ही ना मिले। ऐसे “एंट्री बैरियर” संस्थानों के नियमों और सरकार के कानून, दोनों तरीके से लागु किये जा सकते हैं। उदाहरण के तौर पर एएचडब्ल्यू व्हीलर की किताबों की दुकानें लगभग हर बड़े स्टेशन पर मौजूद हैं। अगर वो नियम बना दें कि दस वर्ष से पुराने प्रकाशनों की किताबें ही वो अपने पास रखेंगे, तो क्या होगा? रेलवे स्टेशन पर किताबों की दुकानें खोलने के लिए हमारे-आपके जैसे पाठकों के पास उतने स्रोत तो हैं नहीं, किसी लेखक के पास होंगे, इसमें भी संदेह है। नया लेखक अगर राजकमल-वाणी जैसे स्थापित प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित नहीं हुआ, तो वो पाठकों तक पहुँचता ही नहीं! यानी आज जिन्हें पढ़ा जाता है, वो सत्य व्यास, मानव कॉल, अंकिता जैन, अजित भारती, और अन्य कई, होते ही नहीं।
ऐसा ही कोई कानून सोचना हो तो “ड्रामेटिक परफॉरमेंस एक्ट 1876” के बारे में सोचिये। भारत में थिएटर, या कहिये नाटकों-नृत्य आदि के मंचन पर ये कानून लागू होता था। जाहिर है इसे फिरंगियों ने किसी दौर में इसलिए बनाया था ताकि नाटकों-नृत्य आदि के जरिये सरकार बहादुर के विरोध का भाव न जगाया जा सके। इसके जरिये युद्धों से ठीक पहले किये जाने वाले “राई नृत्य” आदि को रसातल में धकेल दिया गया। इन नर्तकियों के पास तवायफ हो जाने के अलावा कोई चारा नहीं रहा होगा। काफी प्रयासों के बाद राई को थोड़ा पुनःजीवित किया गया है। सवाल है कि इसके वाबजूद “नुक्कड़ नाटक” कैसे होते थे? तो लाइसेंस-परमिट राज में कुछ चुनिन्दा लोगों को, जिनके बारे में सरकार के नुमाइंदों को पता होता कि वो सरकार विरोधी नहीं हैं, उन्हें इसके लिए परमिट मिलता था। अगर आप ऐसे ख़ास संगठनों से जुड़े हैं, जिनके पास परमिट है, तो नाटक कीजिये, वरना नहीं। केवल एक ही आयातित विचारधारा के लोग नुक्कड़ नाटक में क्यों दिखते रहे? वो इस “एंट्री बैरियर” से होता था।

समय बदलने के साथ भारत को ऐसे हजारों नियम-कायदों से मुक्ति चाहिए। ऐसे हर कानून के हटने से उन सभी दलालों को दिक्कत होगी जो ऐसे “एंट्री बैरियर” के जरिये ही प्रतिस्पर्धा को कुचलकर अपने लिए जगह बनाए रखते हैं। कभी महामहोपाध्याय पीवी काने ने “हिन्दू धर्मशास्त्रों का इतिहास” जैसी किताबें लिखी थीं। आजकल ऐसी किताबें कम लिखी-पढ़ी जाती हैं। कानूनों के हटने, उनके बदलने के दौर में ऐसी किताबों को फिर से पढ़ने की जरूरत तो है ही, नीतियों के बदलने से होने वाले दूरगामी परिणामों पर भी सोचना होगा। किसी और की नक़ल से बने संविधान और कानूनों से वो सारी समस्याएँ जो उन्हें वर्षों पहले झेलनी पड़ी, वो सभी अब हमें झेलनी पड़ रही हैं ये तो सिर्फ एक “हिन्दू मैरिज एक्ट” को किसी और की नक़ल पर बनाए जाने से नजर आ गया होगा। नागरिकता कानूनों पर पुनःविचार और कृषि कानूनों में बदलाव से कुछ मुट्ठी भर धनपतियों-शक्तिसम्पन्नों को हो रही दिक्कत हम देख ही रहे हैं।

बाकी याद रखिये कि 1620, 1720, 1820 या 1920 सभी भारत में बदलावों के शुरुआत के दशक रहे हैं। हर शताब्दी के पचासवें दशक तक ऐसी उथल-पुथल से ही सुधार आये। हर शताब्दी में ऐसे बदलावों की गति बढ़ी भी है, इस बार और तेज बदलाव आएंगे, फिर चाहे आप माने, या ना मानें!
✍🏻आनंद कुमार

Comment:

betbox giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
betnano giriş
sekabet giriş
sekabet giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş
winxbet giriş
yakabet giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
batumslot giriş
batumslot
batumslot giriş
galabet giriş
galabet giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
galabet giriş
galabet giriş
galabet giriş
betamiral giriş
betamiral giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
galabet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
Betgar güncel
Betgar giriş
Betgar giriş adresi
betnano giriş
galabet giriş
betnano giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betasus giriş
norabahis giriş
nitrobahis giriş
noktabet giriş
betvole giriş
betvole giriş
betkolik güncel giriş
betkolik güncel
betkolik giriş
yakabet giriş
betasus giriş
betnano giriş
romabet giriş
yakabet giriş
queenbet giriş
queenbet giriş
betnano giriş
winxbet giriş
betamiral giriş
livebahis giriş
grandpashabet giriş
wojobet giriş
wojobet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betbox giriş
betkare giriş
kareasbet giriş
noktabet giriş
extrabet giriş
extrabet giriş
nisanbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betsat giriş
betsat giriş
norabahis giriş
norabahis giriş