साहित्यकार सांसद डॉ रघुवीर सिंह

23 फरवरी/जन्म-दिवस

ऐसा प्रायः कम ही होता है कि राजपरिवार में जन्मे व्यक्ति को सत्तामद न हो; पर 23 फरवरी, 1908 को सीतामऊ (मध्य प्रदेश) रियासत के महाराजा श्री रामसिंह के घर में जन्मे महाराज कुमार रघुवीर सिंह इसके अपवाद थे। प्रारम्भिक शिक्षा घर पर होने के बाद ये इन्दौर के डेली कॉलेज और होल्कर कॉलेज में पढ़े। इतिहास इनकी सर्वाधिक रुचि का विषय था। 1936 में आगरा विश्वविद्यालय से ‘ट्रांजिट इन मालवा’ विषय पर इन्हें डी.लिट की उपाधि दी गयी। इस विश्वविद्यालय से यह उपाधि लेने वाले वे पहले छात्र थे।

कुँवर रघुवीर सिंह को घर में साहित्यिक वातावरण मिला। उनके पूर्वज महाराज कुमार रतनसिंह ‘नटनागर’ डिंगल के कवि थे। पिता रामसिंह भी सुकवि तथा आधुनिक विचारों के थे। देश में अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन हो रहे थे। 1917 में रूसी क्रान्ति की चर्चा विश्व भर में फैली। घर में भी श्री रामसिंह इसका विश्लेषण सबके सामने ठीक प्रकार से करते थे। इस प्रकार बालक रघुवीर सिंह का राजनीतिक प्रशिक्षण भी पढ़ाई के साथ-साथ चलता रहा।

जब तक रघुवीर सिंह युवा हुए, मालवा क्षेत्र में स्वतन्त्रता संग्राम की गतिविधियाँ तेज हो गयीं। इन्दौर इनका केन्द्र था। वहाँ कांग्रेस के आन्दोलन के साथ ही मजदूर आन्दोलन, प्रजामण्डल आन्दोलन और समाजवादी आन्दोलन भी चल रहे थे। इन सबका प्रभाव युवक रघुवीर सिंह पर भी पड़ा। 1929-30 में उनके लिखे निबन्ध और कविताओं पर इसका प्रभाव स्पष्ट दिखायी देता है। 1933 में यह सब रचनाएँ ‘बिखरे फूल’ में प्रकाशित हुईं।

रघुवीर सिंह जहाँ एक ओर गांधीवादी आन्दोलन से जुड़े थे, तो दूसरी ओर क्रान्तिकारियों द्वारा जान हथेली पर लेकर घूमना भी उनके अन्तर्मन को झकझोर देता था। 1928 में प्रकाशित और बहुचर्चित ‘चाँद’ पत्रिका के फाँसी अंक में उन्होंने ‘फ्रान्स की क्रान्ति के कुछ रक्तरंजित पृष्ठ’ लेख लिखा था। इस अंक को ब्रिटिश शासन ने जब्त कर लिया था।

तत्कालीन लेखक प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद एवं सुमित्रानन्दन पन्त से भी वे बहुत प्रभावित थे। इनके प्रभाव की छाप उनके विचारों और लेखन में दिखायी देती है। उनका लेखकीय स्वरूप पूर्णतः उनकी सामन्ती छवि से भिन्न है। स्वतन्त्र भारत के पहले प्रधानमन्त्री नेहरु जी से उनकी मित्रता थी। उनके आग्रह पर 1952 से 1962 तक डा. रघुवीर सिंह राज्यसभा में सांसद रहे। सदन में भी वे अत्यधिक सक्रिय रहे। संयुक्त राष्ट्र संघ के 11वें अधिवेशन में उन्होंने भारत का पक्ष बहुत मजबूती से रखा। तभी उन्हें कोलम्बिया विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग ने भी भाषण के लिए आमन्त्रित किया।

डा. रघुवीर सिंह की एक विशेषता यह थी कि वे उन्हें मिलने वाले हर पत्र का उत्तर देते थे। अपनी जन्मभूमि मालवा से उन्हें अत्यधिक प्रेम था। मालवा के गौरवशाली इतिहास को प्रकाश में लाने का उन्होंने सफल प्रयास किया। उनका साहित्य यद्यपि हिन्दी में है; पर अपने क्षेत्र के लोगों से वे स्थानीय बोली में ही बात करते थे। 1975 में जब आपातकाल की घोषणा कर इंदिरा गांधी ने देश में तानाशाही थोप दी, तो डा0 रघुवीर सिंह ने इसे देश की जनता के लोकतान्त्रिक हितों पर कुठाराघात बताते हुए कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया।

सादे जीवन और उच्च विचारों वाले डा. रघुवीर सिंह को प्रख्यात साहित्यकार डा0 वृन्दावनलाल वर्मा ने सीतामऊ का तपस्वी, यशस्वी और प्रतिभा सम्पन्न समर्पित साहित्यकार कहा है। इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196

Comment:

Latest Posts

bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
Runtobet Giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti
betgaranti
Runtobet Giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet
betgaranti
bettilt
bettilt
betnano
betnano
artemisbet
betnano
artemisbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
runtobet 2026