बंगाल में कब होगा संघर्ष विराम ?

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नदीम

एक आम धारणा थी कि दो मई को जब चुनाव के नतीजे आ जाएंगे, उसके बाद बंगाल की राजनीतिक तपिश खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगी। वहां बीजेपी और टीएमसी के बीच जो टकराव है, वह सत्ता हासिल करने और उस पर अपना कब्जा बनाए रखने को लेकर है। 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के रूप में बीजेपी को राज्य की सत्ता बिल्कुल सामने दिख रही थी। जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे थे, उनमें वह पश्चिम बंगाल को किसी भी कीमत पर जीतना चाहती थी, क्योंकि उसे मालूम था कि बंगाल की जीत के आगे दूसरे राज्यों में हार पर कोई चर्चा नहीं होगी। अगर बंगाल हारकर असम जीत भी लिया, तो वह जीत फीकी होगी। बाकी के तीन राज्यों में बीजेपी सीधे तौर पर लड़ाई में थी ही नहीं।

उधर टीएमसी के लिए करो या मरो वाली स्थिति थी। अगर बंगाल की सत्ता उसके हाथ से निकल जाती और वहां बीजेपी काबिज हो जाती, तो उसका आगे का राजनीतिक सफर मुश्किल हो जाता। फिर बंगाल में बीजेपी का सत्ता में आना वहां की राजनीतिक सोच में एक बड़ा बदलाव भी होता। यही वह खौफ था, जिसकी वजह से टीएमसी हार की गुंजाइश के बारे में सोचना भी नहीं चाहती थी। चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद टीएमसी कार्यकर्ताओं के लिए ममता बनर्जी ने जो संदेश जारी किया था, उसका सार यही था कि उनके शब्दकोश में ‘हार’ जैसा कोई शब्द नहीं होना चाहिए। खैर, दो मई भी आ गई और नतीजे भी आ गए, लेकिन बंगाल में शांति नहीं आई। वहां चुनाव से पहले जो संघर्ष सत्ता के लिए चल रहा था, चुनाव के बाद वह ‘अहं’ के संघर्ष में तब्दील हो गया है, जिसकी बिसात पर अपने-अपने कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाने के दांव चले जा रहे हैं।

कब होगा ‘संघर्ष विराम’
बीजेपी बंगाल में हार की कोई संभावना नहीं देख रही थी। उसके नेताओं ने चुनाव को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से जोड़ लिया था। अगर कोई दस प्रतिशत तक हार की गुंजाइश देख भी रहा था, तो यह मानकर चल रहा था कि वह बहुत नजदीकी होगी, लेकिन एकतरफा हार ने उसे असहज करके रख दिया। पार्टी यह स्वीकार कर पाने की स्थिति में नहीं है कि वह बंगाल चुनाव हार गई है। उसे लगता है कि अगर बंगाल की हार भूलकर वह आगे के राजनीतिक सफर पर निकल जाएगी, तो यह ‘मैदान छोड़ देना’ मान लिया जाएगा। वह किसी भी सूरत में यह संदेश नहीं देना चाहती कि उसने ममता के आगे हथियार डाल दिए हैं। वह बंगाल में लगातार लड़ती हुई दिखना चाहती है और ममता का सुकून भी छीने रखना चाहती है। पार्टी ने नेता प्रतिपक्ष के पद पर शुभेंदु अधिकारी का मनोनयन भी इसी नजरिए से किया है कि उनका चेहरा कभी ममता को नंदीग्राम में हुई हार को भूलने नहीं देगा और वह कभी सहज नहीं हो सकेंगी।

बंगाल की हार का असर केवल बंगाल तक ही सीमित रहने वाला नहीं है। अगले कुछ महीनों के अंदर पांच अन्य राज्यों के चुनाव होने हैं, जिनमें यूपी भी शामिल है। बीजेपी उस हार के असर को बंगाल में अपने आक्रामक तेवर बरकरार रखकर कम करना चाहती है। उधर टीएमसी भी बीजेपी के आगे ‘हार’ मान लेने को तैयार नहीं है। वह भी बीजेपी के खिलाफ लड़ती हुई दिखना चाहती है। सोमवार को नारदा स्टिंग मामले में सीबीआई ने जब दो मंत्रियों सहित चार टीएमसी नेताओं को गिरफ्तार किया, तो ममता बनर्जी सीबीआई मुख्यालय पहुंच गईं और उन्होंने कहा कि हमें भी गिरफ्तार करो। इसके जरिए उन्होंने अपने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को संदेश दिया कि बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में वह उन्हें कभी अकेला नहीं पड़ने देंगी। एक टीएमसी नेता ने हमसे बातचीत में कहा भी, ‘हम अगर चुप रहे तो बीजेपी बंगाल को भी दिल्ली बना देगी, जहां कहने को मुख्यमंत्री तो केजरीवाल हैं लेकिन चलाती केंद्र सरकार अपनी ही है।’

अब राजभवन में ‘जनता दर्शन’
बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने पिछले हफ्ते उन इलाकों का दौरा किया, जहां चुनावी नतीजे आने के बाद हिंसा हुई थी, और बीजेपी का आरोप है कि उनके कार्यकर्ताओं और एक धर्म विशेष के लोगों को निशाना बनाया गया। उनके इस दौरे पर ममता को सख्त आपत्ति है। सरकार की तरफ से राज्यपाल के ऐसा करने पर एतराज भी जताया गया है। लेकिन राज्यपाल ने कहा है कि उन्हें जहां जरूरत महसूस हुई, वह गए और भविष्य में भी जहां जरूरत महसूस होगी, वहां जाएंगे। उन्हें ममता बनर्जी रोक नहीं सकतीं। उनके इस बयान का निहितार्थ यह निकाला गया है कि उनके अभी और भी दौरे होंगे। उनके दौरे से हटकर एक नई खबर भी आ रही है। राजभवन साप्ताहिक ‘जनता दर्शन’ जैसा कार्यक्रम भी आयोजित करने जा रहा है, जहां राज्यपाल राजभवन में आमजन से संवाद करेंगे। अमूमन ‘जनता दर्शन’ के कार्यक्रम मुख्यमंत्रियों द्वारा आयोजित होते हैं।

जाहिर सी बात है कि अगर राजभवन में साप्ताहिक ‘जनता दर्शन’ का कार्यक्रम शुरू होता है, तो यह ममता बनर्जी को किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होगा। राजभवन में राज्यपाल से जो लोग मिलेंगे, वे अपनी सूरत दिखाने को तो मिलेंगे नहीं, उनकी अपनी कुछ समस्याएं भी होंगी। राज्यपाल उनकी समस्याओं के निदान के लिए सरकार को अपनी सिफारिश भेजेंगे, लेकिन उनकी सिफारिश को सरकार कितना तवज्जो देगी, यह अभी से जाना जा सकता है। एक संवैधानिक संस्था को नजरअंदाज करना किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अच्छा नहीं माना जाता है, लेकिन अटल सरकार में मंत्री रहे और आजकल ममता के साथ चल रहे यशवंत सिन्हा कहते हैं, ‘जगदीप धनखड़ राज्यपाल के रूप में काम ही कहां कर रहे हैं? अगर वह राज्यपाल होते तो हम उनकी हर बात मानते, लेकिन वह तो मोदी और शाह की लिखी स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं।’ उधर नारदा स्टिंग मामले की तरह कई दूसरे मामलों में जांच एजेंसियां तेजी दिखा सकती हैं। यानी बंगाल में यह लड़ाई अभी थमने वाली नहीं है, बढ़ेगी ही।

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