कांग्रेस के बगावती गुट ने किया कांग्रेस को पंखविहीन

congress

-ः ललित गर्ग:-

कांग्रेस की राजनीति की सोच एवं संस्कृति सिद्धान्तों, आदर्शों और निस्वार्थ को ताक पर रखकर सिर्फ सत्ता, पु़त्र-मोह, राजनीतिक स्वार्थ, परिवारवाद एवं सम्पदा के पीछे दौड़ी, इसलिये आज वह हर प्रतिस्पर्धा में पिछड़ती जा रही है। कांग्रेस आज उस मोड़ पर खड़ी है जहां एक समस्या समाप्त नहीं होती, उससे पहले अनेक समस्याएं एक साथ फन उठा लेती है। कांग्रेस के भीतर की अन्दरूनी कलह एवं विरोधाभास नये-नये चेेहरों में सामने आ रही है, जी-23 की बगावत जगजाहिर है। कांग्रेस की इस दुर्दशा एवं लगातार रसातल की ओर बढ़ने का सबसे बड़ा कारण राहुल गांधी है। वह पार्टी एवं राजनीतिक नेतृत्व क्या देश की गरीब जनता की चिन्ता एवं राष्ट्रीय समस्याओं को मिटायेंगी जिसे पु़त्र के राजनीतिक अस्तित्व को बनाये रखने की चिन्ताओं से उबरने की भी फुरसत नहीं है।

जी-23 के नेता कांग्रेस के कद्दावर नेता है, पार्टी के आधार है, बुनियाद है, उनके भीतर पनप रहा असंतोष एवं विद्रोह अकारण नहीं है। ये नेता तमाम ऐसी बातें बोलने को विवश हुए हैं जो सोनिया को नागवार गुजरी है। इन्होंने रह-रहकर राहुल की नाकामियों को उजागर किया है, संगठन का मुद्दा उठाया है, बंगाल में फुरफुरा शरीफ के मौलवी अब्बास सिद्दीकी की पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट से कांग्रेस के समझौते पर भी ये नेता सवाल उठा रहे हैं। कांग्रेस अपने बुनियादी सिद्धांतों से कैसे समझौता कर सकती है? सिद्दीकी जैसे लोगों से गठबंधन करके पार्टी सांप्रदायिक शक्तियों से कैसे लड़ेगी? यह ऐसा गठबंधन है जो धार्मिक भावनाएं भड़काने के लिए जाना जाता है। कोरोना के दौरान सिद्दीकी ने सार्वजनिक दुआ मांगी थी कि दस से पचास करोड़ भारतीय मर जाएं। सांप्रदायिक लोगों और संगठनों को साथ लेकर सांप्रदायिकता से लड़ने का पाखंड तो कांग्रेस ही कर सकती है। इस तरह ओढ़ी हुई धार्मिकता और छद्म पंथनिरपेक्षता का जादू चुनावी संग्राम में कोई चमत्कार घटित नहीं कर सकेगा।
बड़ा प्रश्न है कि ऐसे लोगों से समझौता करके कांग्रेस संदेश क्या देना चाहती है? जबकि आज कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौतियां है, उनका मुकाबला नरेन्द्र मोदी जैसे दिग्गज नेता, विकास पुरुष एवं भाजपा जैसी अनुशासित पार्टी से हैं, उसे राष्ट्रीयता के ईमान को, कत्र्तव्य की ऊंचाई को, संकल्प की दृढ़ता को, निस्वार्थ के पैगाम को एवं राजनीकि मूल्यों को जीने के लिये उसे आदर्शो की पूजा ही नहीं, उसके लिये कसौटी करने होगी। आदर्श केवल भाषणों तक सीमित न हो, बल्कि उसकी राजनीतिक जीवनशैली का अनिवार्य हिस्सा बने। आदर्शों को वह केवल कपड़ों की तरह न ओढ़े, अन्यथा फट जाने पर आदर्श भी चिथड़े कहलायेंगे और ऐसा ही दुर्भाग्य कांग्रेस के भाल पर उकेरता जा रहा है।
असंतुष्ट कांग्रेसी नेताओं के हमलों पर परिवार के लोग अभी चुप हैं। उनकी यह चुप्पी असंतुष्ट नेताओं का हौसला बढ़ा रही है, उनके विरोध की धार को तेज कर रही है। जी-23 के नेताओं की कोशिश है कि यह चुप्पी टूटे और लड़ाई खुले में आए। सोनिया गांधी को पता है कि लड़ाई खुले में आई तो उनके लिए राहुल गांधी को बचाना बहुत कठिन होगा। दरअसल यह लड़ाई अब पार्टी बचाने और राहुल गांधी के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है। राहुल गांधी को लेकर खड़े किये जा रहे मुद्दों पर गांधी परिवार की चुप्पी का इरादा केवल मुद्दे को टालना है, कुछ करने का इरादा न पहले था और न अब दिख रहा है। यह स्थिति पार्टी के लिये भारी नुकसानदायी साबित हो रही है।
आजाद भारत में सर्वाधिक लम्बे समय शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी की इस स्थिति का कारण पु़त्र-मोह है। इतिहास गवाह है पुत्र मोह ने बड़ी-बड़ी तबाहियां की हैं। सत्ता और पुत्र के मोह में इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई। आज सोनिया गांधी भी ऐसे ही पदचिन्हों पर चलते हुुए पार्टी के अस्तित्व एवं अस्मिता को धुंधला रही है। ऐसे क्या कारण बन रहे हैं कि कांग्रेस की राजनीति के प्रति लोगों के मन श्रद्धा से झुक नहीं रहे हैं। क्योंकि वहां किसी भी मौलिक मुद्दों पर स्थिरता नहीं, जहां स्थिरता नहीं वहां विश्वास कैसे संभव है? प्रश्न एक परिवार का नहीं, बल्कि देश की 130 करोड़ आबादी का है। पुत्र-मोह, बदलती नीतियां, बदलते वायदे, बदलते बयान कैसे थाम पाएगी करोड़ों की संख्या वाले देश का आशाभरा विश्वास जबकि वह पार्टी के बुनियादी नेताओं के विश्वास को भी कायम रखने में नाकाम साबित हो रही है। इसलिये वक्त की नजाकत हो देखते हुए कांग्रेस के सभी जिम्मेदार तत्व अपनी पार्टी के लिये समय को संघर्ष में न बिताये, पार्टी-हित में सृजन करें। भारत जैसे सशक्त लोकतंत्र के सशक्त विपक्ष का होना जरूरी है और अभी तक कांग्रेस के अलावा अन्य विपक्षी दलों में यह पात्रता सामने नहीं आ रही है।
वरिष्ठ असंतुष्ट कांग्रेस नेताओं के निशाने पर गांधी परिवार है। तमाम नेताओं ने जितने खुले अंदाज में अपनी बात रखी, उससे साफ हो जाता है कि वे पार्टी हित में बदलाव चाहते हैं, पार्टी की सोच में भी और संगठनात्मक ढ़ांचे में भी। इन नेताओं का राजनीतिक अनुभव निश्चित तौर पर राहुल गांधी से अधिक है। अब तक की कांग्रेस की संरचना को देखते हुए यह नहीं लगता कि ये नेता किसी पद की कतार में है, ये पार्टी से अलग होकर नयी पार्टी बनाने के मुड में भी नहीं है, ये सभी नेता पार्टी में राहुल गांधी के नाम पर हो रही टूटन एवं बिखराव को लेकर चिन्तित है। ये नेता नेतृत्व के साथ मिल-बैठकर कोई सर्वमान्य हल एवं पार्टी को बचाने का फार्मूला निकालना चाहते हैं, इस तरह की संभावना की गुंजाइश का न पनपना पार्टी के अहित में ही है। स्पष्ट है कि जो पार्टी अपनों की बात ही नहीं सुन पा रही है, वह राष्ट्र एवं राष्ट्र की जनता की बात क्या सुनेंगी? लोकतंत्र में इस तरह की हठधर्मिता कैसे स्वीकार्य होगी? कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं की यह खुली बगावत पार्टी के भविष्य पर घने अंधेरों की आहट है।
आज कत्र्तव्य एवं राजनीतिक हितों से ऊंचा कद पुत्र-मोह का हो गया है। जनता के हितों से ज्यादा वजनी निजी स्वार्थ एवं परिवारवाद हो गया है। असंतुष्ट नेता इस नतीजे पर भी पहुंच चुके हैं कि राहुल के रहते कांग्रेस में कोई सूरज उग नहीं पाएगा। जो लोग प्रिंयका गांधी से बड़ी उम्मीद लगाए थे, वे और ज्यादा निराश हैं। प्रियंका का सूरज तो उगने से पहले ही अस्त हो गया। भाई-बहन किसी गरीब से मिल लें, किसी गरीब के साथ बैठकर खाना खाले, किसी पीड़ित को सांत्वना देने पहुंच जाये तो समझने लगते है कि एक सौ तीस करोड़ लोगों का दिल जीत लिया है। वे अपने बयानों, कार्यों की निंदा या आलोचना को कभी गंभीरता से लेते ही नहीं। उनकी राजनीति ने इतने मुखौटे पहन लिये हैं, छलनाओं, दिखावे एवं प्रदर्शन के मकड़ी जाल इतने बुन लिये हैं कि उनका सही चेहरा पहचानना आम आदमी के लिये बहुत कठिन हो गया है। इन्हीं कारणों से गुजरात में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस का लगभग सफाया हो गया। चुनाव में हार-जीत तो होती रहती है, लेकिन गुजरात का नतीजा नया संदेश दे रहा है। अभी तक कांग्रेस का इस तरह से सफाया उन राज्यों में हो रहा था जहां मजबूत क्षेत्रीय दल हैं। गुजरात में अनेक सकारात्मक स्थितियों के बावजूद कांग्रेस कुछ अच्छा करने में असफल रही है तो यह अधिक चिन्तनीय पहलु है। हार के कारणों पर मंथन की बजाय स्थानीय नेताओं पर कार्रवाई क्या उचित है? प्रश्न है कि इन स्थितियों के चलते कांग्रेस कैसे मजबूत बनेगी? कैसे पार्टी नयी ताकत से उभर सकेगी? कांग्रेस को राष्ट्रीय धर्म एवं कत्र्तव्य के अलावा कुछ न दिखे, ऐसा होने पर ही पार्टी को नवजीवन मिल सकता है, अन्यथा अंधेरा ही अंधेरा है।

Comment:

mariobet giriş
mariobet giriş
betpark giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
hilarionbet giriş
hilarionbet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
hilarionbet giriş
hazbet giriş
hazbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
celtabet giriş
celtabet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş