बंगाल के खूनी इतिहास में भाजपा की छलांग

पहली बार बंगाल मैं 1992 में गई थी . धनबाद से बंगाल जाना ऐसा नहीं था कि बहुत धनी जगह से वहाँ गई थी .पर मुझे बंगाल से इतनी ग़रीबी की उम्मीद नहीं थी . हमारे यहाँ जितने भी बंगाली मित्र थे वे ज्योति बसु का गुणगान करते थकते नहीं थे इसलिए मन में बंगाल की एक बहुत अच्छी छवि थी कि जरूर ज्योति बसु ने कुछ अच्छा किया होगा तभी बंगाली उन्हें पूजते हैं . बंगाल की ग़रीबी ने ज्योति बसु के प्रति मेरे मन में घृणा भर दी .

1999 में शादी के बाद पहली बार बंगाल रहने के लिए गई . उस समय बंगाल में चुनाव प्रचार चल रहा था . हर भाषण में बंगाल की ग़रीबी के लिये केंद्र सरकार को दोष दिया जाता था . चुनाव परिणाम देखकर लगता था कि जनता भी इन नेताओं पर विश्वास कर लेती है .

2000 के बंगाल चुनाव में आर्मी को चुनाव डूटी पर लगाया गया था . उसमें मेरे पति भी थे . हमारे तो प्राण सूखे रहते थे कि कहीं कोई अनहोनी ना हो जाये. लौटकर पति ने बताया था कि वहाँ फ़र्ज़ी वोट बहुत पड़ते थे . BSF वाले कहते थे कि अगर हम इन्हें रोकने जायें तो फिर दंगे शुरू हो जायेंगे इसलिए जो होता है उसे अनदेखा कर दें.
यह था बंगाल का लोकतंत्र! मुझे कभी नहीं लगा था कि cpm यहाँ से हारेगी . यहाँ ग्राउंड लेवल तक cpm के कार्यकर्ता घुसे रहते थे . बिना उन्हें पैसा खिलाये वहाँ कोई काम नहीं कर सकते थे . मेरे रिश्तेदार हॉस्पिटल में भर्ती हुये थे उन्हें ज़बरदस्ती एक अटेंडेड दिया जाता जबकि वे खुद रहना चाहते थे . वह अटेंडेंट सीपीएम का कैडर होता था. टैक्सी स्टैंड पर टैक्सी वाला पी कर सो रहा है तो आपको उसके जगने का इंतज़ार करना पड़ता था क्यूँकि अभी उसका नम्बर है तो वही ले जायेगा , भले उसके बाद जिसका नम्बर है वह उपलब्ध है . मेरे पति का हमेशा किसी ना किसी कामचोर आदमी से झगड़ा हो जाता था . मुझे डर लगा रहता था क्यूँकि बंगाल में लिंचिंग खूब होती थी . एक बार एक सैनिक का किसी कारण फ़ोन बूथ पर बहस हो गई तो लोग ने उसे पीट पीटकर मार दिया . भारतीय सेना उनके लिए आउट्साइडर होते थे . हर बात पर ‘आमरा बंगाली‘ कहते हैं और अन्य राज्य के लोगों को हिंदुस्तानी कहते हैं .
मेरे जीजाजी का परिवार दादा जी के समय से वहाँ रहता था पर उन्हें भी अपना बंगाल छोड़ गुजरात आकर बसना पड़ा . उनकी बहुत सारी दुकाने थी जिसका किराया सिर्फ 5 रू था .इस किराये को सरकार ने कभी बढ़ने नहीं दिया था जिस कारण इतनी ज़मीन का मालिक होकर भी उन्हें कोई फ़ायदा नहीं हुआ . उनके पिताजी रिटायर्ड हेड मास्टर थे जिनका पेंशन बिना घूस खिलायें देने को वे तैयार नहीं थे . वे हमेशा कहते थे कि बंगाल में एक क्रांति की जरुरत है तभी बंगाल बदल सकेगा. उन्हें भी अब भी एक क्रांति का ही भरोसा था.

गैस और राशन वहाँ हमेशा अन्य राज्यों से महँगा मिलता था . यह दूसरा झटका था जो मुझे लगा था क्यूँकि मैं यही मानकर चलती थी वामपंथी ग़रीबों की बात करते है तो कम से कम राशन तो सस्ता ज़रूर होगा …पर नहीं खाना सस्ता नहीं था पर लेबर सस्ता था . लेबर सस्ता होने के कारण यहाँ काम वाली बाई सस्ती थी , रेस्टोरेंट में खाना सस्ता था .ट्रैवल सस्ता था . मुझे यह जानकर हँसी आती थी कि आर्मी की नौकरी करने वाले वहाँ के धनी लोगों में आते थे .

2002 में हमने बंगाल छोड़ दिया . मुझे याद है जब गोधरा हुआ था तो उस दिन बंगाल में कर्फ़्यू लग गया था , केबल कनेक्शन काट दिया गया था , अख़बार नहीं आया था . हमें पता ही नहीं चला कि गुजरात में क्या हुआ था . बंगाल को छोड़ा तो यही लगा कि यह राज्य मर चुका है . बहुत दुःख हुआ .

जब 2011 के बंगाल चुनाव में ममता जीती तो विश्वास नहीं हुआ कि यह कैसे हो गया . मेरे पति ने कहा कुछ नहीं बदला है बंगाल बस सारे वामपंथी ने अपना साइड बदल लिया है .
इसका कारण यह था कि बुधदेव भट्टाचार्य ने बंगाल में फिर से इंडस्ट्री लगाने की कोशिश की ताकि बंगाल में पैसे आये जिससे कि वहाँ के लोगों की स्थिति सुधरे …पर उनके अपने ही लोगों ने विद्रोह कर दिया . जिससे कि वे हार गये.

ममता ने दस साल में बंगाल को कुछ नहीं दिया सिर्फ हर लेम्प पोस्ट और ब्रिज को तृणमूल के चुनावी रंग (वाइट एंड ब्लू) से रंग दिया . इस बार ममता अपनी चुनावी भाषण में यही कहती रहीं कि बंगाल को गुजरात नहीं बनने देंगी . क्या ममता को पता नहीं कि कितने बंगाली जो मेहनत करके कमाना चाहते थे उन्होंने बंगाल छोड़ गुजरात में शरण ली है . आखिर बंगाली हिंदू पलायन क्यूँ कर रहे हैं ? बंगाल को बंगलादेशियों / रोहिंग्यों से क्यूँ भरा जा रहा है ? यह देखा गया है कि जहाँ वामपंथी और जेहादी एक हुये हैं वहाँ अंत में जेहादियों को ही सत्ता मिलती है .

ऐसा है हमारा बंगाल . अगर इस बंगाल में भाजपा 3 से 77 सीट पर गई है तो आश्चर्य की बात है . अब सबसे कठिन काम है इन 77 लोग और उनसे जुड़े लाखों कार्यकर्ताओं की जान माल की सुरक्षा का . बंगाल अपने खूनी इतिहास के लिये जाना जाता है . अब देखना है कि मोदी शाह अपने कार्यकर्ताओं को ममता के गुंडों से कैसे बचाते हैं. आगे बहुत लड़ाई बाक़ी है और उस लड़ाई के लिए अपनी फौज का ज़िन्दा रहना भी ज़रूरी है.
✍श्रीमती पल्लवी उपाध्याय मिश्रा

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *