पुस्तक समीक्षा : श्रेष्ठ बाल एकांकी संचयन

‘श्रेष्ठ बाल एकांकी संचयन’ यह पुस्तक डॉ विमला भंडारी द्वारा लिखित है। जिसमें बालकों के लिए सरल भाषा में एकांकी संचयित की गई हैं। छोटी-छोटी नौटंकी के रूप में कुल 22 एकांकियों का संचयन किया गया है। लेखिका ने पुस्तक के लिए बहुत ही उत्तम एकांकियों का संचयन किया है। हर एक एकांकी का लेखक या लेखिका अलग है । संचयन शब्द से ही स्पष्ट है कि इस पुस्तक में विभिन्न विद्वानों की प्रतिभा को स्थान दिया गया है।


बच्चों के भीतर कैसे देशभक्ति के भाव जागृत हों? और कैसे बच्चों को समाज का एक जागरूक और कर्तव्यपरायण नागरिक बनाया जा सकता है ? – इस पर इस पुस्तक में दिए गए एकांकियों के माध्यम से बहुत अच्छा प्रकाश पड़ जाता है।
‘निर्मला : सांप और सयाली’ – नामक एकांकी की शुरुआती पंक्तियां हैं – “वीरता और शौर्य से किसी की जान माल की रक्षा करने वाले बच्चों को हर वर्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर राजधानी दिल्ली में सम्मानित किया जाता है। ऐसी ही एक बहादुर लड़की है – सयाली । गुजरात के एक छोटे से गांव की सयाली गरीब मजदूर लेहनू भाई भोया के घर जन्मी। उसने वीरान जंगल में एक लड़की निर्मला को विशाल अजगर के चंगुल से बचाया।”
बच्चों को समाज के अन्य नागरिकों के प्रति कर्तव्य परायण बनाना सचमुच उसके भीतर की मानवता को निखारने जैसा होता है। भारत की प्राचीन गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत ऐसा ही किया जाता था। इस एकांकी के माध्यम से बच्चों के भीतर के मानव को उकेरने का प्रयास किया गया है।
‘राजा शर्तराज सिंह’ – नामक एकांकी में भी बच्चों को विशेष शिक्षा मिलती हुई दिखाई देती है। वैसे भी बच्चों के लिए राजा और रानियों के किस्से कहानी या एकांकी बहुत ही अधिक रोचक हो जाते हैं। दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियों में अक्सर राजाओं के किस्से सुनने को मिलते रहे हैं। इस एकांकी में सरल भाषा के माध्यम से बच्चों को एकांकी की कहानी के साथ बांधे रखने का सफल प्रयास किया गया है।
हास्य रस भी हमारे जीवन के लिए बहुत ही आवश्यक और उपयोगी होता है ।।बिना हास्य के जीवन नीरस लगता है। स्वास्थ्य को ठीक बनाए रखने के लिए हास्य बहुत आवश्यक बताया गया है। इस पुस्तक में डॉक्टर घमंडी लाल अग्रवाल जी द्वारा लिखित ‘हंसो हंसाओ’ – एकांकी में हास्य रस का भरपूर प्रबंध किया गया है।
‘बस्ती में बाघ’ नामक एकांकी के लेखक रमाशंकर हैं। इस एकांकी का पहला दृश्य । पर्दा उठता है। मंच पर प्रकाश धीरे धीरे फैलता है । जो ग्रामीण पृष्ठभूमि को बड़ी सफलता के साथ प्रकट करता है। लेखक लिखते हैं ,- एक गांव की बस्ती का दृश्य दिखाई देता है,। जिसमें कुछ झांकियां व कच्चे मकान बने हैं। रात का समय है। गांव के लोग सो रहे हैं। एक मकान के बाहर चारपाई पर रामदीन सो रहा है। उसके पास ही थोड़ी दूर पर उसकी बकरी बंधी है। उसी समय मंच के एक ओर से बाघ बने लड़के का प्रवेश होता है। मंच के बीचों बीच आकर वह इधर उधर देखता है ।शिकार की तलाश करता है। उसे रामदीन के घर के बाहर बंधी हुई बकरी दिखाई देती है। वह बकरी की ओर दबे पांव धीरे-धीरे बढ़ता है । … उसी समय बकरी को अपने आसपास जंगली जानवर के होने का आभास होता है। वह मैं …. मैं.. कर चिल्लाने लगती है । बकरी की आवाज सुनकर रामदीन जाग जाता है।…
ऐसी रोचक सरल भाषा में एकांकी बच्चों के मन पर सीधा प्रभाव करती है। वैसे भी बच्चों को पशु ,पौधों, पक्षियों आदि से स्वाभाविक लगाव होता है। वे उनकी गतिविधियों पर बड़ी बारीकी से नजर रखते हैं और बड़े आत्मीय भाव से उनके साथ हिल मिलकर रहने की कोशिश करते हैं। ऐसी एकांकी वास्तव में बच्चों के भीतर के संस्कार को और भी अधिक प्रबल कर देती हैं ।
पुस्तक की प्रत्येक एकांकी कोई न कोई ऐसा अच्छा संदेश देती हुई दिखाई देती है, जिसका प्रभाव बच्चों पर पड़ना निश्चित है। इसलिए पुस्तक बहुत ही उपयोगी और संग्रह करने योग्य है। पुस्तक में प्रस्तुत किए गए सभी लेखों के संचयन के लिए जहां लेखिका धन्यवाद और अभिनंदन की पात्र हैं वहीं प्रत्येक लेखक ने भी अपनी विद्वता का जिस प्रकार प्रस्तुतीकरण किया है उससे वे सब भी अभिनंदन और धन्यवाद के पात्र हैं।
इस पुस्तक का मूल्य ₹200 है। पुस्तक की पृष्ठ संख्या 172 है। पुस्तक प्राप्ति के लिए साहित्यागार, धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता जयपुर, पिन 302003, फोन 0141 -2310785, 4022382 है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

डॉ॰ राकेश कुमार आर्य

डॉ॰ राकेश कुमार आर्य

मुख्य संपादक, उगता भारत

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