संसाधनों की कमी से मौतें का दंश झेलता देश

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डॉ. शंकर सुवन सिंह

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महामारी के विकराल रूप को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को लॉकडाउन लगाने की नसीहत दी थी पर सरकार ने उसको सिरे से तुरंत खारिज कर दिया था। यह घटना राज्य सरकार के रवैये को चरितार्थ करती है।

देश संकट में है और कोविड-19 महामारी से जूझ रहा है लेकिन ऐसे में देश राजनीति का दंश झेल रहा है। देश के लोग सरकार से आशा लगाए बैठे थे कि सरकार उनकी जान बचाएगी। जान बचाना तो दूर नेताओं को लोगों की चीख पुकार तक नहीं सुनाई दी। शमशान में जलती लाशें, कब्रिस्तान में दफ़न होते लोग, होम आइसोलेशन में मरते लोग, अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलिंडर की कमी से मरते लोग…इन सब स्थितियों ने देश के प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़ा कर दिया है। देश के प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय आपदा के समय चुनाव क्यों नज़र आया ? मरते लोग क्यों नहीं नज़र आए ? बीजेपी का सत्ता मोह चरम सीमा पर है। कोई भी सत्ता, जनता तय करती है। जनता ने बीजेपी को सत्ता दी। इस सत्ता ने कोविड-19 महामारी के दौरान जनता को मरने के लिए छोड़ दिया। चुनाव कराने को लेकर सत्ता के लोभियों को मौतों की चीख पुकार भी न रोक पाई। महामारी में लोग मर रहे हैं और सरकार को चुनाव की पड़ी थी। इसी सन्दर्भ में कोर्ट ने अपनी एक सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग पर हत्या का मुकदमा चलाने की बात कही थी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महामारी के विकराल रूप को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को लॉकडाउन लगाने की नसीहत दी थी पर सरकार ने उसको सिरे से तुरंत खारिज कर दिया था। यह घटना सरकार के रवैये को चरितार्थ करती है। बाद में कुछ दिनों के लिए जरूर लॉकडाउन लगाया गया। ये लॉकडाउन लगाने का एहसास सरकार को तब हुआ जब उनक विधायक, नेता, सांसद, मंत्री आदि संक्रमण के चलते गोलोकवासी होने लगे। जो लोग महामारी के दौरान सरकारी अव्यवस्था के कारण संक्रमण के दौरान जान गवां बैठे उनके प्रति मेरी भाव पूर्ण श्रद्धांजलि। बी.जे.पी. सरकार हाई कोर्ट के विचार को पहले मान लेती तो सरकार की इज्जत घट जाती क्या ? सरकारी रवैय्ये से हर आदमी डरा, सहमा भयभीत दिखाई पड़ता है। चुनाव आयोग में बैठे अधिकारी सत्ता लोभी नेताओं के मकड़ जाल में फंस चुके हैं। महामारी के दौरान मौतों का आंकड़ा बी.जे.पी. के सत्ता मोह को चरितार्थ करता है।

ये कोविड-19 महामारी नाम, पता, पद पूछकर चपेट में ले रही है ऐसा बिलकुल नहीं है। सरकार को मोह और लोभ के भ्रम से बाहर आ जाना चाहिए। चुनाव के दौरान खूब भीड़ इकट्ठा की गई। इसभीड़ से कोरोना विस्फोट हुआ। कोरोना विस्फोट से आज सारा भारत जूझ रहा है। भीड़ इकठ्ठा करने वाले, भीड़ में जाने वाले, चुनाव प्रचार करने वाले, चुनाव करवाने वाले ये सभी हत्या के दोषी हैं। अब तो ऐसा लगने लगा है- मुर्दों की बस्ती में जिंदगी तरसती है। यहां हर एक चीज, जीवन से सस्ती है। जिधर देखो जीने के लिए ऑक्सीजन सिलिंडर, दवाई, हॉस्पिटल, बेड आदि की जरूरत पड़ने लगी है। इस देश ने कई परिस्थितियां देखीं, पर इस देश ने संसाधनों की कमी से होने वाली मौतों का ये आंकड़ा कभी नहीं देखा था।

कोरोना संक्रमण के चलते चुनाव की तारीख को टाला जा सकता था क्योंकि चुनाव तो कभी भी कराए जा सकते थे पर जिनके परिवार के परिवार कोरोना के चलते खत्म हो गए, क्या उनको दुबारा लाया जा सकता है ? कभी नहीं। अभी भी वक्त है कि सरकार को स्थिति संभाल लेनी चाहिए।

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