कोरोना महामारी के समय में लोगों को स्वानुशासन लागू करने की आवश्यकता

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राकेश सैन

यदि स्वानुशासन का पालन किया गया होता तो बहुत से लोगों को असमय मरने से या अस्पतालों में गम्भीर रूप से बीमार होकर भर्ती होने या घरों में बीमार होकर बन्द रहने से बचाया जा सकता था। कोरोना की दूसरी लहर को टाला जा सकता था।

गान्धी जी कहा करते थे, कि स्वानुशासन यानी अपने (स्व:) पर अनुशासन किसी सभ्य समाज की कसौटी होता है। उन्होंने ये कहा ही नहीं बल्कि इसको अपने जीवन में लागू भी करके दिखाया और यही कारण रहा कि उनका हर आन्दोलन इस सिद्धान्त की उदाहरण बना। दुनिया कोरोना की दूसरी लहर से स्तब्ध हुई, अब चुनौती भारत में है। देश के प्राय: सभी हिस्सों में मास्क न लगाने सहित अनेक अनुशासनहीन दृश्य आम हैं। प्रश्न है कि क्या हम आपदाओं को आदतन बुलाते हैं ? सामूहिक व्यवहार में यह असावधानी क्यों ? स्वानुशासन के बगैर, व्यवस्थित समाज, राज और व्यवस्था चल सकती है ?

मुम्बई से एक गाड़ी, एक राज्य की राजधानी पहुंचती है। स्टेशन पर व्यवस्था थी कोविड टेस्ट की। जानकारी मिलते ही यात्री उससे पहले वाले स्टेशन पर उतर गए। अब खबर है कि रेमडेसिविर इन्जेक्शन ब्लैक हो रहा है। दिल्ली का एक दृश्य सोशल मीडिया पर छाया है, जिसमें कार सवार एक पुलिस अधिकारी की बेटी मास्क के लिए पूछे जाने पर पुलिस वालों से ही झगड़ा करती है और कहती है कि वह कार में बैठे पति का चुम्बन भी लेगी, आप क्या करोगे ? सरकार, पुलिस, प्रशासन, कानून की एक सीमा है। आपदा के क्षणों में नागरिक कर्तव्य क्या हैं, दूसरों को खतरे में डालना ? यही आचरण, स्वतन्त्रता है ? गान्धी जी ने पहला आश्रम दक्षिण अफ्रीका में बनाया तो आत्मानुशासन वहां की आचार संहिता में था। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन में छात्रों ने अनुशासन की शर्त स्वीकारी। उसी देश में आज इस संकट में स्वानुशासन कहां है ? ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ के सिद्धान्त वाले देश में, हम अपने आचरण से औरों के जीवन को संकट में डाल रहे हैं। हमारे शास्त्रों, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, इतिहास, सामाजिक व्यवस्था में स्वानुशासन बुनियाद में है। नियम पालन का धैर्य हम खो रहे हैं। पहले कोरोना दवा के खिलाफ अफवाहें उड़ाई गईं और अब दवा के फर्जी दस्तावेज बन रहे हैं, दवा व गैस सिलेण्डरों की ब्लैक हो रही है।

कोविड के पहले दौर में लेखक युवल नोआह हरारी अपनी पुस्तक ‘ट्वेंटी फस्र्ट लेसन फॉर द ट्वेंटी फस्र्ट सेञ्चुरी’ में कहते हैं, आज दुनिया के हर इन्सान के लिए सबसे अहम सवाल है कि मैं कौन हूं ? जीवन का उद्देश्य क्या है ? जीवन में क्या करना है ? वे मानते हैं कि हर एक इन्सान की लौकिक दुनिया में एक विशिष्ट भूमिका है। कारण, इस जगत में हर एक दूसरे से जुड़ा है। अपने एक अन्य लेख ‘द वर्ल्ड आफ्टर कोरोना वायरस’ (2020) में उन्होंने कहा कि ‘हमें दीर्घकालिक परिणामों पर ध्यान रखना होगा। अंतत: यह तूफान गुजरेगा, मानवता बचेगी। पर हम एक नयी दुनिया-व्यवस्था में रहेंगे।’ पर सवाल पैदा होता है कि क्या ऐसे आचरण के साथ हम नई व्यवस्था का सृजन कर पाएंगे ?

सभ्य समाज अपनी नैतिक ऊंचाई से मापा जाता है। यह निजी आचरण व सामाजिक आचार संहिता से तय होता है। भारत राजा शिवि और दधीचि जैसे ऋषियों की परम्परा का देश है, जिन्होंने समाज कल्याण के लिए खुद का प्राणदान दिया। प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने देश को सम्बोधित करते हुए कोरोना संक्रमण के दूसरे हमले के प्रति बेहद चिन्ता जताते हुए लोगों से कोरोना प्रतिबन्धों और नियमों के कड़ाई और ईमानदारी से पालन करने की अपील की। उन्होंने रामनवमी और रमजान का जिक्र करते हुए भगवान श्रीराम की मर्यादा पालन की शिक्षा और रमजान के संयम की भी याद दिलाई। प्रधानमन्त्री मोदी देश के सर्वोच्च और सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं और उम्मीद है कि लोग उनकी अपील पर ध्यान देकर अपने व्यवहार को कोरोना संकट काल की जरूरतों के मुताबिक नियमित और मर्यादित रखेंगे। प्रधानमन्त्री ने एक तरह से कोरोना संकट काल में मर्यादा की रेखा खींची है जिसका अनुपालन देश के सर्वोच्च स्तर से लेकर आम जन तक को करना होगा। लेकिन यदि स्वानुशासन का पालन किया गया होता तो बहुत से लोगों को असमय मरने से या अस्पतालों में गम्भीर रूप से बीमार होकर भर्ती होने या घरों में बीमार होकर बन्द रहने से बचाया जा सकता था। कोरोना की दूसरी लहर को टाला जा सकता था। केवल जनता ही क्यों, हमारी सरकारों व नेताओं ने भी यह मान लिया था कि कोरोना अब आई-गई बात हो चुका है। अगर ऐसा न होता तो पिछले एक साल में देश की स्वास्थ्य प्रणाली को इतना तो चूकरहित बनाया जा सकता था कि महामारी की नई लहर के दौरान इतनी अफरा-तफरी न मचती। प्रश्न बहुत हैं परन्तु समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं। फिलहाल सरकारों को अपना काम करने और जनता को स्वानुशासन लागू करने की आवश्यकता है।

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